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कोविड के दौरान चीन को लगा दुनिया उसे बदनाम कर रही है, विक्रम मिसरी का बड़ा खुलासा

मुंबई। भारत के विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने कोविड-19 महामारी के दौरान चीन के रवैये और भारत-चीन संबंधों में आई चुनौतियों को लेकर अहम खुलासा किया है। उन्होंने कहा कि कोरोना महामारी के दौरान चीन को ऐसा महसूस होने लगा था कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे महामारी के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है और वैश्विक स्तर पर उसकी छवि खराब करने की कोशिश कर रहा है। इस धारणा का असर चीन के बाहरी दुनिया के प्रति व्यवहार पर पड़ा और उसका रवैया काफी कठोर हो गया। मिसरी ने कहा कि इस दौरान चीन ने अपने देश के भीतर भी बेहद सख्त लॉकडाउन लागू किया था।
विदेश सचिव शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को मुंबई में कश्मीरी पंडितों के एक संगठन की ओर से आयोजित 'इकवत ग्लोबल बिजनेस कॉन्क्लेव' को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने चीन में भारतीय राजदूत के रूप में अपने कार्यकाल के अनुभव साझा किए। उन्होंने विशेष रूप से पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए सैन्य संघर्ष का उल्लेख किया। मिसरी ने बताया कि कोविड-19 महामारी के चरम दौर में दोनों देशों के बीच पैदा हुआ यह तनाव उनके राजनयिक करियर की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था।
चीन को लगा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे ठहरा रहा है जिम्मेदार
विक्रम मिसरी ने कहा कि कोविड-19 महामारी ने वैश्विक और द्विपक्षीय संबंधों पर गहरा दबाव डाला था। चीन को महसूस होने लगा था कि दुनिया के देश उसे महामारी के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं और उसे बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा कि भारत ने कभी कोरोना महामारी के लिए चीन पर सीधे तौर पर उंगली नहीं उठाई, लेकिन चीन की धारणा थी कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे गलत तरीके से पेश करने और उसकी छवि खराब करने पर आमादा है।
मिसरी के मुताबिक, इस सोच के कारण चीन ने कुछ समय तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति काफी सख्त और कठोर रवैया अपनाया। इसका असर केवल उसकी विदेश नीति और दूसरे देशों के साथ व्यवहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश के भीतर लागू प्रतिबंधों में भी दिखाई दिया।
उन्होंने चीन में लंबे समय तक लागू रहे बेहद कठोर लॉकडाउन का उल्लेख करते हुए बताया कि महामारी के दौरान वहां नागरिकों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए थे।
गलवान घाटी संघर्ष बना सबसे बड़ी राजनयिक चुनौती
विदेश सचिव ने चीन में भारतीय राजदूत के रूप में अपने कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि उस दौरान भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में अभूतपूर्व सैन्य टकराव हुआ था। यह घटना जून 2020 में हुई थी और इसका दोनों देशों के संबंधों पर गहरा असर पड़ा।
मिसरी ने बताया कि लगभग पांच दशक बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पहली बार दोनों पक्षों के सैनिकों की जान गई थी। इस घटना ने भारत और चीन के बीच तनाव को गंभीर स्तर पर पहुंचा दिया था।
उन्होंने कहा कि गलवान की घटना ऐसे समय हुई, जब पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी से जूझ रही थी। महामारी के कारण अंतरराष्ट्रीय यात्रा और लोगों के बीच संपर्क पर कड़े प्रतिबंध थे। ऐसे माहौल में चीन में जमीनी हालात समझना और भारत के साथ राजनयिक संवाद बनाए रखना काफी चुनौतीपूर्ण हो गया था।
दिल्ली आने के बाद चीन लौटने पर 21 दिन का क्वारंटाइन
विक्रम मिसरी ने कोरोना काल के दौरान चीन में काम करने के अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा किए। उन्होंने बताया कि उस समय अंतरराष्ट्रीय यात्रा करना बेहद कठिन था। चीन से बाहर जाने के बाद वापस लौटने पर 21 दिनों का अनिवार्य क्वारंटाइन करना पड़ता था।
उन्होंने इस परेशानी का जिक्र करते हुए कहा कि जब भी वह दिल्ली के दौरे पर आते थे, चीन लौटने के बाद उन्हें 21 दिनों तक क्वारंटाइन में रहना पड़ता था। उन्होंने इस अवधि को मजाकिया अंदाज में '21 दिन का वनवास' बताया।
मिसरी ने कहा कि अगर दिल्ली में किसी काम से एक दिन के लिए भी आना पड़ता था, तो चीन लौटने पर 21 दिन अलग रहना अनिवार्य था। इस व्यवस्था ने राजनयिक कार्यों और दोनों देशों के बीच संवाद को काफी कठिन बना दिया था।
उन्होंने बताया कि गलवान की घटना के बाद दोनों पक्षों में गहरा सदमा था। यहां तक कि चीन की ओर से भी यह महसूस किया गया कि कुछ बेहद गंभीर घटित हुआ है।
ऑपरेशन सिंदूर में सरकारी एजेंसियों के समन्वय की तारीफ
अपने संबोधन के दौरान विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ऑपरेशन सिंदूर का भी उल्लेख किया। उन्होंने इस अभियान के दौरान विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच हुए समन्वय की सराहना की।
मिसरी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सरकार की अलग-अलग महत्वपूर्ण एजेंसियों ने जिस तरह एक साथ मिलकर काम किया, वह उत्साहजनक था। उनके मुताबिक, इतने बड़े और महत्वपूर्ण अभियान में कई सरकारी संस्थाओं के बीच वास्तविक समय में बेहतर तालमेल और समन्वय देखने को मिला।
उन्होंने कहा कि ऐसे बड़े अभियानों में विभिन्न विभागों और संस्थाओं के बीच त्वरित सूचना साझा करना और एक साथ काम करना बेहद महत्वपूर्ण होता है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान यह समन्वय विशेष रूप से देखने को मिला।
कश्मीरी पंडित विरासत को बताया अपनी ताकत
कार्यक्रम के दौरान विक्रम मिसरी ने अपनी कश्मीरी पंडित पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक विरासत का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कश्मीरी डीएनए और कश्मीरियत उनके जीवन और पेशेवर यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
मिसरी ने कहा कि कश्मीर की संस्कृति, परंपराएं और विरासत से मिली सीख ने उनके व्यक्तित्व को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कश्मीरी समुदाय के लोगों में दिखाई देने वाले संघर्ष और विपरीत परिस्थितियों से उबरने के जज्बे की भी सराहना की।
उन्होंने कहा कि कश्मीरी समुदाय के प्रत्येक सदस्य में उन्होंने संघर्ष के बावजूद आगे बढ़ने और परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता देखी है। यह दृढ़ता उनकी अपनी यात्रा के लिए भी प्रेरणादायक रही है।
भारत-चीन संबंधों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह बयान?
विक्रम मिसरी का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब भारत और चीन के संबंधों में गलवान संघर्ष के बाद कई महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। वर्ष 2020 की सैन्य झड़प ने दोनों देशों के बीच भरोसे को गंभीर रूप से प्रभावित किया था।
इसके बाद सीमा पर शांति बनाए रखने, सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत तथा विवादित क्षेत्रों में तनाव कम करने के लिए कई दौर की वार्ताएं हुईं। गलवान की घटना ने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्विक महामारी जैसी असाधारण परिस्थितियों में भी दो देशों के बीच सीमा विवाद और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां कितनी गंभीर हो सकती हैं।
मिसरी के संबोधन से यह संकेत मिलता है कि कोविड-19 केवल स्वास्थ्य संकट नहीं था, बल्कि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, व्यापार, यात्रा और देशों के आपसी संबंधों पर भी पड़ा था।
फिलहाल विदेश सचिव ने अपने अनुभवों के माध्यम से चीन के उस दौर के रवैये, गलवान संघर्ष की राजनयिक चुनौतियों और ऑपरेशन सिंदूर में सरकारी एजेंसियों के समन्वय को सामने रखा है। उनका यह संबोधन भारत की विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है।





