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Pune: माधव गाडगिल के जाने से पर्यावरण समुदाय में शोक

Admindelhi1
8 Jan 2026 3:53 PM IST
Pune: माधव गाडगिल के जाने से पर्यावरण समुदाय में शोक
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पर्यावरण जगत को लगा बड़ा झटका

पुणे: भारत के जाने-माने पारिस्थितिकी विज्ञानी और पश्चिमी घाट संरक्षण से जुड़े अपने ऐतिहासिक कार्यों के लिए प्रसिद्ध माधव गाडगिल का बुधवार देर रात (7 जनवरी 2026) पुणे स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह 82 वर्ष के थे और कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके पुत्र सिद्धार्थ गाडगिल ने गुरुवार (8 जनवरी 2026) को उनके निधन की पुष्टि की।

उनका अंतिम संस्कार गुरुवार शाम 4 बजे पुणे के वैकुंठ श्मशान घाट में किया जाएगा।

माधव गाडगिल को विशेष रूप से पश्चिमी घाट के पारिस्थितिक महत्व पर किए गए उनके कार्यों के लिए जाना जाता है। वर्ष 2024 में संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘चैंपियंस ऑफ द अर्थ’ पुरस्कार से सम्मानित किया था, जो पर्यावरण के क्षेत्र में दिया जाने वाला सर्वोच्च वैश्विक सम्मान है। यह सम्मान उन्हें पश्चिमी घाट जैसे वैश्विक जैव-विविधता हॉटस्पॉट पर उनके मौलिक और दीर्घकालिक योगदान के लिए प्रदान किया गया था।

श्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) के अध्यक्ष के रूप में तैयार की गई उनकी रिपोर्ट में अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में सख्त प्रतिबंधों की सिफारिश की गई थी। इनमें नए सड़क और भवन निर्माण पर रोक, खड़ी ढलानों पर विकास कार्यों पर प्रतिबंध और पत्थर खनन पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी अहम सिफारिशें शामिल थीं। इस रिपोर्ट ने देशभर में विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया था।

गाडगिल ने पश्चिमी घाट में हो रही प्राकृतिक आपदाओं पर चिंता जताते हुए कहा था कि यदि उनकी सिफारिशों को समय पर लागू किया जाता, तो कई आपदाओं को टाला जा सकता था। उन्होंने विकास के ऐसे मॉडल की आलोचना की थी, जिसमें स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना खनन और प्रदूषणकारी उद्योग थोपे गए

पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि माधव गाडगिल एक उत्कृष्ट वैज्ञानिक, जमीनी स्तर पर काम करने वाले शोधकर्ता, संस्थान निर्माता और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने कहा कि गाडगिल पिछले पांच दशकों से कई लोगों के लिए मार्गदर्शक और प्रेरणा स्रोत रहे।

माधव गाडगिल का जन्म पुणे में हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक और उच्च शिक्षा पुणे और मुंबई में प्राप्त की। मुंबई विश्वविद्यालय से परास्नातक करने के बाद उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से गणितीय पारिस्थितिकी में पीएचडी की। वह हार्वर्ड से इस विषय में डिग्री पाने वाले पहले जीवविज्ञान छात्र थे।

वर्ष 1973 से 2004 तक उन्होंने भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) में कार्य किया और 1983 में वहां सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज़ की स्थापना की। अपने करियर में उन्होंने 225 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए। उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, पद्म श्री और पद्म भूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था।

गाडगिल पिछले चार दशकों से पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत में स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर काम कर रहे थे। उन्होंने 1986 में भारत की पहली बायोस्फियर रिज़र्व परियोजना के प्रस्ताव में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और जैव विविधता अधिनियम 2003 तथा वन अधिकार अधिनियम 2006 के निर्माण में योगदान दिया था।

वह अपने पीछे एक पुत्र, एक पुत्री, बहू, दामाद और पोते-पोतियों को छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी का निधन पिछले वर्ष हो गया था। उनके पिता धनंजय गाडगिल देश के प्रख्यात अर्थशास्त्री और योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष थे।

माधव गाडगिल के निधन से भारतीय पर्यावरणीय शोध और संरक्षण आंदोलन को अपूरणीय क्षति मानी जा रही है।

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