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पुणे में जल संकट के बीच बड़ा खुलासा, रोज 400 MLD ट्रीटेड पानी नदियों में हो रहा बर्बाद

Maharashtra महाराष्ट्र: पुणे शहर एक तरफ गंभीर जल संकट और पानी की किल्लत से जूझ रहा है, जहां नागरिकों को एक दिन खाली पानी की सप्लाई मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ जल पुनर्चक्रण व्यवस्था की बड़ी खामी सामने आई है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, बहाव वाले जल (ट्रीटेड वाटर) के बुनियादी परिवेश का सही इस्तेमाल न होने के कारण हर दिन 400 मिलियन लीटर से ज़्यादा उपचारित कचरा जल सीधे शहर की नदियों में छोड़ा जा रहा है।
पुणे में जल प्रबंधन को लेकर यह स्थिति शहर की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। एक तरफ नागरिकों से लगातार पानी बचाने और पुनर्चक्रण की अपील की जा रही है, वहीं दूसरी तरफ तैयार संसाधनों का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है।
पुणे नगर निगम (PMC) के आंकड़ों के अनुसार, शहर में प्रतिदिन लगभग 980 मिलियन लीटर (MLD) सीवेज उत्पन्न होता है। इसके मुकाबले शहर के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स की कुल क्षमता लगभग 477 MLD ही है। इसका मतलब है कि उत्पन्न होने वाले कचरे वाले जल का बड़ा हिस्सा या तो पूरी तरह उपचारित नहीं हो पाता या फिर उपचार के बाद उसका पुन: उपयोग नहीं किया जाता।
पुणे नगर निगम द्वारा संचालित जल प्रबंधन प्रणाली में यह अंतर एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, उपचारित जल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उपयोग में लाने के बजाय सीधे नदी चैनलों में छोड़ दिया जाता है, जिससे जल पुनर्चक्रण की पूरी व्यवस्था प्रभावित हो रही है।
सूचना का अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त जानकारी के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। आरटीआई से यह खुलासा हुआ है कि मुंडवा क्षेत्र में स्थापित ट्रीटेड वाटर प्रोजेक्ट का अनुमानित स्तर पर उपयोग नहीं हो रहा है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में पानी व्यर्थ जा रहा है।
मुंडवा ट्रीटेड वाटर प्रोजेक्ट को इस उद्देश्य से विकसित किया गया था कि उपचारित पानी का उपयोग औद्योगिक कार्यों, निर्माण कार्यों और हरित क्षेत्रों की सिंचाई में किया जा सके। लेकिन व्यावहारिक स्तर पर इस योजना का पूरा लाभ नहीं लिया जा रहा है।
शहर में पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि उपलब्ध संसाधनों पर दबाव भी बढ़ रहा है। ऐसे में यदि उपचारित पानी का प्रभावी उपयोग किया जाए तो तुलनात्मक पानी की खपत को काफी हद तक कम किया जा सकता है। ऊर्जावान का रुख है कि यह स्थिति जल प्रबंधन प्रणाली की कमजोरी को उजागर करती है।
जल ऊर्जावान के अनुसार, किसी भी बड़े शहर में सीवेज ट्रीटमेंट और वाटर डिस्चार्ज सिस्टम का उद्देश्य यह होता है कि उपयोग किए गए पानी को फिर से उपयोगी बनाया जाए। इससे न केवल पर्यावरण की रक्षा होती है बल्कि जल संकट की समस्या भी कम होती है।
लेकिन पुणे में वर्तमान स्थिति यह नेत्रहीन है कि बुनियादी ढांचा होने के बावजूद उसका पूरा उपयोग नहीं हो रहा है। इसकी सीधी असर नदियों पर भी पड़ रहा है, जहां बड़ी मात्रा में उपचारित पानी उठने से जल गुणवत्ता पर प्रभाव पड़ सकता है।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब एक तरफ पानी की कमी के कारण उन्हें सीमित आपूर्ति मिल रही है, वहीं दूसरी तरफ हजारों लीटर पानी व्यर्थ बहाया जा रहा है, यह स्थिति समझ से परे है। लोगों ने मांग की है कि प्रशासन इस व्यवस्था में तुरंत सुधार करे और पुनर्चक्रित पानी के उपयोग को अनिवार्य बनाए।
एनीमल का सुझाव है कि यदि पेड़ लगे पानी का उपयोग उद्योगों, निर्माण कार्यों और नगर निगम की विभिन्न सेवाओं में किया जाए तो पीने योग्य पानी पर दबाव काफी कम हो सकता है। इससे शहर की जल आपूर्ति व्यवस्था अधिक संतुलित और टिकाऊ बन सकती है।
फिलहाल इस मामले ने पुणे की जल नीति और प्रबंधन प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि प्रशासन इस बर्बादी को रोकने और जल पुनर्चक्रण को प्रभावी बनाने के लिए क्या ठोस कदम उठाए है।





