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बॉम्बे HC का अहम फैसला: सोसाइटी को खुली जगहों पर भी ‘डीम्ड कन्वेयंस’ का अधिकार

Maharashtra महाराष्ट्र: बॉम्बे हाई कोर्ट ने हाल ही में महाराष्ट्र ओनरशिप फ्लैट्स एक्ट (MOFA) के तहत एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ‘डीम्ड कन्वेयंस’ (मानित हस्तांतरण) दिए जाने की स्थिति में हाउसिंग सोसाइटी का अधिकार केवल बिल्डिंग के प्लिंथ एरिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसके आसपास की उन खुली जगहों पर भी लागू होगा, जो निवासियों के उपयोग और आनंद के लिए आवश्यक हैं।
यह फैसला जस्टिस अमित बोरकर ने ‘राशेष कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी लिमिटेड’ द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। सोसाइटी ने उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे केवल बिल्डिंग के प्लिंथ एरिया तक ही कन्वेयंस अधिकार देने की बात कही गई थी और आसपास की जमीन को शामिल करने से इनकार किया गया था।
यह मामला महाराष्ट्र के भायंदर क्षेत्र स्थित एक आवासीय परियोजना से जुड़ा है, जिसे ‘श्रीजी डेवलपर्स’ द्वारा विकसित किया गया था। सोसाइटी का गठन वर्ष 2015 में हुआ था, लेकिन आरोप है कि डेवलपर ने अब तक पूरी जमीन और उससे जुड़े अधिकार सोसाइटी को हस्तांतरित नहीं किए थे। इसी वजह से सोसाइटी ने कानूनी रास्ता अपनाया।
सोसाइटी ने 2018 में राज्य सरकार द्वारा जारी एक प्रस्ताव (Government Resolution) के तहत ‘डीम्ड कन्वेयंस’ की मांग की थी। उनका कहना था कि डेवलपर द्वारा भूमि हस्तांतरण में देरी के कारण निवासियों को उनके वैध अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया कि आवासीय सोसाइटियों के अधिकार केवल भवन संरचना तक सीमित नहीं हो सकते, बल्कि उस पूरे परिसर से जुड़े हैं, जिसमें खुली जगहें, उपयोगी क्षेत्र और अन्य साझा सुविधाएं शामिल होती हैं। अदालत ने माना कि इन स्थानों का उपयोग निवासियों के दैनिक जीवन और सुविधा के लिए महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्हें भी कन्वेयंस में शामिल किया जाना चाहिए।
इस निर्णय को हाउसिंग सोसाइटीज़ के पक्ष में एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन मामलों में राहत मिलेगी, जहां डेवलपर्स द्वारा जमीन और साझा सुविधाओं के हस्तांतरण में देरी या असहमति की स्थिति बनी रहती है।
कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए संबंधित प्राधिकरणों को कानून के अनुरूप कार्रवाई करने का निर्देश दिया। यह फैसला महाराष्ट्र में रियल एस्टेट और हाउसिंग सोसाइटी प्रबंधन से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश के रूप में देखा जा रहा है।
कुल मिलाकर, बॉम्बे हाई कोर्ट का यह निर्णय न केवल निवासियों के अधिकारों को मजबूत करता है, बल्कि हाउसिंग सोसाइटी और डेवलपर्स के बीच चल रहे विवादों में स्पष्टता लाने की दिशा में भी एक अहम कदम माना जा रहा है।





