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Goda से नर्मदा जल यात्रा का महेश्वर में समापन, अहिल्याबाई होलकर की विरासत को नमन

Maharashtra महाराष्ट्र: मराठा-मालवा राज की महान शासक और पुण्यश्लोक लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की विरासत को समर्पित ‘गोदा से नर्मदा जल यात्रा 2026’ का बुधवार रात मध्य प्रदेश के महेश्वर में भव्य समापन हुआ। नर्मदा नदी के तट पर स्थित महेश्वर घाट पर इस यात्रा का स्वागत मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने किया।
यह पांच दिवसीय जल यात्रा 25 अप्रैल को महाराष्ट्र के दो प्रमुख स्थानों से शुरू हुई थी—नासिक जिले के त्र्यंबकेश्वर और अहिल्यानगर जिले के चोंडी से। यात्रा का उद्देश्य विभिन्न नदियों के जल को एकत्र कर नर्मदा के पवित्र तट पर अर्पित करना और सांस्कृतिक एकता का संदेश देना था।
जल यात्रा महाराष्ट्र के पांच जिलों और मध्य प्रदेश के तीन जिलों से होकर गुजरी। इस दौरान 130 नदियों का जल और चोंडी की पवित्र मिट्टी को एकत्र किया गया। यात्रा का समापन महेश्वर के अहिल्या घाट पर हुआ, जो अहिल्याबाई होलकर की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा स्थान है।
इस पूरे आयोजन का नेतृत्व महाराष्ट्र के जल संसाधन मंत्री राधाकृष्ण विखे-पाटिल ने किया, जो गोदावरी और कृष्णा नदी बेसिन के प्रबंधन से जुड़े विभाग की जिम्मेदारी संभालते हैं। यात्रा को सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व के साथ-साथ जल संरक्षण और नदी जोड़ने की भावना से भी जोड़ा गया।
त्र्यंबकेश्वर, जहां से गोदावरी नदी का उद्गम होता है और जिसे ‘दक्षिण गंगा’ के नाम से भी जाना जाता है, इस यात्रा का एक प्रमुख प्रारंभिक स्थल था। यह स्थान बारह ज्योतिर्लिंगों में शामिल है और यहां स्थित तीन मुख वाला शिवलिंग ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति का प्रतीक माना जाता है।
वहीं, चोंडी अहिल्याबाई होलकर का जन्मस्थान है, जिससे इस यात्रा को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से विशेष महत्व मिला। यहां से पवित्र मिट्टी लेकर यात्रा शुरू की गई थी, जिसे नर्मदा के किनारे महेश्वर में अर्पित किया गया।
यात्रा के दौरान गोदावरी नदी का जल त्र्यंबकेश्वर में एक कलश में एकत्र किया गया, जबकि चोंडी की मिट्टी को विशेष रूप से संरक्षित कर महेश्वर तक लाया गया। यह प्रतीकात्मक यात्रा विभिन्न नदियों और क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता को दर्शाती है।
महेश्वर में समापन अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु और अधिकारी उपस्थित रहे। पूरे आयोजन को अहिल्याबाई होलकर की न्यायप्रियता, प्रशासनिक कुशलता और सांस्कृतिक योगदान को याद करने के रूप में देखा गया।
यह जल यात्रा न केवल धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रही, बल्कि इसने नदियों के संरक्षण और जल संसाधनों के महत्व को लेकर भी एक मजबूत संदेश दिया है।





