महाराष्ट्र

नागपुर में कांग्रेस का कमाल, पुणे में शरद पवार गुट की जीत, BJP को दोहरा झटका

Kavita2
30 Oct 2026 10:20 AM IST
नागपुर में कांग्रेस का कमाल, पुणे में शरद पवार गुट की जीत, BJP को दोहरा झटका
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मुंबई। महाराष्ट्र विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और महायुति गठबंधन की चिंता बढ़ा दी है। नागपुर और पुणे की स्नातक निर्वाचन सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। नागपुर में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने भाजपा प्रत्याशी सुधाकर कोहले को हराकर अपनी सीट बरकरार रखी, जबकि पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की उम्मीदवार हर्षदा देशमुख-जाधव ने भाजपा की स्मिता जाधव को शिकस्त दी। पांच सीटों पर हुए इस चुनाव में विपक्षी महाविकास आघाड़ी ने तीन और सत्तारूढ़ महायुति ने दो सीटें जीती हैं। इन नतीजों ने भाजपा के उम्मीदवार चयन, संगठन के भीतर असंतोष और जमीनी स्तर पर चुनावी तैयारियों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। साथ ही महायुति के सहयोगी दलों के बीच आपसी तालमेल की कमी भी खुलकर सामने आई है।

महाराष्ट्र विधान परिषद की तीन स्नातक और दो शिक्षक निर्वाचन सीटों के लिए 23 अक्टूबर को मतदान हुआ था। चुनाव परिणामों में भाजपा को केवल पुणे शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में जीत हासिल हुई। यहां पार्टी उम्मीदवार कौस्तुभ गावडे विजयी रहे। दूसरी ओर एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने अमरावती शिक्षक निर्वाचन सीट पर जीत दर्ज की। इस सीट पर किरण सरनाईक ने सफलता हासिल की। महायुति के तीसरे प्रमुख सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को एक भी सीट नहीं मिल सकी। इसके विपरीत शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पुणे और छत्रपति संभाजीनगर स्नातक सीटों पर जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की।

सबसे अधिक चर्चा नागपुर स्नातक निर्वाचन सीट के परिणाम को लेकर हो रही है। नागपुर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मुख्यालय भी इसी शहर में स्थित है। ऐसे में भाजपा के लिए नागपुर की हार राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने भाजपा के सुधाकर कोहले को 3,271 मतों से हराया। वंजारी को 67,231 वोट मिले, जबकि कोहले को 63,960 मत प्राप्त हुए।

नागपुर में मतगणना 40 घंटे से अधिक समय तक चली। शुरुआती दौर में भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले बढ़त बनाए हुए थे। दूसरे चरण की गणना के बाद उन्हें 4,294 मतों की बढ़त हासिल थी। हालांकि किसी भी प्रत्याशी को निर्धारित जीत का कोटा नहीं मिलने के कारण दूसरी वरीयता के मतों की गणना की गई। इसी प्रक्रिया में कांग्रेस उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने बढ़त हासिल करते हुए जीत दर्ज कर ली। लगातार दूसरी बार नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस की जीत ने भाजपा की चुनावी रणनीति पर सवाल खड़े किए हैं।

भाजपा के लिए नागपुर का परिणाम इसलिए भी निराशाजनक है क्योंकि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी वर्ष 1990 से 2014 तक इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। पार्टी का यहां लंबे समय से मजबूत संगठनात्मक आधार रहा है। इसके बावजूद पिछले दो चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवार को जीत मिलना भाजपा के लिए चिंता का विषय बन गया है।

नागपुर में उम्मीदवार चयन को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष की खबरें भी सामने आई हैं। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व विधान पार्षद अनिल सोले टिकट नहीं मिलने से नाराज बताए गए। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने का फैसला किया था। बाद में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उनसे मुलाकात कर विवाद सुलझाने का प्रयास किया। हालांकि उनके चुनाव मैदान में उतरने और बाद के घटनाक्रम का भाजपा के मतों पर कितना असर पड़ा, यह स्पष्ट नहीं है।

इस चुनाव में 15 हजार से अधिक मतपत्र अमान्य घोषित होने की खबर भी सामने आई है। इनमें से बड़ी संख्या में ऐसे मतपत्र थे, जिन पर वरीयता अंकित करने की प्रक्रिया सही तरीके से पूरी नहीं की गई थी। भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले ने अमान्य मतों के मुद्दे पर आपत्ति जताई है। वहीं चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी संभालने वाले वरिष्ठ भाजपा नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने हार की जिम्मेदारी स्वीकार की है।

पुणे स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी भाजपा को बड़ा झटका लगा है। यहां शरद पवार की पार्टी की उम्मीदवार हर्षदा देशमुख-जाधव ने भाजपा की स्मिता जाधव को हराया। हर्षदा को 1,13,095 मत मिले, जबकि स्मिता जाधव को 1,03,395 वोट प्राप्त हुए। इस तरह शरद पवार गुट की उम्मीदवार ने 9,700 मतों से जीत दर्ज की। पुणे को महाराष्ट्र का प्रमुख शिक्षा केंद्र माना जाता है। यहां स्नातक मतदाताओं के बीच भाजपा की हार को पार्टी के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

भाजपा के भीतर अब इस बात को लेकर मंथन शुरू होने की संभावना है कि मजबूत संगठन होने के बावजूद स्नातक मतदाताओं का समर्थन हासिल करने में पार्टी क्यों पिछड़ गई। शिक्षा, सरकारी भर्तियों, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दे स्नातक मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हाल के समय में एमपीएससी परीक्षाओं की अनियमितताओं और भर्ती प्रक्रिया से संबंधित शिकायतों को लेकर युवाओं में असंतोष की खबरें सामने आई हैं। ऐसे में भाजपा को शिक्षित युवाओं की समस्याओं और उनकी अपेक्षाओं पर ध्यान देने की जरूरत महसूस हो रही है।

महायुति गठबंधन के भीतर भी चुनाव परिणामों के बाद आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए हैं। भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना के नेताओं के बीच कुछ सीटों पर चुनावी सहयोग को लेकर मतभेद सामने आए हैं। भाजपा के कुछ नेताओं ने सहयोगी दलों पर पर्याप्त समर्थन नहीं देने का आरोप लगाया है। वहीं उम्मीदवार चयन और बागी प्रत्याशियों की मौजूदगी को भी हार के संभावित कारणों में गिना जा रहा है। हालांकि इन आरोपों के वास्तविक प्रभाव का आकलन विस्तृत चुनावी समीक्षा के बाद ही किया जा सकेगा।

महायुति में शामिल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रफुल्ल पटेल ने भी चुनाव परिणामों को आत्ममंथन का अवसर बताया है। उन्होंने माना कि गठबंधन को अपनी चुनावी रणनीति और आपसी समन्वय की समीक्षा करने की आवश्यकता है। दूसरी ओर प्रदेश स्तर के नेताओं ने भी परिणामों को सामूहिक जिम्मेदारी से जोड़कर देखा है।

विपक्षी महाविकास आघाड़ी के लिए ये नतीजे उत्साह बढ़ाने वाले हैं। कांग्रेस ने नागपुर में अपनी सीट बरकरार रखी, जबकि शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने दो स्नातक सीटों पर जीत हासिल की। छत्रपति संभाजीनगर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में प्रतापसिंह पाटिल ने महायुति समर्थित सतीश चव्हाण को पराजित किया। इससे विपक्ष को सत्तारूढ़ गठबंधन के खिलाफ राजनीतिक अभियान को नई दिशा देने का अवसर मिला है।

हालांकि विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों का मतदाता आधार विधानसभा तथा लोकसभा चुनावों से अलग होता है। इसलिए इन परिणामों को पूरे राज्य के मतदाताओं का प्रतिनिधि जनादेश नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद चुनावी नतीजे स्थानीय संगठन, उम्मीदवारों की लोकप्रियता और विभिन्न वर्गों के बीच राजनीतिक समर्थन की स्थिति समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

फिलहाल भाजपा नेतृत्व के सामने उम्मीदवार चयन, आंतरिक असंतोष और सहयोगी दलों के बीच समन्वय सुधारने की चुनौती है। पार्टी की कोर कमेटी में चुनाव परिणामों की समीक्षा किए जाने की संभावना है। नागपुर और पुणे जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मिली हार ने स्पष्ट कर दिया है कि मजबूत राजनीतिक आधार होने के बावजूद चुनावी सफलता के लिए जमीनी स्तर पर लगातार सक्रिय रहना आवश्यक है। अब देखना होगा कि भाजपा और महायुति नेतृत्व इस चुनावी झटके के बाद संगठन में क्या बदलाव करते हैं और विपक्ष इन परिणामों से मिले राजनीतिक उत्साह का कितना फायदा उठा पाता है।

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