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छोटी फिल्मों के लिए भी है थिएटर में जगह, बस दर्शकों से जुड़ना जरूरी: प्रकाश झा
SHIDDHANT
12 March 2026 9:25 PM IST

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Mumbai मुंबई। फिल्म इंडस्ट्री में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि बड़े बजट और बड़े सितारों वाली फिल्मों के सामने छोटे बजट की फिल्मों को सिनेमाघरों में उतनी जगह नहीं मिल पाती। इस मुद्दे पर अब राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्माता प्रकाश झा ने को दिए इंटरव्यू में खुलकर अपनी राय रखी है। उनका मानना है कि फिल्म इंडस्ट्री में हर तरह की फिल्मों के लिए जगह है, लेकिन असली चुनौती यह है कि फिल्म दर्शकों से कितनी जुड़ पाती है।
आईएएनएस से बातचीत के दौरान प्रकाश झा ने कहा, ''आज भी सिनेमाघरों में छोटी फिल्मों के लिए मौके मौजूद हैं। कई छोटे बजट की फिल्में थिएटर में रिलीज होती हैं और दर्शकों तक पहुंचती भी हैं। उदाहरण के लिए, जमशेदपुर वाले मल्टीप्लेक्स में एक ही समय में कई फिल्में चलती रहती हैं। कभी-कभी वहां एक साथ करीब 12 फिल्में भी प्रदर्शित हो रही होती हैं। इनमें से कुछ फिल्मों के एक शो होते हैं, कुछ के दो शो होते हैं और कुछ के चार शो भी चलते हैं। अलग-अलग फिल्मों को उनकी मांग और दर्शकों की रुचि के हिसाब से स्क्रीन और समय दिया जाता है।''
उन्होंने कहा, ''छोटे बजट की फिल्मों के सामने आर्थिक चुनौतियां जरूर होती हैं। जब कोई फिल्म थिएटर में रिलीज की जाती है, तो उसके साथ कई तरह के खर्च जुड़ जाते हैं, जैसे सिनेमाघर किराए पर लेना, फिल्म का प्रचार करना, तकनीकी सुविधाओं का खर्च और वितरण से जुड़े अन्य खर्च। इन सबको मिलाकर फिल्म की लागत बढ़ जाती है। छोटे बजट की फिल्मों के लिए यह खर्च कई बार भारी पड़ सकता है और इससे उनके मुनाफे का हिस्सा कम हो जाता है। यही कारण है कि कई निर्माता जोखिम लेने के बजाय सीधे ओटीटी प्लेटफॉर्म का रास्ता चुन लेते हैं।''
प्रकाश झा ने कहा, ''अगर मुझे लगता है कि थिएटर रिलीज में ज्यादा खर्च और जोखिम है, तो मैं ओटीटी को प्राथमिकता दूंगा। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि थिएटर में छोटे बजट की फिल्मों के लिए कोई जगह नहीं है। आज के समय में पहले से ज्यादा अवसर मौजूद हैं, बस जरूरत है सही तरीके से दर्शकों तक पहुंचने की।''
उन्होंने फिल्म बनाने के नजरिये पर भी अपनी राय रखी। प्रकाश झा ने कहा, ''जब भी कोई फिल्म बनाई जाए, तो सबसे पहले यह सोचना जरूरी है कि फिल्म किस तरह की है और वह किस दर्शक वर्ग के लिए बनाई जा रही है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि फिल्म दर्शकों से किस तरह जुड़ पाएगी। फिल्म चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, अगर वह दर्शकों के दिल को नहीं छू पाती, तो उसकी सफलता मुश्किल हो जाती है।''
उन्होंने आगे कहा, ''फिल्म का असली उद्देश्य दर्शकों के साथ इमोशनल रिश्ता बनाना होना चाहिए। अगर फिल्म दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेती है, तो वह सफल हो जाती है। लेकिन अगर फिल्म दर्शकों से जुड़ नहीं पाती, तो फिर उसकी कहानी या संदेश कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह दर्शकों पर असर नहीं छोड़ पाती।''
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