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पन्ना। अजयगढ़ क्षेत्र में मजहगवां बांध का जलस्तर लगातार बढ़ने के साथ बांध से प्रभावित गांवों और परिवारों की चिंता भी तेज हो गई है। कई गांवों में पानी का स्तर बढ़ रहा है और कुछ इलाके चारों ओर पानी से घिरकर टापू जैसी स्थिति में पहुंच गए हैं। इस बीच केन-बेतवा लिंक परियोजना, मजहगवां बांध और रुंज बांध से प्रभावित किसान एवं आदिवासी परिवारों ने मुआवजे और पुनर्वास की मांग को लेकर वनहरीकला टपरिया में ‘चिता विरोध प्रदर्शन’ शुरू किया है।
यह विरोध प्रदर्शन जय किसान संगठन के बैनर तले आयोजित किया गया। संगठन के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने आंदोलन का नेतृत्व किया। प्रदर्शन में शामिल परिवारों ने आरोप लगाया कि बांध का जलस्तर बढ़ने के कारण उनके घरों और खेतों पर डूबने का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन उन्हें अभी तक उचित मुआवजा और व्यवस्थित पुनर्वास नहीं मिला है।
प्रभावित परिवारों का कहना है कि उन्होंने विकास परियोजनाओं के लिए अपनी जमीन, खेत और घर दिए, लेकिन बदले में उन्हें सुरक्षित आवास एवं आजीविका की स्थायी व्यवस्था नहीं मिल सकी। परिवारों ने आरोप लगाया कि विस्थापन से जुड़ी उनकी मांगों को लंबे समय से नजरअंदाज किया जा रहा है। इसी कारण उन्हें अपने अधिकारों के लिए विरोध प्रदर्शन करना पड़ रहा है।
मजहगवां बांध के बढ़ते जलस्तर ने आसपास के गांवों में रहने वाले लोगों की चिंता बढ़ा दी है। प्रभावित परिवारों के अनुसार, पानी लगातार आबादी और कृषि भूमि की तरफ बढ़ रहा है। कुछ रास्तों पर पानी भरने के कारण लोगों का संपर्क दूसरे क्षेत्रों से प्रभावित होने की खबर है। ग्रामीणों को आशंका है कि जलस्तर और बढ़ा तो कई घर तथा खेत पूरी तरह जलमग्न हो सकते हैं।
वनहरीकला टपरिया में एकत्र हुए प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन से तत्काल उनकी समस्याओं पर ध्यान देने की मांग की। उनका कहना है कि डूब प्रभावित परिवारों की सूची पारदर्शी तरीके से तैयार की जाए और प्रत्येक पात्र परिवार को नियमानुसार मुआवजा दिया जाए। इसके साथ ही विस्थापित होने वाले लोगों के लिए सुरक्षित स्थान पर आवास, पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने प्रभावित लोगों के मुद्दों को प्रशासन और सरकार तक पहुंचाने की बात कही। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि परियोजनाओं से लाभ की चर्चा तो होती है, लेकिन अपनी जमीन और घर छोड़ने वाले परिवारों की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। उनका कहना है कि पुनर्वास केवल दूसरी जगह जमीन या मकान देने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि आजीविका और सामाजिक जीवन की सुरक्षा भी इसमें शामिल होनी चाहिए।
किसान परिवारों के लिए कृषि भूमि आजीविका का मुख्य साधन है। खेत बांध के पानी में डूबने की स्थिति में उनकी नियमित आय समाप्त हो सकती है। प्रभावित किसानों का कहना है कि मुआवजे का निर्धारण करते समय जमीन के बाजार मूल्य के साथ फसल, पेड़, कुएं, सिंचाई के साधन और दूसरे संसाधनों के नुकसान को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
आदिवासी परिवारों के लिए विस्थापन का मुद्दा जमीन के साथ उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा है। कई परिवार पीढ़ियों से एक ही स्थान पर रहकर खेती और जंगल से जुड़े संसाधनों पर निर्भर रहे हैं। नई जगह पर बसाए जाने की स्थिति में उनके सामने रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामुदायिक जीवन से जुड़ी कई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने दावा किया कि कुछ गांवों में पानी बढ़ने के बाद आवागमन मुश्किल हो गया है। ऐसे क्षेत्रों में आपातकालीन सहायता पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ग्रामीणों ने मांग की कि प्रशासन प्रभावित गांवों में सर्वे कर मौजूदा हालात की जानकारी जुटाए और आवश्यकता पड़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की तैयारी करे।
प्रभावितों का कहना है कि जलस्तर बढ़ने के बाद कार्रवाई शुरू करने के बजाय पहले से पुनर्वास की व्यवस्था पूरी होनी चाहिए थी। यदि किसी परिवार को घर खाली करना पड़ता है तो उसके पास रहने के लिए सुरक्षित विकल्प होना आवश्यक है। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और पशुओं को सुरक्षित रखने की व्यवस्था भी पुनर्वास योजना का हिस्सा बनाई जानी चाहिए।
केन-बेतवा लिंक परियोजना को व्यापक विकास और जल प्रबंधन से जुड़ी परियोजना के रूप में देखा जाता है। वहीं, प्रभावित परिवारों का कहना है कि विकास कार्यों के साथ मानवीय और सामाजिक प्रभावों पर समान गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है। परियोजना से प्रभावित होने वाले हर व्यक्ति को अपनी बात रखने और पुनर्वास से संबंधित जानकारी प्राप्त करने का अधिकार मिलना चाहिए।
जय किसान संगठन ने मांग की है कि प्रभावित परिवारों के साथ प्रशासनिक अधिकारियों की बैठक कर उनकी समस्याओं का समयबद्ध समाधान किया जाए। मुआवजे की राशि, पात्रता, पुनर्वास स्थल और सुविधाओं से संबंधित सभी जानकारियां सार्वजनिक की जाएं। जिन परिवारों के नाम सर्वे या सूची से छूट गए हैं, उनके दावों की भी निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।
‘चिता विरोध प्रदर्शन’ के माध्यम से प्रभावित परिवारों ने अपनी स्थिति की गंभीरता को सामने रखने का प्रयास किया है। हालांकि प्रदर्शन के संबंध में स्थानीय प्रशासन या परियोजना से जुड़े अधिकारियों की विस्तृत प्रतिक्रिया उपलब्ध नहीं हुई है। प्रशासन का पक्ष सामने आने के बाद मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया की वर्तमान स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी।
जलस्तर में लगातार बढ़ोतरी को देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी आवश्यक मानी जा रही है। ग्रामीणों को समय पर चेतावनी देने, सुरक्षित निकासी मार्ग तय करने और राहत व्यवस्था तैयार रखने की जरूरत है। विशेष रूप से उन गांवों पर तत्काल ध्यान देना आवश्यक है, जो पानी से घिरने के कारण टापू जैसी स्थिति में पहुंच गए हैं।
फिलहाल वनहरीकला टपरिया में प्रभावित किसान और आदिवासी परिवार अपनी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उचित मुआवजा और व्यवस्थित पुनर्वास सुनिश्चित होने तक उनकी आवाज जारी रहेगी। बढ़ते जलस्तर के बीच अब प्रभावित परिवार प्रशासन से तत्काल और ठोस हस्तक्षेप की उम्मीद कर रहे हैं।





