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ST छात्रों की मांगों पर महाराष्ट्र सरकार का बड़ा फैसला खत्म हुआ अनशन
Ratna Netam
29 Aug 2026 7:19 PM IST

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मुंबई। महाराष्ट्र में आदिवासी (ST) छात्रों के लंबे आंदोलन के बाद आखिरकार राज्य सरकार ने उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया है। मुख्यमंत्री **देवेंद्र फडणवीस** के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रदर्शनकारी छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत के बाद उनकी सभी प्रमुख मांगों को मानने का फैसला किया। इसके बाद छात्रों का अनशन खत्म होने की उम्मीद जताई जा रही है।
आदिवासी छात्रों का यह आंदोलन केवल छात्रावास और शिक्षा व्यवस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजाति वर्ग के उम्मीदवारों की भर्ती और आदिवासी बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मुद्दे भी शामिल थे।
क्यों आंदोलन कर रहे थे ST छात्र?
महाराष्ट्र के आदिवासी छात्रों ने पुणे, नागपुर और नासिक समेत कई शहरों में अनशन शुरू किया था। इस आंदोलन की बड़ी वजह गढ़चिरौली जिले के एक आदिवासी आवासीय स्कूल में हुई दर्दनाक घटना थी, जहां सांप के काटने से तीन आदिवासी छात्राओं की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद छात्रों ने आदिवासी आश्रम स्कूलों और छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाए थे।
छात्रों का आरोप था कि आदिवासी बच्चों के लिए बनाए गए आवासीय स्कूलों और छात्रावासों में मूलभूत सुविधाओं की कमी है। सुरक्षा व्यवस्था कमजोर होने के कारण बच्चों की जान खतरे में पड़ रही है।
छात्रों की प्रमुख मांगें क्या थीं?
आंदोलन कर रहे ST छात्रों की कई मांगें थीं। इनमें सबसे अहम मांगें थीं—
* आदिवासी छात्रों के लिए सुरक्षित और बेहतर छात्रावास व्यवस्था
* आश्रम स्कूलों में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
* सरकारी सेवाओं में ST उम्मीदवारों की भर्ती प्रक्रिया को तेज करना
* छात्रों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना
* शिक्षा संस्थानों में जरूरी संसाधन मुहैया कराना
छात्रों का कहना था कि सरकार आदिवासी बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा को प्राथमिकता दे।
सरकार ने कैसे किया समाधान?
आदिवासी विकास मंत्री **अशोक उइके** ने जानकारी दी कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने आंदोलन कर रहे छात्रों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात के बाद उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया है। सरकार ने भरोसा दिया कि छात्रों की समस्याओं पर गंभीरता से काम किया जाएगा।
मंत्री ने बताया कि सरकार तीन महीने बाद दोबारा समीक्षा बैठक करेगी, जिसमें यह देखा जाएगा कि लिए गए फैसलों को जमीन पर कितना लागू किया गया है और कहीं कोई समस्या तो नहीं आ रही।
छात्रों ने क्यों उठाई आवाज?
आदिवासी छात्र संगठनों का कहना है कि लंबे समय से उनकी समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा था। उनका आरोप था कि आश्रम स्कूलों में रहने वाले बच्चों को कई बार खराब सुविधाओं, सुरक्षा की कमी और प्रशासनिक लापरवाही का सामना करना पड़ता है।
छात्रों ने कहा कि उनका आंदोलन किसी राजनीतिक उद्देश्य से नहीं था, बल्कि वे अपने अधिकारों और बेहतर भविष्य के लिए आवाज उठा रहे थे।
विपक्ष ने भी उठाया था मुद्दा
आदिवासी छात्रों के आंदोलन को विपक्षी दलों का भी समर्थन मिला था। कांग्रेस नेताओं ने सरकार से छात्रों की मांगों पर तुरंत कार्रवाई करने की मांग की थी। राहुल गांधी ने भी इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखा था और छात्रावासों की स्थिति तथा छात्रों की समस्याओं पर सवाल उठाए थे।
विपक्ष का आरोप था कि सरकार आदिवासी छात्रों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रही है। हालांकि सरकार ने कहा कि वह छात्रों के हितों को लेकर संवेदनशील है।
मंत्री के बयान पर हुआ था विवाद
आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र के एक मंत्री के बयान को लेकर भी विवाद हुआ था। कुछ नेताओं की ओर से भूख हड़ताल कर रहे छात्रों को लेकर की गई टिप्पणी पर छात्रों ने नाराजगी जताई थी। छात्रों का कहना था कि अगर उनकी समस्याएं हल हो जातीं तो उन्हें आंदोलन और अनशन करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
आदिवासी शिक्षा व्यवस्था पर फिर उठे सवाल
यह आंदोलन महाराष्ट्र में आदिवासी शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ी बहस लेकर आया है। राज्य में बड़ी संख्या में आदिवासी बच्चे आश्रम स्कूलों और छात्रावासों में रहकर पढ़ाई करते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन संस्थानों में बेहतर सुरक्षा, स्वास्थ्य सुविधाएं और निगरानी व्यवस्था जरूरी है, ताकि बच्चों को किसी भी तरह के खतरे से बचाया जा सके।
अब आगे क्या?
सरकार की ओर से मांगें स्वीकार किए जाने के बाद अब छात्रों को उम्मीद है कि फैसले जल्द जमीन पर लागू होंगे। वहीं सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन घोषणाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने की होगी।
तीन महीने बाद होने वाली समीक्षा बैठक में यह साफ होगा कि सरकार ने छात्रों की मांगों पर कितना काम किया है।
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