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समुद्र का बढ़ता स्तर मुंबई के लिए कितना खतरनाक सामने आई चिंता
Ratna Netam
7 Sept 2026 5:13 PM IST

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मुंबई। देश की आर्थिक राजधानी और सपनों की नगरी कही जाने वाली मुंबई पर जलवायु परिवर्तन का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर, जमीन का धंसना, भारी बारिश और ऊंची समुद्री लहरें भविष्य में शहर के निचले इलाकों के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट में मुंबई समेत दक्षिण एशिया के कई तटीय शहरों को समुद्र के बढ़ते जलस्तर से खतरे को लेकर आगाह किया गया है। इसके बाद बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) ने शहर के लिए नया क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट शुरू कराया है।
इसका मतलब यह नहीं है कि पूरी मुंबई अचानक समुद्र में समा जाएगी। वैज्ञानिक चेतावनी मुख्य रूप से लंबे समय में समुद्र के बढ़ते स्तर से निचले तटीय इलाकों में स्थायी जलभराव, बार-बार बाढ़ और लोगों के विस्थापन के बढ़ते जोखिम को लेकर है।
2100 तक कितना बढ़ सकता है समुद्र का स्तर?
संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी हालिया रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में वैश्विक औसत समुद्र स्तर में रिकॉर्ड 5.9 मिलीमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई थी। रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि उत्सर्जन में तेजी से कमी लाने के बावजूद इस सदी के आखिर यानी 2100 तक वैश्विक समुद्र स्तर कम से कम करीब आधा मीटर बढ़ सकता है।
वहीं बेहद प्रतिकूल परिस्थितियों और पश्चिमी अंटार्कटिक बर्फ की चादर में अस्थिरता जैसे कारकों के कारण वृद्धि दो मीटर तक पहुंचने की आशंका वाले परिदृश्य भी मौजूद हैं। मुंबई जैसे समुद्र किनारे बसे घनी आबादी वाले शहर के लिए यह खतरा बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
मुंबई को ज्यादा खतरा क्यों?
मुंबई की भौगोलिक स्थिति इस संकट को और गंभीर बनाती है। शहर का बड़ा हिस्सा समुद्र के बेहद करीब है और कई इलाके कम ऊंचाई पर बसे हुए हैं। समुद्र का स्तर बढ़ने के साथ जमीन का धंसना यानी लैंड सब्सिडेंस भी जोखिम बढ़ा सकता है।
इसके अलावा मुंबई में मानसून के दौरान पहले से भारी बारिश और जलभराव की समस्या देखने को मिलती है। अगर अत्यधिक बारिश के समय समुद्र में हाई टाइड हो और भविष्य में समुद्र का औसत स्तर भी बढ़ जाए तो पानी की निकासी और मुश्किल हो सकती है।
खारे पानी का भी बढ़ सकता है खतरा
समुद्र का जलस्तर बढ़ने का असर सिर्फ तटीय इलाकों में पानी भरने तक सीमित नहीं रहेगा। समुद्र का खारा पानी जमीन के अंदर मौजूद मीठे पानी के स्रोतों तक पहुंच सकता है। इसे सॉल्टवॉटर इंट्रूजन कहा जाता है।
इससे भूजल, कुओं और दूसरे मीठे पानी के स्रोत प्रभावित हो सकते हैं। साथ ही तटीय बुनियादी ढांचे, इमारतों और परिवहन नेटवर्क के सामने भी नई चुनौतियां पैदा हो सकती हैं।
BMC कराएगी 149 किलोमीटर तट का अध्ययन
बढ़ते खतरे को देखते हुए BMC ने मुंबई की समुद्र स्तर वृद्धि से जुड़ी संवेदनशीलता का नया अध्ययन शुरू कराया है। करीब पांच साल में यह दूसरी ऐसी कवायद है।
नए असेसमेंट में मुंबई की करीब **149 किलोमीटर लंबी तटरेखा** का अध्ययन किया जाएगा। इसमें उन इलाकों की पहचान की जाएगी जहां भविष्य में समुद्री जलस्तर बढ़ने से सबसे अधिक खतरा हो सकता है। शहर में भूमि उपयोग, तटीय निर्माण और पिछले कुछ वर्षों में हुए बदलावों को भी अध्ययन में शामिल किया जाएगा।
मुंबई के समुद्री किनारे पर पिछले वर्षों में बड़े बदलाव हुए हैं। कोस्टल रोड परियोजना के लिए समुद्र से 100 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन रिक्लेम की गई है। पूर्वी हिस्से में साल्ट पैन भूमि के विकास से जुड़े प्रस्ताव भी चर्चा में रहे हैं। इन्हीं बदलावों के कारण नए सिरे से जोखिम का आकलन जरूरी माना गया है।
अगले साल आएगी नई रिपोर्ट
BMC के नए अध्ययन की रिपोर्ट अगले साल आने की उम्मीद है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि मुंबई के कौन से इलाके सबसे ज्यादा संवेदनशील हैं और वहां किस तरह के बचाव तथा अनुकूलन उपायों की जरूरत होगी।
जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र का बढ़ता स्तर अकेला खतरा नहीं है। मुंबई के लिए अत्यधिक बारिश, हाई टाइड, तूफानी लहरें, जमीन का धंसना और अनियोजित शहरी विकास जब एक साथ आते हैं तो जोखिम कई गुना बढ़ सकता है।
इसलिए 'मुंबई समुद्र में समा जाएगी' जैसी बात को तत्काल होने वाली घटना के रूप में देखने के बजाय आने वाले दशकों के गंभीर जलवायु खतरे की चेतावनी के तौर पर समझना जरूरी है। सवाल यह नहीं है कि मुंबई कल डूब जाएगी, बल्कि यह है कि बढ़ते समुद्री स्तर के लिए शहर आज से कितनी मजबूत तैयारी करता है।
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