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सप्तश्रृंगी माता मंदिर में महाअष्टमी की धूम, ढोल-नगाड़ों के साथ निकली भव्य शोभायात्रा

नासिक। महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित प्रसिद्ध धार्मिक तीर्थस्थल सप्तश्रृंगी गढ़ में शारदीय नवरात्रि की महाअष्टमी का पर्व श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मां सप्तश्रृंगी भगवती के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचे। पूरे मंदिर परिसर में माता के जयकारे गूंजते रहे और धार्मिक कार्यक्रमों से वातावरण भक्तिमय बना रहा। पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. भारती पवार ने भी मंदिर पहुंचकर मां भगवती के दर्शन किए और संकल्प आरती में भाग लिया। इस दौरान श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी ट्रस्ट की ओर से विशेष पूजा-अर्चना, पवित्र कीर्तिध्वज की पूजा और देवी की पारंपरिक पालकी यात्रा का आयोजन किया गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज और 'जय सप्तश्रृंगी माता' के जयकारों के बीच निकली धार्मिक शोभायात्रा में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। सप्ताहांत की भारी भीड़ के बाद श्रद्धालुओं की संख्या में कुछ कमी जरूर देखी गई, लेकिन मंदिर में दर्शन का सिलसिला जारी रहा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री भारती पवार ने किए माता के दर्शन
महाअष्टमी के पावन अवसर पर पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ. भारती पवार सप्तश्रृंगी गढ़ पहुंचीं और मां भगवती के मंदिर में पूजा-अर्चना की।
उन्होंने देवी के चरणों में माथा टेककर आशीर्वाद प्राप्त किया और संकल्प आरती में भाग लिया।
इस दौरान मंदिर परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। भक्तों ने मां सप्तश्रृंगी की आराधना कर अपने परिवारों की सुख-समृद्धि और कल्याण की प्रार्थना की।
महाअष्टमी के दिन देवी की विशेष पूजा का धार्मिक महत्व माना जाता है। इसी कारण नवरात्रि के अंतिम दिनों में मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।
कीर्तिध्वज की विधि-विधान से हुई पूजा
महाअष्टमी समारोह का प्रमुख आकर्षण पवित्र कीर्तिध्वज की पारंपरिक पूजा रही।
श्री सप्तश्रृंगी निवासिनी देवी ट्रस्ट के मुख्य कार्यालय में ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं संयुक्त धर्मादाय आयुक्त विवेक सोनुने ने कीर्तिध्वज का विधिवत पूजन किया।
इस धार्मिक अनुष्ठान में दरेगांव के गवली परिवार के सदस्य भी शामिल हुए। इस परिवार को परंपरागत रूप से देवी के पवित्र ध्वज का संरक्षक माना जाता है।
पूजा के दौरान धार्मिक विधियों का पालन किया गया। इसके बाद कीर्तिध्वज की शोभायात्रा निकाली गई।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन और भक्तों के जयकारों ने आयोजन को विशेष बना दिया।
ढोल-नगाड़ों के साथ निकली भव्य शोभायात्रा
कीर्तिध्वज की पूजा संपन्न होने के बाद मंदिर परिसर से धार्मिक शोभायात्रा आगे बढ़ी।
शोभायात्रा के दौरान ढोल-नगाड़ों की थाप सुनाई देती रही। श्रद्धालु माता के जयकारे लगाते हुए धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए।
इस अवसर पर देवी की पालकी भी निकाली गई।
पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार देवी की पालकी को गांव की परिक्रमा कराई गई। यह परिक्रमा स्थानीय धार्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पालकी यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने मां भगवती के प्रति अपनी आस्था व्यक्त की।
स्थानीय लोगों के लिए यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत का भी प्रतीक है।
शाम को शुरू हुआ शतचंडी यज्ञ और हवन
महाअष्टमी के धार्मिक कार्यक्रमों के तहत शाम को मंदिर के सभागार में शतचंडी यज्ञ और हवन का आयोजन शुरू हुआ।
ट्रस्ट अध्यक्ष विवेक सोनुने ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रारंभिक पूजा विधियां संपन्न कीं।
इस अवसर पर पुजारियों ने धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन किया।
कार्यक्रम में मंदिर ट्रस्ट के प्रतिनिधि, अधिकारी, स्थानीय ग्रामीण और श्रद्धालु मौजूद रहे।
शतचंडी यज्ञ को देवी उपासना से जुड़ा महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान माना जाता है।
इसमें देवी महात्म्य के पाठ, मंत्रोच्चार और हवन के माध्यम से भगवती की आराधना की जाती है।
गवली परिवार निभाता है सदियों पुरानी परंपरा
सप्तश्रृंगी गढ़ पर कीर्तिध्वज चढ़ाने की परंपरा का विशेष धार्मिक महत्व है।
दरेगांव का गवली परिवार पीढ़ियों से यह जिम्मेदारी निभाता आ रहा है।
मंदिर ट्रस्ट की जानकारी के अनुसार, चैत्र पूर्णिमा और विजयादशमी के अवसर पर पर्वत के शिखर पर पवित्र ध्वज स्थापित करने की परंपरा निभाई जाती है।
इस कार्य को विशेष चुनौतीपूर्ण माना जाता है, क्योंकि पर्वत के शिखर तक पहुंचने का मार्ग कठिन है।
इसके बावजूद गवली परिवार के सदस्य धार्मिक श्रद्धा के साथ इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते हैं।
यह परंपरा सप्तश्रृंगी गढ़ की विशिष्ट धार्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
महाराष्ट्र के प्रमुख शक्तिपीठों में शामिल है मंदिर
नासिक जिले के कलवण तालुका में स्थित सप्तश्रृंगी देवी मंदिर महाराष्ट्र के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों में शामिल है।
यह मंदिर सह्याद्रि पर्वत श्रृंखला के बीच समुद्र तल से लगभग 4,659 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।
सात पर्वत शिखरों से घिरे होने के कारण इस स्थान को सप्तश्रृंगी कहा जाता है।
महाराष्ट्र पर्यटन विभाग के अनुसार, यह मंदिर राज्य के साढ़े तीन शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां विराजमान देवी सप्तश्रृंगी को आदिशक्ति का स्वरूप माना जाता है।
मंदिर में मां भगवती की अठारह भुजाओं वाली प्रतिमा स्थापित है। देवी के विभिन्न हाथों में शस्त्र और अन्य धार्मिक प्रतीक दिखाई देते हैं।
नवरात्रि के दौरान इस मंदिर का धार्मिक महत्व और बढ़ जाता है।
सप्ताहांत के बाद भी जारी रहा श्रद्धालुओं का आगमन
शारदीय नवरात्रि के दौरान सप्तश्रृंगी गढ़ में लगातार श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिली।
शनिवार और रविवार को बड़ी संख्या में भक्त देवी के दर्शन के लिए पहुंचे थे।
सप्तमी और महाअष्टमी के अवसर पर भी मंदिर परिसर में धार्मिक उत्साह बना रहा।
हालांकि, सप्ताहांत की तुलना में महाअष्टमी के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या में कुछ कमी दर्ज की गई।
इसके बावजूद मंदिर में दर्शन, पूजा-अर्चना और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम चलता रहा।
महाराष्ट्र के विभिन्न जिलों से श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं।
महाअष्टमी का धार्मिक महत्व
हिंदू धार्मिक परंपराओं में महाअष्टमी को नवरात्रि का अत्यंत महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
इस दिन मां दुर्गा के महागौरी स्वरूप की विशेष पूजा की जाती है।
भक्त देवी से सुख, समृद्धि, साहस और जीवन की कठिनाइयों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
कई स्थानों पर महाअष्टमी के अवसर पर कन्या पूजन, हवन और विशेष आरती का आयोजन किया जाता है।
सप्तश्रृंगी गढ़ में आयोजित धार्मिक अनुष्ठान भी इसी व्यापक देवी उपासना परंपरा का हिस्सा हैं।
स्थानीय संस्कृति और आस्था का संगम
सप्तश्रृंगी गढ़ का नवरात्रि उत्सव धार्मिक श्रद्धा के साथ स्थानीय सांस्कृतिक परंपराओं को भी जीवित रखता है।
कीर्तिध्वज की पूजा, गवली परिवार की पारंपरिक भूमिका और देवी की पालकी यात्रा इस आयोजन की विशिष्ट पहचान हैं।
इन धार्मिक कार्यक्रमों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपने क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत से परिचित होने का अवसर मिलता है।
साथ ही मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के कारण स्थानीय व्यापार और पर्यटन गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलता है।
जयकारों से गूंजता रहा सप्तश्रृंगी गढ़
महाअष्टमी के अवसर पर सप्तश्रृंगी गढ़ में धार्मिक उत्साह और श्रद्धा का वातावरण बना रहा।
पूर्व केंद्रीय मंत्री भारती पवार की संकल्प आरती, ट्रस्ट अध्यक्ष विवेक सोनुने की उपस्थिति में कीर्तिध्वज की पूजा, देवी की पालकी यात्रा तथा शतचंडी यज्ञ आयोजन के प्रमुख आकर्षण रहे।
ढोल-नगाड़ों और 'जय सप्तश्रृंगी माता' के जयकारों के बीच संपन्न इन कार्यक्रमों ने उत्तर महाराष्ट्र की समृद्ध धार्मिक परंपरा को एक बार फिर सामने रखा।





