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हाथियों के अस्तित्व पर संकट, सिकुड़ते जंगल और बंद होते कॉरिडोर बनी बड़ी चुनौती

Kavita2
23 Aug 2026 12:47 PM IST
हाथियों के अस्तित्व पर संकट, सिकुड़ते जंगल और बंद होते कॉरिडोर बनी बड़ी चुनौती
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मुंबई। ‘द एलीफेंट इन द रूम’ यानी ऐसी बड़ी समस्या, जिसके बारे में सभी जानते हैं, लेकिन उस पर खुलकर चर्चा नहीं करते। वन्यजीव संरक्षण के संदर्भ में हाथियों का अस्तित्व संकट में होना आज ऐसी ही गंभीर समस्या बनकर सामने आ रहा है। धरती के सबसे बड़े स्थलीय स्तनधारी जीवों में शामिल हाथियों को उनके प्राकृतिक आवास के लगातार सिकुड़ने, जंगलों के टुकड़ों में बंटने, शिकार, मानव-हाथी संघर्ष और आवाजाही के पारंपरिक रास्तों यानी हाथी कॉरिडोर के बंद होने जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) की ‘खतरे में पड़ी प्रजातियों की रेड लिस्ट’ के अनुसार एशियाई हाथी ‘एंडेंजर्ड’ यानी लुप्तप्राय श्रेणी में हैं। इसका अर्थ है कि इस प्रजाति के अस्तित्व को गंभीर खतरे का सामना करना पड़ रहा है और इसके संरक्षण के लिए प्रभावी प्रयासों की आवश्यकता है। हाथियों की संख्या में गिरावट केवल एक प्रजाति के कम होने का मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ सकता है।

भारत में पाए जाने वाले भारतीय हाथी Elephas maximus indicus के सामने भी कई गंभीर चुनौतियां हैं। तेजी से बढ़ते शहरीकरण, सड़क और रेल परियोजनाओं, खनन तथा अन्य विकास गतिविधियों के कारण हाथियों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं। जंगलों के बड़े क्षेत्रों के छोटे-छोटे हिस्सों में बंटने से हाथियों के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक सुरक्षित आवाजाही मुश्किल होती जा रही है।

हाथियों के लिए जंगल केवल भोजन और पानी का स्रोत नहीं हैं, बल्कि उनके पूरे जीवन-चक्र का आधार हैं। हाथियों के झुंड भोजन, पानी और सुरक्षित आवास की तलाश में एक बड़े क्षेत्र में घूमते हैं। जब उनके पारंपरिक रास्ते बाधित होते हैं तो वे कई बार आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। इससे मानव-हाथी संघर्ष की स्थिति पैदा होती है। खेतों में हाथियों के पहुंचने से फसलों को नुकसान होता है, जबकि दूसरी ओर इंसानों और हाथियों दोनों की जान जोखिम में पड़ जाती है।

हाथी कॉरिडोर का संरक्षण इस समस्या का महत्वपूर्ण समाधान माना जाता है। ये ऐसे प्राकृतिक रास्ते हैं, जिनका इस्तेमाल हाथियों के झुंड एक जंगल या वन क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक आने-जाने के लिए करते हैं। यदि इन रास्तों पर निर्माण कार्य, बस्तियां या अन्य अवरोध खड़े हो जाएं तो हाथियों की आवाजाही प्रभावित होती है। इसके परिणामस्वरूप हाथी वैकल्पिक रास्तों की तलाश में मानव बस्तियों की ओर बढ़ सकते हैं।

हाथियों के सामने शिकार भी एक बड़ी चुनौती है। विशेष रूप से नर हाथियों को उनके दांतों यानी हाथीदांत के लिए निशाना बनाए जाने का खतरा रहता है। हाथीदांत की अवैध मांग ने लंबे समय तक हाथियों के शिकार को बढ़ावा दिया है। इसका असर हाथियों की आबादी के साथ-साथ उनके सामाजिक ढांचे पर भी पड़ता है, क्योंकि नर हाथी झुंड की आनुवंशिक विविधता और सामाजिक संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, हाथी केवल जंगल में रहने वाला एक बड़ा जीव नहीं है, बल्कि वह पारिस्थितिकी तंत्र की महत्वपूर्ण कड़ी है। उन्हें ‘कीस्टोन प्रजाति’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि उनका अपने आसपास के पर्यावरण पर व्यापक प्रभाव होता है। हाथी पेड़ों और वनस्पतियों के बीजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने, जंगल की वनस्पति को प्रभावित करने और दूसरे जीवों के लिए आवास तैयार करने में भूमिका निभाते हैं।

हाथियों की मौजूदगी से जंगलों में जैव विविधता को भी बढ़ावा मिलता है। उनके आवागमन और भोजन की आदतों से वन क्षेत्र में कई तरह के प्राकृतिक बदलाव होते हैं, जिनका लाभ अन्य वन्यजीवों को भी मिलता है। इसलिए हाथियों का संरक्षण केवल हाथियों को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे जंगल और उससे जुड़े जीव-जंतुओं के संरक्षण से जुड़ा विषय है।

अनुमान के मुताबिक, दुनिया के जंगलों में अब करीब 40,000 से 45,000 एशियाई हाथी ही बचे हैं। भारत एशियाई हाथियों के संरक्षण के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण देश है। देश में हाथियों की एक बड़ी आबादी मौजूद है और उनके संरक्षण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत में हाथियों की आबादी के नवीनतम अनुमान के अनुसार देश में करीब 22,446 हाथी हैं। हाथियों की आबादी वाले 14 प्रमुख राज्यों में कुल 33 हाथी रिजर्व बनाए गए हैं। ये हाथी रिजर्व करीब 80,000 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को कवर करते हैं। इन संरक्षित क्षेत्रों का उद्देश्य हाथियों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराना और उनके प्राकृतिक आवागमन को बनाए रखना है।

हालांकि, केवल रिजर्व घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। हाथियों के संरक्षण के लिए उनके आवासों को जोड़ने वाले कॉरिडोर की सुरक्षा भी जरूरी है। विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय वन्यजीवों की आवाजाही और उनके प्राकृतिक आवास को ध्यान में रखना आवश्यक है। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में स्थानीय स्तर पर जागरूकता और सहयोग की बड़ी भूमिका होती है।

हाथियों के संरक्षण के लिए अवैध शिकार पर प्रभावी रोक, जंगलों की सुरक्षा, कॉरिडोर को अतिक्रमण से बचाना और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के उपायों पर एक साथ काम करने की जरूरत है। तकनीक की मदद से हाथियों की आवाजाही पर निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान और समय रहते ग्रामीणों को चेतावनी देने जैसे उपाय भी कारगर हो सकते हैं।

इसलिए ‘द एलीफेंट इन द रूम’ केवल एक मुहावरा नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की उस चुनौती की ओर इशारा करता है, जिसे नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है। हाथियों को बचाने का अर्थ केवल एक लुप्तप्राय प्रजाति को बचाना नहीं, बल्कि जंगलों, जैव विविधता और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के भविष्य को सुरक्षित करना भी है। हाथियों के लिए सुरक्षित जंगल और खुले कॉरिडोर सुनिश्चित करना अब संरक्षण की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल होना चाहिए।

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