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मुंबई। हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित अपने आवास पर कार्डियक अरेस्ट के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। उनके निधन से भारतीय सिनेमा ने एक ऐसे अभिनेता को खो दिया, जिसने अपनी दमदार आवाज, बेबाक अंदाज और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई थी। नाना पाटेकर ने अपने करियर के कई दशक मुंबई में बिताए, लेकिन इस शहर के साथ उनका रिश्ता हमेशा अलग रहा। फिल्मों ने उन्हें पहचान, सफलता और सम्मान दिया, फिर भी वह मुंबई की भागदौड़ और बदलते सामाजिक माहौल से दूरी बनाकर रहना पसंद करते थे। उन्होंने कई साक्षात्कारों में स्पष्ट किया था कि मुंबई उन्हें रहने के लिए पसंद नहीं थी और गांव का जीवन उन्हें अधिक सुकून देता था।
मुंबई में मिली पहचान, लेकिन शहर से नहीं जुड़ पाया मन
नाना पाटेकर का अभिनय करियर मुंबई और मराठी रंगमंच से गहराई से जुड़ा रहा। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा फिल्मों, थिएटर और कलाकारों के बीच बिताया। इसके बावजूद शहर की तेज रफ्तार जिंदगी उन्हें कभी विशेष रूप से आकर्षित नहीं कर सकी।
वर्ष 2015 में दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि मुंबई उन्हें कभी रास नहीं आई। उन्होंने बताया था कि मुंबई से कुछ दूरी पर उनका फार्महाउस है और वहीं रहना उन्हें अच्छा लगता है।
उनका मानना था कि शहरों की भीड़भाड़ से दूर शांत वातावरण में जीवन बिताना अधिक सुखद है। यही कारण था कि फिल्मों में सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने ग्रामीण जीवन से अपना जुड़ाव बनाए रखा।
पुराने बंबई की यादों से था गहरा लगाव
नाना पाटेकर ने एक साक्षात्कार में बताया था कि उन्हें पुराना बंबई बहुत प्रिय था, लेकिन समय के साथ शहर काफी बदल गया।
फिल्मफेयर को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि शहर का नाम बंबई से मुंबई हो गया, लेकिन उनके लिए बड़ा बदलाव यहां के सामाजिक माहौल में आया था।
उनके अनुसार, पहले मुंबई की पहचान विभिन्न समुदायों के बीच मेलजोल और आपसी सद्भाव से होती थी। लेकिन बाद में उन्हें महसूस हुआ कि राजनीति, धर्म और जाति के आधार पर समाज में दूरियां बढ़ गई हैं।
उन्होंने बदलते सामाजिक संबंधों को लेकर चिंता व्यक्त की थी। उनका कहना था कि शहर की पुरानी आत्मीयता अब पहले जैसी नहीं रह गई है।
नाना के लिए मुंबई केवल ऊंची इमारतों, चमकदार सड़कों और फिल्म स्टूडियो का नाम नहीं था। उनकी यादों में वह पुराना शहर बसा हुआ था, जहां लोगों के बीच आपसी संबंध अधिक महत्वपूर्ण हुआ करते थे।
भीड़भाड़ से होती थी परेशानी
नाना पाटेकर ने वर्ष 2009 में दिए एक इंटरव्यू में मुंबई की बढ़ती भीड़ को लेकर भी अपनी परेशानी बताई थी।
उन्होंने कहा था कि फिल्मों में भीड़ के बीच काम करने में उन्हें दिक्कत नहीं होती, लेकिन वास्तविक जीवन में लोगों की अत्यधिक भीड़ उन्हें असहज करती है।
उन्होंने 1965-66 के मुंबई को याद करते हुए कहा था कि उस समय का शहर वर्तमान मुंबई से बिल्कुल अलग था।
उनका मानना था कि शहर की तेजी से बदलती परिस्थितियों ने उसके पुराने स्वरूप को पीछे छोड़ दिया है।
इसी कारण वह मुंबई में लगातार रहने के बजाय पुणे के पास अपने फार्महाउस में समय बिताना अधिक पसंद करते थे।
गांव की जिंदगी में मिलता था सुकून
नाना पाटेकर ने फिल्मी चकाचौंध के बजाय ग्रामीण जीवन को अधिक महत्व दिया। उन्होंने अपने फार्महाउस को रहने के लिए पसंदीदा स्थान बनाया।
वह प्रकृति, खेती और ग्रामीण परिवेश से जुड़े रहना पसंद करते थे। उनके लिए गांव केवल छुट्टियां बिताने की जगह नहीं था, बल्कि जीवन जीने का एक अलग तरीका था।
नाना ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि गांव में करने के लिए फिल्मों से भी अधिक दिलचस्प काम हैं।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह हर समय फिल्मों के बारे में नहीं सोचते। उनके जीवन में सामाजिक कार्यों और ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं के लिए भी महत्वपूर्ण स्थान था।
यही सोच उन्हें दूसरे फिल्मी सितारों से अलग पहचान देती थी।
फिल्मों की चमक से ज्यादा किसानों की चिंता
नाना पाटेकर का ग्रामीण जीवन से जुड़ाव उनके सामाजिक कार्यों में भी दिखाई देता था। महाराष्ट्र में सूखा और किसानों की आत्महत्या की घटनाओं ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया था।
उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर वर्ष 2015 में नाम फाउंडेशन की स्थापना की।
इस संस्था के माध्यम से सूखा प्रभावित किसानों और आर्थिक संकट का सामना कर रहे परिवारों की सहायता की गई।
संस्था ने जल संरक्षण और ग्रामीण विकास से जुड़े कई कार्यक्रम भी चलाए।
नाना पाटेकर ने स्वयं गांवों में जाकर किसानों की समस्याओं को समझने और उनकी मदद करने का प्रयास किया। उन्हें लगता था कि समाज की वास्तविक चुनौतियों को समझने के लिए आम लोगों के बीच जाना जरूरी है।
सादगी भरा जीवन रहा उनकी पहचान
फिल्मों में बड़ी सफलता मिलने के बावजूद नाना पाटेकर का व्यक्तिगत जीवन अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण रहा।
उनके पास मुंबई में एक साधारण एक बेडरूम वाला फ्लैट था, जिसे उन्होंने कई दशक पहले खरीदा था। वह इस घर में अपनी मां के साथ भी रहे थे।
संपत्ति और प्रसिद्धि के बावजूद उनका ध्यान विलासितापूर्ण जीवनशैली पर नहीं रहा। वह अक्सर अपनी जरूरतों को सीमित रखने की बात करते थे।
उनका मानना था कि इंसान को अपनी जरूरतों के अनुसार जीवन जीना चाहिए। धन और प्रसिद्धि हमेशा व्यक्ति को संतोष नहीं दे सकते।
मराठी थिएटर से बॉलीवुड तक शानदार सफर
नाना पाटेकर ने अपने अभिनय की शुरुआत मराठी रंगमंच से की थी। इसके बाद वर्ष 1978 में फिल्म 'गमन' के माध्यम से हिंदी सिनेमा में कदम रखा।
'परिंदा', 'क्रांतिवीर', 'प्रहार', 'तिरंगा', 'अग्निसाक्षी', 'अब तक छप्पन' और 'वेलकम' जैसी फिल्मों ने उन्हें व्यापक लोकप्रियता दिलाई।
मराठी फिल्म 'नटसम्राट' में उनके अभिनय को भी काफी सराहा गया।
अपने लंबे फिल्मी करियर में उन्होंने तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार हासिल किए। वर्ष 2013 में भारतीय सिनेमा में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
मुंबई ने बनाया सितारा, लेकिन गांव से जुड़ा रहा दिल
नाना पाटेकर की जिंदगी का सबसे दिलचस्प पहलू यही था कि जिस मुंबई ने उन्हें देशभर में प्रसिद्धि दिलाई, उसी शहर में वह स्थायी रूप से रहना पसंद नहीं करते थे।
उन्होंने कभी अपनी अभिनय पहचान से दूरी नहीं बनाई, लेकिन फिल्मी दुनिया को ही अपने जीवन का केंद्र भी नहीं बनाया।
उनके लिए सफलता का मतलब केवल बड़ी फिल्मों में काम करना या प्रसिद्धि हासिल करना नहीं था। वह अपने आसपास के समाज, किसानों और जरूरतमंद लोगों के लिए काम करने को भी महत्व देते थे।
8 अक्टूबर 2026 को उनके निधन के साथ भारतीय सिनेमा के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत हो गया। नाना पाटेकर की फिल्में और यादगार संवाद दर्शकों के बीच बने रहेंगे। साथ ही मुंबई से उनके अलग रिश्ते और गांव की सादगी के प्रति प्रेम की कहानी भी उन्हें याद करने का एक महत्वपूर्ण कारण रहेगी।





