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मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में ऑनलाइन धोखाधड़ी के तेजी से बढ़ते मामलों ने साइबर सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2026 के शुरुआती सात महीनों में शहर में ऑनलाइन धोखाधड़ी के 3,689 मामले दर्ज किए गए। यह संख्या वर्ष 2025 में दर्ज किए गए कुल 4,825 साइबर धोखाधड़ी के मामलों के करीब तीन-चौथाई से भी अधिक है। आंकड़े संकेत देते हैं कि मौजूदा रफ्तार बनी रही तो इस साल साइबर ठगी के मामलों की संख्या पिछले वर्ष के आंकड़े के आसपास या उससे अधिक पहुंच सकती है।
आंकड़ों के अनुसार दर्ज किए गए 3,689 मामलों में से केवल 847 मामलों का पता लगाया जा सका है। इस अवधि में अलग-अलग साइबर अपराधों से जुड़े 637 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। इस तरह दर्ज मामलों के मुकाबले खुलासा होने की दर करीब 23 प्रतिशत रही। कम खुलासा दर ने साइबर अपराधियों तक पहुंचने में आ रही तकनीकी और कानूनी चुनौतियों को उजागर किया है।
मुंबई में वर्ष 2025 के दौरान साइबर धोखाधड़ी के 4,825 मामले दर्ज हुए थे। यह संख्या 2024 में दर्ज 5,087 मामलों की तुलना में करीब पांच प्रतिशत कम थी। हालांकि विशेषज्ञों ने उस समय भी कहा था कि आधिकारिक आंकड़े वास्तविक घटनाओं का केवल एक हिस्सा हो सकते हैं क्योंकि कई पीड़ित बदनामी संकोच या रकम कम होने के कारण शिकायत दर्ज नहीं कराते। कई ऑनलाइन शिकायतें प्राथमिकी में परिवर्तित नहीं हो पाने से भी वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती।
इस वर्ष क्रेडिट कार्ड और दूसरी डिजिटल धोखाधड़ी के मामले सबसे ज्यादा सामने आए। इस श्रेणी में 914 प्रकरण दर्ज किए गए लेकिन इनमें से केवल 142 मामलों का खुलासा हो सका। इन मामलों में 81 आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। यानी इस श्रेणी के लगभग 15 प्रतिशत मामलों को ही सुलझाया जा सका है। यह स्थिति डिजिटल लेन-देन के माध्यम से की जाने वाली ठगी की जटिलता को सामने लाती है।
साइबर अपराधी फर्जी बैंक खातों सिम कार्ड ईमेल पहचान सोशल मीडिया प्रोफाइल और डिजिटल भुगतान माध्यमों का इस्तेमाल कर रकम को कई खातों में भेज देते हैं। ठगी की रकम कुछ ही मिनटों में अलग-अलग खातों में स्थानांतरित होने के कारण उसे रोकना मुश्किल हो जाता है। कई मामलों में अपराधी दूसरे राज्यों या विदेशों से पूरा नेटवर्क संचालित करते हैं। बैंक खाते किसी दूसरे व्यक्ति के नाम पर होते हैं जबकि उन्हें नियंत्रित कोई और कर रहा होता है।
हाल के कुछ बड़े मामलों ने ऑनलाइन धोखाधड़ी के बढ़ते दायरे को उजागर किया है। इनमें 2.55 करोड़ रुपये का कथित डिजिटल अरेस्ट मामला और 74.26 लाख रुपये की ऑनलाइन शेयर निवेश धोखाधड़ी शामिल है। डिजिटल अरेस्ट के मामलों में अपराधी खुद को पुलिस CBI प्रवर्तन निदेशालय सीमा शुल्क विभाग या दूसरी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं। वे वीडियो कॉल के माध्यम से उसे लगातार निगरानी में रखते हुए गिरफ्तारी का भय दिखाते हैं और रकम अपने खातों में स्थानांतरित करा लेते हैं।
ऑनलाइन शेयर निवेश ठगी में पीड़ितों को सोशल मीडिया विज्ञापनों व्हाट्सऐप या टेलीग्राम समूहों के जरिए जोड़ा जाता है। शुरुआत में उन्हें निवेश पर बड़ा लाभ दिखाई देता है लेकिन यह लाभ केवल फर्जी वेबसाइट या मोबाइल एप पर प्रदर्शित किया जाता है। अधिक रकम जमा कराने के बाद निकासी रोक दी जाती है। इसके बाद टैक्स प्रोसेसिंग शुल्क या खाता खोलने के नाम पर अतिरिक्त रकम मांगी जाती है।
मुंबई में सामने आए कथित म्यूल अकाउंट रैकेट में लगभग 350 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेन-देन की जानकारी मिली है। म्यूल अकाउंट ऐसे बैंक खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल साइबर ठगी से प्राप्त रकम को स्वीकार करने और दूसरे खातों में भेजने के लिए किया जाता है। कई बार खाताधारक कमीशन के लालच में अपना बैंक खाता ATM कार्ड सिम कार्ड और ऑनलाइन बैंकिंग से संबंधित जानकारी अपराधियों को सौंप देते हैं। कुछ मामलों में लोगों को यह पता भी नहीं होता कि उनके खाते का इस्तेमाल अपराध की रकम के लिए किया जा रहा है।
साइबर अपराध रोकने में सबसे बड़ी चुनौती अपराधियों की पहचान और ठगी की रकम का पता लगाना है। फर्जी दस्तावेजों से हासिल सिम कार्ड VPN विदेशी सर्वर और क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल से जांच और कठिन हो जाती है। एक ही मामले में रकम कई राज्यों के दर्जनों बैंक खातों से गुजर सकती है। इसके चलते अलग-अलग राज्यों की एजेंसियों और बैंकों के बीच तत्काल समन्वय की आवश्यकता होती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन ठगी होने के तुरंत बाद राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर शिकायत करना जरूरी है। शुरुआती समय में शिकायत मिलने पर बैंक खाते में भेजी गई रकम को रोके जाने की संभावना अधिक रहती है। पीड़ित को संबंधित बैंक को सूचित करने के साथ ट्रांजेक्शन नंबर मोबाइल नंबर चैट स्क्रीनशॉट और अन्य डिजिटल साक्ष्य सुरक्षित रखने चाहिए।
नागरिकों को अनजान लिंक पर क्लिक नहीं करने OTP PIN और बैंकिंग पासवर्ड साझा नहीं करने तथा अधिक मुनाफे का वादा करने वाली निवेश योजनाओं से सावधान रहने की सलाह दी गई है। कानून लागू करने वाली कोई भी एजेंसी वीडियो कॉल पर डिजिटल गिरफ्तारी या पैसे ट्रांसफर करने की मांग नहीं करती। मुंबई के ताजा आंकड़े बताते हैं कि तकनीकी कार्रवाई के साथ लोगों में जागरूकता बढ़ाना ही साइबर ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।





