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मराठवाड़ी बोली को संरक्षित करने की जरूरत, भाषा विशेषज्ञ डॉ. सुशील धस्काटे ने जताई चिंता

छत्रपति संभाजीनगर। मराठवाड़ा की पारंपरिक बोली और भाषाई पहचान को संरक्षित करने की जरूरत पर भाषा विशेषज्ञों ने जोर दिया है। प्रसिद्ध भाषा विशेषज्ञ और विद्वान डॉ. सुशील धस्काटे ने कहा कि मराठवाड़ी बोली कभी महाराष्ट्र की मानक भाषा के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखती थी, लेकिन समय के साथ दूसरी बोलियों की तरह इसे भी दबाव का सामना करना पड़ा।
उन्होंने कहा कि मराठवाड़ी बोली का दस्तावेजीकरण और रिकॉर्ड तैयार करना जरूरी है, ताकि इस क्षेत्र की भाषाई विरासत सुरक्षित रह सके।
मराठवाड़ी बोली पर जताई चिंता
डॉ. सुशील धस्काटे ने कहा कि भाषा केवल बातचीत का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह किसी क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास और परंपराओं को भी दर्शाती है।
उन्होंने कहा कि मराठवाड़ा क्षेत्र की बोली में स्थानीय संस्कृति और जीवन शैली की झलक मिलती है। इसलिए इसे संरक्षित करना आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण है।
मानक भाषा और क्षेत्रीय बोलियों पर चर्चा
भाषा विशेषज्ञ ने कहा कि समय के साथ पुणे क्षेत्र में प्रचलित मराठी को मानक भाषा के रूप में अधिक स्वीकार्यता मिली। इसके कारण मराठवाड़ी जैसी क्षेत्रीय बोलियों का महत्व कम होता गया।
उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय बोलियों को कमजोर करने के बजाय उन्हें भाषा की विविधता के रूप में देखा जाना चाहिए।
मराठवाड़ा मुक्ति दिवस पर कार्यक्रम
गुरुवार को डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर मराठवाड़ा यूनिवर्सिटी (BAMU) में 78वें मराठवाड़ा मुक्ति दिवस के अवसर पर विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए।
कार्यक्रम की शुरुआत ध्वजारोहण से हुई। विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विजय फुल्लारी ने मुख्य भवन के सामने स्थित लॉन में झंडा फहराया।
इस दौरान विश्वविद्यालय के अधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थी मौजूद रहे।
भाषाई विरासत पर हुआ व्याख्यान
मराठवाड़ा मुक्ति दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में इतिहास, संस्कृति और भाषा से जुड़े विषयों पर व्याख्यान भी आयोजित किए गए।
इन कार्यक्रमों में क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान पर चर्चा की गई।
भाषा विशेषज्ञों ने कहा कि किसी भी क्षेत्र की पहचान उसकी भाषा और बोलियों से जुड़ी होती है।
मराठवाड़ा की ऐतिहासिक पहचान
मराठवाड़ा क्षेत्र का अपना अलग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व रहा है। मराठवाड़ा मुक्ति दिवस इस क्षेत्र के इतिहास से जुड़ा महत्वपूर्ण दिन है।
यह दिन हैदराबाद रियासत से मराठवाड़ा के भारतीय संघ में शामिल होने की स्मृति में मनाया जाता है।
बोलियों के संरक्षण की आवश्यकता
डॉ. धस्काटे ने कहा कि आज के दौर में कई स्थानीय बोलियां धीरे-धीरे कम इस्तेमाल हो रही हैं। इसका असर भाषा की विविधता पर पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि बोलियों को बचाने के लिए उनका संग्रह, अध्ययन और रिकॉर्ड तैयार करना जरूरी है।
स्थानीय भाषा से जुड़ी संस्कृति
मराठवाड़ी बोली में लोक साहित्य, कहावतें, लोकगीत और क्षेत्रीय शब्दावली शामिल है। ये सभी क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा हैं।
भाषा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इनका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इस विरासत से दूर हो सकती हैं।
विश्वविद्यालय की भूमिका अहम
BAMU जैसे शैक्षणिक संस्थान क्षेत्रीय भाषा और संस्कृति के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
शोध, दस्तावेजीकरण और अध्ययन के माध्यम से स्थानीय बोलियों को नई पहचान दी जा सकती है।
भाषाई विविधता को बचाने पर जोर
कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने कहा कि महाराष्ट्र की भाषाई समृद्धि उसकी विभिन्न बोलियों में छिपी हुई है। मराठी की अलग-अलग क्षेत्रीय बोलियां भाषा को और मजबूत बनाती हैं।
मराठवाड़ी बोली के संरक्षण की मांग इसी भाषाई विविधता को बनाए रखने की दिशा में एक प्रयास है।
मराठवाड़ा मुक्ति दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में इतिहास और संस्कृति के साथ भाषा संरक्षण का मुद्दा भी प्रमुखता से सामने आया।





