- Home
- /
- राज्य
- /
- महाराष्ट्र
- /
- बॉम्बे HC का बड़ा...
बॉम्बे HC का बड़ा फैसला, कमाने वाले पति-पत्नी मिलकर उठाएं खर्च

मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने पति-पत्नी की आर्थिक जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि अगर पति और पत्नी दोनों कमाते हैं तो घर चलाने और बच्चे की शिक्षा सहित अन्य खर्चों की जिम्मेदारी दोनों को मिलकर उठानी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समानता का दावा केवल सुविधा के हिसाब से नहीं किया जा सकता। दोनों पति-पत्नी की आय है तो परिवार की जिम्मेदारियों में भी दोनों की भागीदारी होनी चाहिए।
यह टिप्पणी बॉम्बे हाई कोर्ट की एकल पीठ ने अलग रह रही पत्नी और नाबालिग बेटे के भरण-पोषण से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने पारिवारिक अदालत के उस आदेश में बदलाव किया, जिसमें पति को पत्नी और बेटे के लिए हर महीने 50 हजार रुपये भरण-पोषण राशि देने का निर्देश दिया गया था। हाई कोर्ट ने इस राशि को घटाकर 25 हजार रुपये प्रति माह कर दिया।
जस्टिस एमएम साथये की पीठ ने अपने आदेश में कहा कि पति और पत्नी दोनों की आय होने के बावजूद यदि परिवार के खर्च का पूरा भार केवल एक व्यक्ति पर डाला जाता है तो यह समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। अदालत ने कहा कि बच्चे की अच्छी शिक्षा और बेहतर जीवन के लिए दोनों अभिभावकों को अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार योगदान देना चाहिए।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि पति मुंबई के अंधेरी इलाके में स्थित उस मकान की ईएमआई चुका रहा है, जिसमें पत्नी और बेटा रह रहे हैं। इसके अलावा नवी मुंबई के पनवेल स्थित दूसरे मकान की ईएमआई का भुगतान भी पति ही कर रहा है। जबकि पति खुद बिहार में रह रहा है। कोर्ट ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहा कि पत्नी दोनों संपत्तियों के लिए किसी तरह का आर्थिक योगदान नहीं दे रही है।
पति ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर मांग की थी कि उसकी मासिक भरण-पोषण राशि को 50 हजार रुपये से घटाकर 25 हजार रुपये किया जाए। उसका कहना था कि वह लगातार दोनों मकानों की ईएमआई चुका रहा है और इसके कारण उस पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है। उसने पत्नी से बिहार में उसके साथ रहने या फिर पनवेल स्थित मकान में रहने का विकल्प भी दिया था, ताकि अंधेरी वाले मकान को बेचकर आर्थिक बोझ कम किया जा सके।
पत्नी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। इस पर अदालत ने कहा कि पति की यह मांग अनुचित नहीं है। अगर पत्नी महंगे इलाके में रहने की सुविधा चाहती है और वह संपत्ति की ईएमआई में कोई योगदान नहीं दे रही है तो पति द्वारा भरण-पोषण राशि कम करने की मांग को गलत नहीं माना जा सकता।
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आधुनिक समय में जब पति और पत्नी दोनों काम कर रहे हैं तो परिवार की जिम्मेदारियां भी साझा होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि समानता केवल अधिकारों तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि जिम्मेदारियों में भी दिखाई देनी चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि पति और पत्नी दोनों चाहते हैं कि उनके बच्चे को बेहतर और महंगी शिक्षा मिले तो उसकी आर्थिक जिम्मेदारी भी दोनों को मिलकर उठानी होगी। बच्चे के भविष्य को बेहतर बनाने के लिए दोनों अभिभावकों का योगदान जरूरी है।
इस फैसले को पारिवारिक विवादों में आर्थिक जिम्मेदारी को लेकर एक अहम टिप्पणी माना जा रहा है। कोर्ट ने यह संदेश दिया है कि वैवाहिक संबंधों में अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन भी जरूरी है। पति या पत्नी में से किसी एक पर पूरा आर्थिक बोझ डालना उचित नहीं है, खासकर तब जब दोनों अपनी आय अर्जित कर रहे हों।
बॉम्बे हाई कोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट हुआ है कि भरण-पोषण तय करते समय अदालत केवल एक पक्ष की जरूरतों को नहीं देखती, बल्कि दोनों पक्षों की आय, खर्च, संपत्ति और आर्थिक जिम्मेदारियों को ध्यान में रखती है। यह फैसला पति-पत्नी के बीच वित्तीय साझेदारी और बच्चों की जिम्मेदारी को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश देता है।





