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भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ी, स्वदेशी युद्धपोत INS मंगरोल बेड़े में शामिल

मुंबई। भारतीय नौसेना की समुद्री सुरक्षा और पनडुब्बी रोधी युद्ध क्षमता को मजबूत करने की दिशा में सोमवार को एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया। स्वदेशी एंटी-सबमरीन वॉरफेयर युद्धपोत 'INS मंगरोल' को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में आयोजित समारोह में आधिकारिक रूप से नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया। यह भारतीय नौसेना का तीसरा एंटी-सबमरीन वॉरफेयर युद्धपोत बताया गया है। इस युद्धपोत का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है। इसके शामिल होने से तटीय और कम गहरे समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों से जुड़े संभावित खतरों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने की नौसेना की क्षमता को मजबूती मिलेगी।
मुंबई में आयोजित कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ वाइस एडमिरल संजय वत्सायन ने की। इस अवसर पर युद्धपोत को औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल किया गया। स्वदेशी निर्माण वाले इस जहाज को भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
#IndianNavy commissions INS Mangrol, the third Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft (ASW-SWC) built by Cochin Shipyard Limited (CSL), Kochi, at the Naval Dockyard in Mumbai. The induction of the indigenous warship marks an important step towards strengthening the Navy’s ability to detect and counter submarine threats in coastal and shallow waters. Addressing the gathering, Vice Admiral Sanjay Vatsayan, says that the ship, with more than 80% indigenous content, demonstrates India’s engineering capabilities, technological progress and national resolve. #Mangrol #ASWSWC @IndianNavy @SpokespersonMoD @IN_WNC @IN_HQENC @IN_HQSNC
— All India Radio News (@airnewsalerts) October 12, 2026
मुंबई में नौसेना के बेड़े में शामिल हुआ युद्धपोत
सोमवार को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में INS मंगरोल का कमीशनिंग समारोह आयोजित किया गया।
इस दौरान युद्धपोत को औपचारिक रूप से भारतीय नौसेना में शामिल किया गया।
समारोह की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्सायन ने की।
किसी युद्धपोत का कमीशन होना नौसेना की परिचालन व्यवस्था में उसके औपचारिक प्रवेश का महत्वपूर्ण चरण होता है।
इसके बाद जहाज को निर्धारित नौसैनिक जिम्मेदारियों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।
हालांकि, INS मंगरोल की पहली परिचालन तैनाती कब और कहां होगी, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
कोचीन शिपयार्ड में हुआ स्वदेशी निर्माण
INS मंगरोल का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड ने किया है।
स्वदेशी शिपयार्ड में तैयार किया गया यह युद्धपोत भारत की जहाज निर्माण क्षमता को दर्शाता है।
देश में युद्धपोतों के निर्माण से नौसेना की आवश्यकताओं के अनुसार जहाज विकसित करने की क्षमता मजबूत होती है।
इसके साथ ही घरेलू जहाज निर्माण उद्योग को भी महत्वपूर्ण अवसर मिलते हैं।
हालांकि, INS मंगरोल के निर्माण में उपयोग किए गए सभी उपकरणों और प्रणालियों के स्वदेशीकरण का सटीक प्रतिशत उपलब्ध जानकारी में नहीं दिया गया है।
इसलिए जहाज के प्रत्येक उपकरण के भारत में निर्मित होने का दावा नहीं किया जा सकता।
पनडुब्बियों से जुड़े खतरों का करेगा मुकाबला
INS मंगरोल को एंटी-सबमरीन वॉरफेयर यानी पनडुब्बी रोधी युद्ध की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।
इस श्रेणी के युद्धपोतों का प्रमुख उद्देश्य समुद्र में संभावित दुश्मन पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे उत्पन्न खतरों का मुकाबला करना होता है।
पनडुब्बियां समुद्र के भीतर रहकर गतिविधियां संचालित कर सकती हैं।
ऐसे में उनकी पहचान और निगरानी समुद्री सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
INS मंगरोल के नौसेना में शामिल होने से इस क्षेत्र में भारत की क्षमता को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, जहाज पर लगे विशिष्ट सेंसर, हथियारों और अन्य तकनीकी प्रणालियों का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
कम गहरे समुद्री इलाकों में निभाएगा भूमिका
इस युद्धपोत की विशेषता तटीय और कम गहरे समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए इसकी उपयोगिता है।
समुद्र के ऐसे क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां खुले और गहरे समुद्र से अलग हो सकती हैं।
तटों के आसपास समुद्री यातायात और अन्य गतिविधियों की मौजूदगी के कारण निगरानी महत्वपूर्ण होती है।
INS मंगरोल जैसे युद्धपोत इन क्षेत्रों में नौसेना की परिचालन क्षमता को मजबूत करने में भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, युद्धपोत की अधिकतम गति, परिचालन दूरी और समुद्र में लगातार रहने की क्षमता से जुड़े आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
भारत की समुद्री सीमाओं को मिलेगी मजबूती
भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में नौसेना की महत्वपूर्ण भूमिका है।
देश की लंबी तटरेखा और समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए विभिन्न प्रकार के युद्धपोतों की आवश्यकता होती है।
पनडुब्बी रोधी युद्धपोत इस व्यवस्था का एक विशेष हिस्सा हैं।
INS मंगरोल के शामिल होने से नौसेना को तटीय क्षेत्रों में संभावित पानी के भीतर मौजूद खतरों की निगरानी और उनका मुकाबला करने के लिए अतिरिक्त क्षमता मिलेगी।
इससे समुद्री सुरक्षा से जुड़े अभियानों में नौसेना के उपलब्ध संसाधनों का विस्तार होगा।
हालांकि, युद्धपोत की वास्तविक परिचालन क्षमताओं का पूरा आकलन उसके तकनीकी विवरण और तैनाती से संबंधित जानकारी के आधार पर ही किया जा सकता है।
पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख ने की अध्यक्षता
INS मंगरोल के कमीशनिंग समारोह की अध्यक्षता वाइस एडमिरल संजय वत्सायन ने की।
वह पश्चिमी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ हैं।
पश्चिमी नौसेना कमान भारतीय नौसेना की प्रमुख परिचालन कमानों में शामिल है।
मुंबई में आयोजित इस समारोह के माध्यम से नए युद्धपोत को औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल किया गया।
हालांकि, समारोह में दिए गए संबोधनों और अन्य अधिकारियों की उपस्थिति का विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
एंटी-सबमरीन वॉरफेयर क्यों महत्वपूर्ण?
आधुनिक समुद्री सुरक्षा में पनडुब्बियों की निगरानी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।
पनडुब्बियां समुद्र के भीतर रहकर संचालित होती हैं, इसलिए उनका पता लगाने के लिए विशेष तकनीक और प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है।
एंटी-सबमरीन वॉरफेयर के अंतर्गत संभावित पनडुब्बी खतरों की पहचान, निगरानी और आवश्यक परिस्थितियों में उनका मुकाबला करने की क्षमताएं शामिल होती हैं।
इसके लिए नौसेनाएं विशेष युद्धपोतों और अन्य संसाधनों का उपयोग करती हैं।
INS मंगरोल को इसी उद्देश्य से तैयार किया गया है।
इसकी तैनाती से भारतीय नौसेना को विशेष रूप से तटीय और कम गहरे समुद्री इलाकों में अतिरिक्त सहायता मिल सकती है।
आत्मनिर्भर रक्षा निर्माण की दिशा में कदम
भारत में निर्मित युद्धपोतों को नौसेना में शामिल करना घरेलू रक्षा उत्पादन के विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण पहलू है।
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित INS मंगरोल इस दिशा में एक और उपलब्धि है।
स्वदेशी जहाज निर्माण से देश में तकनीकी अनुभव और औद्योगिक क्षमता विकसित करने में सहायता मिलती है।
इसके साथ ही भविष्य की नौसैनिक आवश्यकताओं के अनुरूप नए जहाजों के निर्माण का आधार भी मजबूत होता है।
हालांकि, INS मंगरोल की कुल निर्माण लागत और परियोजना की विस्तृत समयसीमा की जानकारी उपलब्ध नहीं है।
नौसेना की परिचालन क्षमता में विस्तार
नए युद्धपोत के शामिल होने से नौसेना के पास पनडुब्बी रोधी अभियानों के लिए उपलब्ध संसाधनों में वृद्धि होती है।
INS मंगरोल का प्रमुख उद्देश्य तटीय और उथले समुद्री क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी जरूरतों को पूरा करना है।
इस प्रकार के जहाज नौसेना की व्यापक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में सहयोगी भूमिका निभाते हैं।
हालांकि, युद्धपोत को किस नौसैनिक इकाई में तैनात किया जाएगा और उसके शुरुआती अभियान क्या होंगे, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
इन जानकारियों के सामने आने के बाद उसकी परिचालन भूमिका और स्पष्ट होगी।
समुद्री सुरक्षा में महत्वपूर्ण उपलब्धि
भारतीय नौसेना में INS मंगरोल का शामिल होना देश की समुद्री रक्षा तैयारियों के लिए महत्वपूर्ण कदम है।
सोमवार को मुंबई के नेवल डॉकयार्ड में आयोजित समारोह में इस स्वदेशी युद्धपोत को कमीशन किया गया।
कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा निर्मित जहाज तटीय और कम गहरे समुद्री क्षेत्रों में पनडुब्बियों से जुड़े खतरों का पता लगाने और उनका मुकाबला करने की क्षमता बढ़ाएगा।
समारोह की अध्यक्षता पश्चिमी नौसेना कमान के प्रमुख वाइस एडमिरल संजय वत्सायन ने की।
INS मंगरोल के नौसेना के बेड़े में शामिल होने से भारत की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था को एक और संसाधन मिला है।





