महाराष्ट्र

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का अभियान, ऑटो पर ‘मुझे मराठी आती है’ बोर्ड से भाषा को बढ़ावा

SHIDDHANT
22 April 2026 11:31 PM IST
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का अभियान, ऑटो पर ‘मुझे मराठी आती है’ बोर्ड से भाषा को बढ़ावा
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Maharashtra महाराष्ट्र: नवनिर्माण सेना (मनसे) ने गोरेगांव में मराठी भाषा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक नया अभियान शुरू किया है। इस पहल के तहत शहर में चलने वाले ऑटो चालकों को संगठित किया जा रहा है और उनके वाहनों पर 'मुझे मराठी आती है' लिखे बोर्ड लगाए जा रहे हैं। पार्टी का कहना है कि यह कदम स्थानीय भाषा के महत्व को बढ़ाने और लोगों को मराठी सीखने के लिए प्रेरित करने की दिशा में उठाया गया है। इस अभियान को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता संजय नाइक ने बुधवार को मीडिया से बातचीत की।
संजय नाइक ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी समुदाय विशेष को निशाना बनाना नहीं है, बल्कि राज्य की भाषा के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि उनके इस अभियान से किसी की भावनाएं आहत हुई हैं, तो वह इसके लिए माफी मांगते हैं। संजय नाइक ने कहा, "मैं मराठी भाषा के लिए लड़ रहा हूं। मुझे हिंदी भी अच्छी तरह आती है, लेकिन मैं सभी को यह समझाना चाहता हूं कि महाराष्ट्र में कई वर्षों से उत्तर भारतीय लोग रह रहे हैं और अपने परिवार का पालन-पोषण कर रहे हैं। वे हमारे समाज का हिस्सा हैं, और हमें उनके योगदान का सम्मान करना चाहिए।"
उन्होंने आगे कहा कि जैसे हर राज्य की अपनी एक पहचान और भाषा होती है, उसी तरह महाराष्ट्र की भी अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत है। उनके मुताबिक, जो लोग राज्य में रहते हैं और यहां रोजगार करते हैं, उनके लिए मराठी भाषा सीखना जरूरी है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्थानीय भाषा सीखने से न केवल लोगों को समाज में घुलने-मिलने में आसानी होती है, बल्कि यह राज्य की संस्कृति के प्रति सम्मान भी दर्शाता है।
मनसे नेता ने यह भी स्पष्ट किया कि यह अभियान किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि एक सकारात्मक संदेश देने के लिए शुरू
किया
गया है। उनका कहना है, "अगर महाराष्ट्र में रहना है, यहां काम करना है और परिवार चलाना है, तो मराठी भाषा सीखना और उसका इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है। इस अभियान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में विभिन्न प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। जहां कुछ लोग इसे स्थानीय भाषा और संस्कृति को बढ़ावा देने की दिशा में एक सकारात्मक कदम मान रहे हैं, वहीं कुछ अन्य इसे क्षेत्रीय पहचान के नाम पर दबाव बनाने की कोशिश भी बता रहे हैं।
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