महाराष्ट्र

शेफ ने संभाली पिता की 1968 से जुड़ी अनमोल सिक्कों-नोटों की विरासत

Kavita2
24 Aug 2026 5:29 PM IST
शेफ ने संभाली पिता की 1968 से जुड़ी अनमोल सिक्कों-नोटों की विरासत
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ठाणे। पेशे से एग्जीक्यूटिव शेफ दीपन अनुराधा भालचंद्र सावंत के लिए पुराने सिक्के, नोट और डाक टिकट केवल संग्रह की वस्तुएं नहीं हैं, बल्कि उनके लिए यह परिवार की विरासत, भारत के इतिहास और अपने दिवंगत पिता की यादों से जुड़ने का जरिया हैं। 36 वर्षीय दीपन के पास ऐसा संग्रह है, जिसकी शुरुआत उनके पिता भालचंद्र आर. सावंत ने वर्ष 1968 में की थी। पिता के निधन के बाद इस विरासत को संभालने की जिम्मेदारी अब दीपन ने अपने हाथों में ले ली है।

दीपन ठाणे में अपनी मां के साथ रहते हैं। घर के एक हिस्से में मौजूद यह संग्रह धीरे-धीरे उनके लिए एक विशेष परियोजना और जुनून में बदल गया है। पुराने सिक्कों, करेंसी नोटों और स्टैम्प को व्यवस्थित करने से लेकर उनकी जानकारी जुटाने और संग्रह को आगे बढ़ाने तक, वह अपने खाली समय का बड़ा हिस्सा इसी काम में लगा रहे हैं।

1968 में पिता ने शुरू किया था संग्रह

इस अनोखे संग्रह की कहानी वर्ष 1968 से शुरू होती है। उस समय दीपन के पिता भालचंद्र आर. सावंत ने सिक्के, नोट और डाक टिकट जमा करना शुरू किया था। उस दौर में संग्रह करना किसी विशेष योजना के तहत नहीं, बल्कि रुचि और जिज्ञासा के कारण शुरू हुआ था।

भालचंद्र पहले BEST कर्मचारी थे। अपनी नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने अलग-अलग समय के सिक्कों, नोटों और टिकटों को संभालकर रखना शुरू किया। धीरे-धीरे यह संग्रह बढ़ता गया।

पुराने सिक्के और करेंसी केवल आर्थिक लेनदेन का हिस्सा नहीं होते, बल्कि वे अपने समय की सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों की झलक भी देते हैं। यही वजह है कि वर्षों तक जमा की गई इन वस्तुओं का महत्व दीपन के लिए काफी अधिक है।

जनवरी 2024 में पिता का निधन

दीपन के पिता भालचंद्र आर. सावंत का जनवरी 2024 में निधन हो गया। उनके निधन के बाद परिवार के लिए यह कठिन समय था। हालांकि, पिता की छोड़ी हुई कई चीजों के बीच उनका पुराना संग्रह भी मौजूद था।

वर्ष 2025 में परिवार की वस्तुओं को व्यवस्थित करने के दौरान दीपन की नजर इस संग्रह पर गई। जब उन्होंने पुराने सिक्कों, नोटों और डाक टिकटों को ध्यान से देखना शुरू किया तो उन्हें एहसास हुआ कि उनके पिता ने वर्षों में कितनी बड़ी विरासत जमा की थी।

इसके बाद दीपन ने इस संग्रह को सिर्फ सुरक्षित रखने के बजाय उसे व्यवस्थित और सूचीबद्ध करने का फैसला किया।

घर से शुरू हुआ नया सफर

दीपन ने ठाणे स्थित अपने घर से ही संग्रह को कैटलॉग करना शुरू किया। उनका घर तीन पेट्रोल पंपों के पास स्थित है, जहां वह अपनी मां के साथ रहते हैं। व्यस्त पेशेवर जीवन के बावजूद वह अपने खाली समय में संग्रह की चीजों को एक-एक करके पहचानने और उनका रिकॉर्ड तैयार करने में जुटे हैं।

उनका उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि उनके पास कितने सिक्के या नोट हैं, बल्कि प्रत्येक वस्तु से जुड़ी जानकारी को समझना भी है। किस दौर की है, किस समय इस्तेमाल होती थी और उसके पीछे क्या ऐतिहासिक संदर्भ है—इन सवालों के जवाब तलाशना उनके काम का हिस्सा बन गया है।

करेंसी में देखते हैं भारत का अतीत

दीपन के लिए करेंसी का महत्व उसके मौद्रिक मूल्य से कहीं अधिक है। उनका मानना है कि पुराने सिक्के और नोट भारत के अतीत से जोड़ने का माध्यम हैं।

अलग-अलग समय में जारी किए गए सिक्कों और नोटों पर देश के इतिहास, शासन व्यवस्था, प्रतीकों और सांस्कृतिक पहचान की झलक मिलती है। इसलिए संग्रह की प्रत्येक वस्तु उनके लिए एक छोटी ऐतिहासिक कहानी जैसी है।

इसी वजह से वह अपने पिता के संग्रह को परिवार की व्यक्तिगत संपत्ति के साथ-साथ एक तरह की ऐतिहासिक विरासत के रूप में भी देखते हैं।

पिता की याद से जुड़ा संग्रह

इस संग्रह का सबसे भावनात्मक पहलू दीपन के लिए उनके पिता से इसका जुड़ाव है। पिता ने जिस काम की शुरुआत 1968 में की थी, उसे आगे बढ़ाना उनके लिए एक तरह से पिता की स्मृति को जीवित रखना है।

दीपन जब पुराने सिक्कों और नोटों को देखते हैं तो उनके लिए यह केवल संग्रह की वस्तु नहीं रहती। उन्हें अपने पिता की रुचि, उनकी मेहनत और उन वर्षों की याद आती है, जब उन्होंने धीरे-धीरे इन चीजों को जमा किया था।

पिता के निधन के बाद इस संग्रह को नए तरीके से व्यवस्थित करना उनके लिए भावनात्मक यात्रा भी बन गया है।

संग्रह को लगातार बढ़ा रहे हैं

2025 में संग्रह को व्यवस्थित करने के बाद दीपन अब इसे आगे भी बढ़ा रहे हैं। वह नई वस्तुओं की तलाश करते हैं और अपने मौजूदा संग्रह में उन्हें शामिल करने की कोशिश करते हैं।

उनकी रुचि केवल पुराने सिक्कों तक सीमित नहीं है। करेंसी नोट और स्टैम्प भी इस संग्रह का हिस्सा हैं। इस तरह उनके पास भारत के अलग-अलग दौर और समय से जुड़ी कई तरह की वस्तुएं जमा हो रही हैं।

शेफ की नौकरी के बीच संग्रह का जुनून

दीपन पेशे से एग्जीक्यूटिव शेफ हैं। होटल और रेस्टोरेंट की व्यस्त दुनिया में काम करने के कारण उनके पास समय सीमित रहता है। इसके बावजूद उन्होंने अपने शौक के लिए जगह बनाई है।

दिनभर पेशेवर जिम्मेदारियों में व्यस्त रहने के बाद पुराने सिक्कों और नोटों के साथ समय बिताना उन्हें अलग तरह की संतुष्टि देता है। उनके लिए यह शौक तनाव से दूर होने और इतिहास से जुड़ने का माध्यम भी बन गया है।

परिवार की विरासत से इतिहास तक

दीपन सावंत की कहानी यह बताती है कि किसी परिवार में वर्षों तक संभालकर रखी गई छोटी-छोटी वस्तुएं आने वाली पीढ़ी के लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। वर्ष 1968 में एक पिता ने शौक के तौर पर जिस संग्रह की शुरुआत की थी, वह अब उनके बेटे के लिए परिवार की विरासत बन चुका है।

दीपन अपने पिता के संग्रह को व्यवस्थित करने के साथ-साथ उसे नए रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। उनके लिए हर सिक्का, नोट और स्टैम्प अतीत की एक झलक है। यही वजह है कि एक एग्जीक्यूटिव शेफ का यह अनोखा जुनून अब उनके जीवन की ऐसी विरासत बन गया है, जिसमें पिता की याद, भारतीय इतिहास और मराठा विरासत तीनों एक साथ दिखाई देते हैं।

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