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धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे से जुड़े हैं: भागवत

Kavita2
2 Oct 2026 1:25 PM IST
धर्म और राष्ट्र एक-दूसरे से जुड़े हैं: भागवत
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मुंबई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि भारत में धर्म और राष्ट्र को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि भारत की आध्यात्मिक और ज्ञान परंपरा के पास दुनिया के सामने मौजूद कई जटिल चुनौतियों का समाधान देने की क्षमता है। भागवत ने यह बात ऑल इंडिया विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही।

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कहा कि भारत की दृष्टि में राष्ट्र और धर्म एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा, “हमारा राष्ट्र और धर्म अलग-अलग नहीं हैं। राष्ट्र का उद्देश्य धर्म है, और धर्म राष्ट्र को बनाए रखने में मदद करता है। दोनों एक-दूसरे पर निर्भर हैं।” उनके मुताबिक भारतीय परंपरा में धर्म को केवल पूजा-पद्धति या किसी विशेष संप्रदाय तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि इसे जीवन को व्यवस्थित करने वाले व्यापक सिद्धांत के रूप में देखा जाता है।

भागवत ने दुनिया के मौजूदा हालात का जिक्र करते हुए कहा कि आज मानव समाज कई तरह के विरोधाभासों और दुविधाओं का सामना कर रहा है। एक तरफ विकास और आर्थिक प्रगति की जरूरत है तो दूसरी तरफ पर्यावरण संरक्षण की चुनौती है। इसी तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन को लेकर भी समाज के सामने सवाल हैं। धार्मिक आस्था, अलग-अलग विचारधाराओं और संघर्षों के बीच भी दुनिया लगातार संतुलन तलाश रही है।

उन्होंने कहा कि आधुनिक दुनिया में कई उपलब्धियों के बावजूद संतुलन की समस्या बनी हुई है। भागवत के शब्दों में, दुनिया ऐसी स्थिति से गुजर रही है जहां हर खुशी अधूरी रह जाती है और हर उम्मीद के साथ किसी न किसी नुकसान की आशंका जुड़ी रहती है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग निष्ठाएं आपस में टकरा रही हैं और परिस्थितियों की तीव्रता लगातार बढ़ रही है। उनके मुताबिक यही वजह है कि दुनिया को एक ऐसी जीवन-दृष्टि की जरूरत है जो अलग-अलग पक्षों के बीच संतुलन स्थापित कर सके।

मोहन भागवत ने भारत की आध्यात्मिक विरासत को इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने लंबे समय से व्यक्ति, समाज, प्रकृति और व्यापक मानव समुदाय के बीच संबंधों को एक साथ देखने की कोशिश की है। उनके अनुसार भारत की परंपरा में जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों के नजरिए से नहीं देखा गया, बल्कि उसके नैतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक पक्षों को भी महत्व दिया गया है।

भागवत ने कहा कि दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं का समाधान केवल तकनीक या आर्थिक संसाधनों से नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने संतुलित दृष्टिकोण और जीवन के व्यापक उद्देश्यों को समझने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक भारत की आध्यात्मिक परंपराओं में ऐसे विचार मौजूद हैं जो मनुष्य और समाज के बीच जिम्मेदारी, संयम और सामंजस्य की भावना को मजबूत करते हैं।

उन्होंने धर्म की भूमिका को राष्ट्र और समाज से जोड़ते हुए कहा कि धर्म व्यक्ति के आचरण और कर्तव्य को दिशा देता है। उनके अनुसार जब लोग अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को समझते हैं तो समाज में स्थिरता और सहयोग की भावना मजबूत होती है। भागवत ने कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका प्रभाव सामाजिक व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए।

मोहन भागवत इससे पहले भी धर्म की भारतीय अवधारणा को पश्चिमी ‘रिलिजन’ की अवधारणा से अलग बताते रहे हैं। सितंबर में उज्जैन में आयोजित युवा धर्म संसद में उन्होंने कहा था कि भारत में धर्म को सत्य, करुणा, पवित्रता और आत्म-अनुशासन जैसे मूल्यों से जोड़ा जाता है। उन्होंने कहा था कि भारतीय संदर्भ में धर्म को केवल किसी एक पंथ या पूजा-पद्धति के अर्थ में समझना उचित नहीं है।

शुक्रवार के सम्मेलन में भी उनके वक्तव्य का केंद्र भारत की इसी व्यापक जीवन-दृष्टि पर रहा। उन्होंने दुनिया के सामने मौजूद समस्याओं को केवल राजनीतिक या आर्थिक नजरिए से देखने के बजाय उनके मानवीय और नैतिक पहलुओं पर विचार करने की बात कही।

भागवत ने पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन का उदाहरण देते हुए कहा कि आधुनिक समाज के सामने यह बड़ी चुनौती है कि विकास की जरूरतें पूरी करते हुए प्रकृति की रक्षा कैसे की जाए। इसी तरह उन्होंने व्यक्तिगत अधिकारों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच संतुलन को भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न बताया। धार्मिक विश्वासों के संदर्भ में उन्होंने संघर्ष और सह-अस्तित्व की चुनौती का उल्लेख किया।

उन्होंने कहा कि जब किसी एक लक्ष्य को हासिल करने के प्रयास में दूसरे महत्वपूर्ण पक्षों की अनदेखी होती है तो असंतुलन पैदा होता है। उनके मुताबिक दुनिया को ऐसी सोच की जरूरत है जो विभिन्न आवश्यकताओं को एक-दूसरे का विरोधी मानने के बजाय उनके बीच सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश करे।

आरएसएस प्रमुख ने भारतीय परंपरा में मौजूद एकता और विविधता के विचार को भी महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार भारत की सभ्यतागत सोच में अलग-अलग पंथों, भाषाओं और जीवनशैलियों के बीच सह-अस्तित्व की अवधारणा रही है। उन्होंने कहा कि विविधता को बनाए रखते हुए व्यापक एकता की भावना विकसित करना आज की दुनिया के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

हाल के वर्षों में मोहन भागवत ने अपने कई सार्वजनिक संबोधनों में धर्म, समाज और मानवता से जुड़े मुद्दों पर विचार रखे हैं। अगस्त में न्यूयॉर्क में आयोजित एक अंतरधार्मिक कार्यक्रम में भी उन्होंने मानव एकता और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के बीच संवाद की आवश्यकता पर जोर दिया था।

शुक्रवार के सम्मेलन में भागवत का संदेश भी इसी व्यापक संदर्भ में सामने आया। उन्होंने कहा कि भारत को दुनिया के सामने मौजूद चुनौतियों के समाधान में अपनी ज्ञान परंपरा और आध्यात्मिक अनुभवों की भूमिका को समझना चाहिए। उनके मुताबिक भारत का योगदान केवल आर्थिक या तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन और समाज को संतुलित करने वाली विचारधारा के स्तर पर भी हो सकता है।

उन्होंने दुनिया की वर्तमान स्थिति को चुनौतीपूर्ण बताते हुए कहा कि मानव समाज के सामने अब ऐसे सवाल हैं जिनका कोई आसान या एकतरफा समाधान नहीं है। विकास, परिवार, स्वतंत्रता, धर्म और पर्यावरण जैसे विषयों में एक-दूसरे से जुड़े कई हित शामिल हैं। इसलिए उनके मुताबिक समाधान के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है।

भागवत ने अपने संबोधन में भारत की भूमिका को इसी समग्र सोच से जोड़ते हुए कहा कि देश की आध्यात्मिक विरासत दुनिया के लिए उपयोगी विचार और दृष्टि प्रदान कर सकती है। उन्होंने राष्ट्र और धर्म के संबंध को भारतीय संदर्भ में परस्पर निर्भर बताते हुए सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में धर्म की व्यापक भूमिका पर जोर दिया।

उनके इस बयान के साथ सम्मेलन में मौजूद लोगों के बीच भारत की ज्ञान परंपरा और उसके वैश्विक योगदान को लेकर चर्चा भी हुई। भागवत के अनुसार दुनिया जिस असंतुलन और दुविधा से गुजर रही है, उसके बीच भारत की आध्यात्मिक सोच एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत कर सकती है।

उन्होंने कहा कि आज जरूरत केवल नई तकनीक और नई नीतियां बनाने की नहीं है, बल्कि यह समझने की भी है कि मनुष्य, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए। यही वह क्षेत्र है जहां भारत की परंपरागत सोच अपनी भूमिका निभा सकती है।

मोहन भागवत का यह संबोधन ऐसे समय आया है जब धर्म, सामाजिक मूल्यों, पर्यावरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दों पर दुनिया भर में लगातार बहस चल रही है। उनके मुताबिक इन सभी सवालों को अलग-अलग देखने के बजाय एक-दूसरे से जुड़े विषयों के रूप में समझना जरूरी है। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक ज्ञान परंपरा को इसी व्यापक चुनौती के संदर्भ में प्रासंगिक बताया।

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