महाराष्ट्र

बोनट से बांधकर घुमाने का मामला आयोग ने मांगी FIR

Kavita2
11 Sept 2026 3:15 PM IST
बोनट से बांधकर घुमाने का मामला आयोग ने मांगी FIR
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मुंबई। महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने पुणे पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की सिफारिश की है। मामला नाबालिगों को कथित रूप से गैरकानूनी हिरासत में रखने, हिरासत के दौरान प्रताड़ित करने और पुलिस वाहन के बोनट से बांधकर सार्वजनिक रूप से घुमाने के आरोपों से जुड़ा है। आयोग ने इसे मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन बताते हुए महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक को अपनी तथ्य-अन्वेषण रिपोर्ट के आधार पर प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश दिया है।

आयोग की पूर्ण पीठ ने मामले की सुनवाई की। इसमें अध्यक्ष न्यायमूर्ति एएम बदर और सदस्य संजय कुमार तथा स्वप्ना जोशी शामिल थे। पीठ ने उपलब्ध सामग्री और जांच रिपोर्ट पर विचार करने के बाद कहा कि आरोप इतने गंभीर हैं कि उनकी स्वतंत्र आपराधिक जांच आवश्यक है। आयोग ने डीजीपी से कहा कि उसकी तथ्य-अन्वेषण जांच रिपोर्ट को ही प्राथमिकी के रूप में स्वीकार किया जाए।

मामले में पुणे पुलिस आयुक्त से लेकर अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका जांच के दायरे में आ सकती है। रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने पुलिस आयुक्त सहित 15 से अधिक पुलिसकर्मियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने को कहा है। इनमें वरिष्ठ अधिकारी से लेकर कांस्टेबल स्तर तक के कर्मी शामिल बताए गए हैं। आरोप है कि हत्या के एक मामले में आठ नाबालिगों को करीब पांच दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया और उनके साथ मारपीट की गई। टाइम्स ऑफ इंडिया

यह मामला उस घटना से जुड़ा है जिसमें हत्या के कथित आरोपियों को पुलिस वाहन के बोनट से बांधकर सार्वजनिक रूप से घुमाने का वीडियो सामने आया था। वीडियो के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठे और आयोग ने मामले का स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने प्रारंभिक स्तर पर इस व्यवहार को बर्बर बताते हुए कहा था कि किसी आरोपी के साथ ऐसा व्यवहार कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हो सकता।

किसी अपराध का आरोपी होने से व्यक्ति के संवैधानिक और मानवाधिकार समाप्त नहीं होते। आरोपियों को हिरासत में लेने, पूछताछ करने और अदालत में पेश करने के लिए स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है। पुलिस को इसी प्रक्रिया के भीतर रहकर काम करना होता है। किसी व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या दंडित करना न्यायिक प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकता।

आयोग के सामने सबसे गंभीर आरोप नाबालिगों की कथित अवैध हिरासत का रहा। बच्चों और किशोरों से जुड़े मामलों में पुलिस को किशोर न्याय कानून और बाल अधिकारों से संबंधित विशेष दिशा-निर्देशों का पालन करना होता है। नाबालिगों को सामान्य आरोपियों की तरह थाने में बंद रखने या उनके साथ हिंसक व्यवहार करने की अनुमति नहीं है। उनसे पूछताछ भी संवेदनशील और कानून द्वारा निर्धारित तरीके से की जानी चाहिए।

आरोप है कि आठ नाबालिगों को हत्या के एक मामले से जोड़कर करीब पांच दिन तक हिरासत में रखा गया। इस अवधि में उनके साथ कथित मारपीट और सार्वजनिक अपमान का व्यवहार किया गया। हालांकि इन आरोपों की अंतिम पुष्टि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद होने वाली आपराधिक जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होगी। संबंधित पुलिस अधिकारियों को भी अपने पक्ष और बचाव के साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।

मानवाधिकार आयोग की पूर्ण पीठ ने मामले को केवल कुछ पुलिसकर्मियों की व्यक्तिगत ज्यादती के रूप में नहीं देखा। आयोग ने कथित घटनाओं को कानून के शासन और जवाबदेही से जुड़ा गंभीर विषय माना। वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके अधीन काम करने वाले कर्मचारियों की गतिविधियों पर निगरानी रखना प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है।

यदि हिरासत, पूछताछ और आरोपियों को सार्वजनिक स्थान पर ले जाने के दौरान नियमों का उल्लंघन हुआ तो यह जांचना जरूरी होगा कि वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं। यह भी पता लगाया जाएगा कि घटना रोकने के लिए कोई निर्देश दिया गया था या बाद में जिम्मेदार कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कदम उठाए गए। इसी आधार पर अलग-अलग अधिकारियों की व्यक्तिगत भूमिका निर्धारित की जा सकती है।

आयोग द्वारा तथ्य-अन्वेषण रिपोर्ट को प्राथमिकी मानने का निर्देश महत्वपूर्ण है। सामान्य रूप से किसी आपराधिक मामले की जांच एफआईआर दर्ज होने के बाद शुरू होती है। इस मामले में आयोग ने अपनी जांच के दौरान सामने आए तथ्यों को संज्ञेय अपराध की जांच शुरू करने के लिए पर्याप्त माना है। अब डीजीपी स्तर पर आदेश का अनुपालन और जांच एजेंसी का निर्धारण किया जाना है।

मामले में पुलिस अधिकारियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती होगी। आरोप उसी विभाग के अधिकारियों पर हैं जिसे सामान्यतः आपराधिक मामलों की जांच की जिम्मेदारी दी जाती है। ऐसे में जांच की स्वतंत्रता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए किसी अलग इकाई या वरिष्ठ अधिकारी को जिम्मेदारी दी जा सकती है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय पुलिस महानिदेशक के स्तर पर होगा।

आयोग ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए यह संदेश दिया है कि अपराध नियंत्रण के नाम पर कानून से बाहर जाकर कार्रवाई स्वीकार नहीं की जा सकती। पुलिस के पास गिरफ्तारी और पूछताछ के व्यापक अधिकार होते हैं लेकिन उन अधिकारों का इस्तेमाल संविधान तथा कानूनी सीमाओं के भीतर करना आवश्यक है। हिरासत में प्रताड़ना और सार्वजनिक अपमान के आरोप पुलिस व्यवस्था पर लोगों के भरोसे को कमजोर करते हैं।

नाबालिगों के मामले में जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है। किशोर न्याय व्यवस्था का आधार दंड के बजाय संरक्षण और सुधार है। किसी बच्चे को सार्वजनिक रूप से अपराधी के रूप में प्रदर्शित करने से उसकी पहचान, प्रतिष्ठा और भविष्य पर गंभीर असर पड़ सकता है। इसी कारण नाबालिगों की पहचान और उनसे जुड़े विवरण सार्वजनिक करने पर कानूनी प्रतिबंध रहते हैं।

आयोग के निर्देश के बाद अब डीजीपी की ओर से उठाए जाने वाले कदम पर नजर रहेगी। प्राथमिकी दर्ज होने पर जांच में घटना के वीडियो, हिरासत से संबंधित रिकॉर्ड, थाने की दैनिक डायरी, सीसीटीवी फुटेज, वाहन की आवाजाही और संबंधित अधिकारियों की ड्यूटी का विवरण महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। पीड़ितों, उनके परिजनों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी दर्ज किए जा सकते हैं।

इस मामले में आयोग की सिफारिश को दोषसिद्धि नहीं माना जा सकता। प्राथमिकी केवल आरोपों की औपचारिक आपराधिक जांच का प्रारंभ होती है। आरोपियों की जिम्मेदारी अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर तय होगी। फिर भी पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को जांच के दायरे में लाने का निर्देश संस्थागत जवाबदेही की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल महाराष्ट्र पुलिस महानिदेशक को आयोग के आदेश पर कार्रवाई करनी है। आयोग की तथ्य-अन्वेषण रिपोर्ट के आधार पर प्राथमिकी दर्ज होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि किन अधिकारियों पर कौन-कौन सी धाराएं लगाई जाती हैं। मामले ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि कानून लागू कराने वाली एजेंसियों के भीतर मानवाधिकार संरक्षण और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।

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