महाराष्ट्र

Ramlal का दावा: इमरजेंसी विरोध से 1977 चुनाव संभव हुए

Kavita2
24 May 2026 10:51 AM IST
Ramlal का दावा: इमरजेंसी विरोध से 1977 चुनाव संभव हुए
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Maharashtra महाराष्ट्र: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वरिष्ठ नेता और अखिल भारतीय संपर्क प्रमुख रामलाल ने शनिवार को कहा कि यदि संघ के कार्यकर्ताओं ने आपातकाल के खिलाफ बड़े पैमाने पर “सत्याग्रह” में भाग नहीं लिया होता, तो 1977 में आम चुनाव नहीं कराए जाते। उन्होंने यह बात कोंकण डिवीजन की RSS बैठक के समापन सत्र में कही।

रामलाल ने अपने संबोधन में 1975 में लागू इमरजेंसी के दौर को याद करते हुए कहा कि उस समय देश में लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर प्रतिबंध लगाए गए थे और विरोध की आवाजों को दबाया जा रहा था। उन्होंने दावा किया कि RSS के स्वयंसेवकों ने उस समय सक्रिय रूप से विरोध किया और बड़ी संख्या में जेल भी गए।

उन्होंने कहा, “अगर RSS के वॉलंटियर्स ने इमरजेंसी के दौरान इतनी बड़ी संख्या में सत्याग्रह में हिस्सा नहीं लिया होता और जेलें नहीं भरी होतीं, तो सरकार आम चुनावों का ऐलान नहीं करती और जनता पार्टी सत्ता में नहीं आती।”

रामलाल ने आगे कहा कि यदि उस समय परिस्थितियां ऐसे ही चलती रहतीं, तो देश में लंबे समय तक एक प्रकार की तानाशाही व्यवस्था बनी रहती। उनके अनुसार, इमरजेंसी के खिलाफ हुए जनआंदोलन और विभिन्न संगठनों के विरोध ने लोकतंत्र की बहाली में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में विभिन्न स्तरों पर विरोध प्रदर्शन, सत्याग्रह और आंदोलन ने जनता में जागरूकता बढ़ाई, जिससे राजनीतिक बदलाव की जमीन तैयार हुई। रामलाल के मुताबिक, यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में दर्ज है।

बैठक के दौरान RSS के संगठनात्मक कार्यों और क्षेत्रीय गतिविधियों पर भी चर्चा की गई। कोंकण डिवीजन की इस बैठक में संगठन के विस्तार, सामाजिक कार्यों और आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा पर विचार किया गया।

रामलाल के इस बयान को 1975-77 के इमरजेंसी काल की राजनीतिक भूमिका और उससे जुड़े विभिन्न संगठनों की भागीदारी के संदर्भ में देखा जा रहा है। इमरजेंसी भारत के राजनीतिक इतिहास का वह दौर माना जाता है जब नागरिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया था और कई विपक्षी नेताओं को जेल में डाला गया था।

इस अवधि के दौरान हुए आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को लेकर विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं। रामलाल का यह बयान उसी ऐतिहासिक बहस को एक बार फिर चर्चा में ले आया है।

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