महाराष्ट्र

भाजपा के मजबूत क्षेत्र में वंजारी की फिर जीत, इन पांच समीकरणों ने बदला खेल

nidhi
30 Oct 2026 10:35 AM IST
भाजपा के मजबूत क्षेत्र में वंजारी की फिर जीत, इन पांच समीकरणों ने बदला खेल
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नागपुर: महाराष्ट्र विधान परिषद की नागपुर संभाग स्नातक सीट पर कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने जीत दर्ज करते हुए अपना स्थान बरकरार रखा है। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराया। अंतिम परिणाम में वंजारी को 67,231 और कोहले को 63,960 मत मिले। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े राजनीतिक महत्व के कारण इस क्षेत्र का परिणाम चर्चा में है। हालांकि, कांग्रेस ने यह सीट पहली बार नहीं जीती है; वंजारी वर्ष 2020 में भी यहां से निर्वाचित हुए थे।
नतीजे से स्पष्ट है कि पहली वरीयता में बढ़त हासिल करना अंतिम जीत के लिए पर्याप्त नहीं रहा। उम्मीदवार चयन पर असंतोष, मतदाताओं तक पहुंच और वरीयता वाले मतों की रणनीति जैसे पहलू परिणाम के बाद सामने आए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों और प्रत्याशियों के बयानों के आधार पर पांच प्रमुख कारण उभरते हैं।
पहला कारण—दूसरी वरीयता के मतों से बदला मुकाबला। प्रथम वरीयता की गिनती में सुधाकर कोहले को 60,924 और वंजारी को 56,630 मत मिले थे। इस चरण में भाजपा उम्मीदवार आगे थे, लेकिन कोई प्रत्याशी निर्धारित कोटा हासिल नहीं कर सका। इसके बाद आगे की वरीयताओं की गिनती हुई और वंजारी ने बढ़त बना ली। यह परिणाम बताता है कि ऐसी निर्वाचन प्रणाली में पहली पसंद के साथ अन्य प्रत्याशियों के समर्थकों की अगली पसंद बनना भी महत्वपूर्ण है।
निर्दलीय नितेश कराले इस समीकरण में महत्वपूर्ण तीसरी ताकत बने। रिपोर्ट के अनुसार, दूसरे दौर तक उन्हें 24,249 मत मिले थे। आगे की गिनती में उनके समर्थकों के दूसरी वरीयता वाले मतों से वंजारी को लाभ हुआ। कांग्रेस उम्मीदवार के लिए यह अतिरिक्त समर्थन शुरुआती अंतर पाटने में महत्वपूर्ण साबित हुआ। इसलिए जीत को केवल कांग्रेस और भाजपा के सीधे मुकाबले के रूप में देखना अधूरा होगा।
दूसरा कारण—उम्मीदवार चयन से पैदा हुआ आंतरिक असंतोष। भाजपा ने सुधाकर कोहले को उम्मीदवार बनाया, जबकि पूर्व विधान परिषद सदस्य अनिल सोले ने टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय नामांकन किया था। बाद में फडणवीस से मुलाकात के बाद सोले ने कोहले का समर्थन किया, लेकिन नाम वापसी की समयसीमा बीतने से उनका नाम मतपत्र पर बना रहा। इस घटनाक्रम ने चुनाव की शुरुआत में पार्टी की एकजुटता पर सवाल खड़े किए। हालांकि, नाराजगी के कारण कितने मत प्रभावित हुए, इसका निश्चित आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
तीसरा कारण—वंजारी का लगातार जमीनी संपर्क। जीत के बाद वंजारी ने कहा कि पिछले छह वर्षों में उन्होंने स्नातक मतदाताओं, छात्रों और युवाओं से संपर्क बनाए रखा। उनके अनुसार, विभिन्न कार्यक्रमों और लोगों के मुद्दों पर काम करने का लाभ चुनाव में मिला। उन्होंने अपनी सफलता का श्रेय कार्यकर्ताओं तथा समर्थन देने वाले संगठनों को भी दिया। यह उनका आकलन है, लेकिन नियमित संपर्क और मौजूदा जनप्रतिनिधि की पहचान इस चुनाव में कांग्रेस की महत्वपूर्ण ताकत दिखाई देती है।
चौथा कारण—शिक्षण संस्थानों और संगठनों का समर्थन। वंजारी की विश्वविद्यालय और शैक्षिक क्षेत्र से जुड़ी पहचान ने व्यापक संपर्क बनाने में मदद की। रिपोर्टों में शिक्षक संगठनों तथा शिक्षण संस्थानों से जुड़े समूहों के समर्थन का उल्लेख है। स्वयं वंजारी ने 48 संगठनों का सहयोग मिलने का दावा किया। स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में ऐसे नेटवर्क मतदाता पंजीकरण, व्यक्तिगत संवाद और मतदान तक पहुंच बनाने में उपयोगी हो सकते हैं। इन्हें केवल बड़ी सभाओं के आधार पर मापना संभव नहीं है।
पांचवां कारण—अमान्य मत और मतदान प्रक्रिया की समझ। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 1,65,906 मतों में से 15,032 अमान्य घोषित किए गए। इतनी बड़ी संख्या ने मतपत्र पर वरीयता अंकित करने की समझ को लेकर सवाल उठाए। कोहले ने भी मतों के अमान्य होने और दूसरी वरीयता संबंधी गलतियों पर चिंता जताई। हालांकि, सभी अमान्य मत भाजपा के थे या उनके मान्य होने से नतीजा निश्चित रूप से बदल जाता, ऐसा प्रमाणित निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
नागपुर का परिणाम भाजपा के लिए उम्मीदवार चयन और चुनावी प्रबंधन की समीक्षा का संकेत है। वहीं कांग्रेस के लिए यह जीत ऐसे दौर में राहत लेकर आई है, जब अन्य विधान परिषद मुकाबलों में उसका प्रदर्शन कमजोर रहा। इसे पूरे महाराष्ट्र के सभी मतदाताओं का जनादेश मानने के बजाय स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के विशेष मतदाता समूह, उम्मीदवारों और वरीयता आधारित मतदान के संदर्भ में समझना अधिक सटीक होगा।
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