महाराष्ट्र

दो मंत्रियों के मंत्रिमंडल के फैसले अवैध हैं क्या कहता है संविधान

Admin4
17 July 2022 12:25 AM IST
दो मंत्रियों के मंत्रिमंडल के फैसले अवैध हैं क्या कहता है संविधान
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महाराष्ट्र में सीएम एकनाथ शिंदे (CM Eknath Shinde) और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस को शपथ लिए हुए 16 दिन गुजर चुके हैं. लेकिन अब तक मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हुआ है. राज्य से जुड़े सभी छोटे-बड़े फैसले शिंदे और फडणवीस मिल कर ले रहे हैं. शनिवार भी औरंगाबाद का नाम छत्रपति संभाजीनगर और उस्मानाबाद का नाम धाराशिव किए जाने के फैसले को मंजूरी दी गई. मुंबई मेट्रोपोलिटन रीजन के विकास के लिए 60 हजार करोड़ की निधि मंजूर की गई. इस फैसले को महाराष्ट्र सरकार के मंत्रिमंडल का फैसला कहा गया. अब तक ऐसी तीन कैबिनेट बैठक हो चुकी है. जिनमें राज्य से जुड़े छोटे-बड़े फैसले लिए जा चुके हैं. शिवसेना ने इन दो मंत्रियों (शिंदे-फडणवीस) के फैसले को ना सिर्फ गलत ठहराया है बल्कि असंवैधानिक ठहराया है. शिवसेना सांसद संजय राउत (Shiv Sena MP Sanjay Raut) ने महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी (Maharashtra Governor Bhagat Singh Koshyari) से यहां तक मांग कर डाली है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट शिवसेना से शिंदे गुट में गए 16 विधायकों को अयोग्य ठहराने के नोटिस पर फैसला नहीं सुनाता, तब तक राज्य में राष्ट्रपति शासन (President Rule) लगाया जाए.

सवाल उठता है कि क्या मंत्रिमंडल में सिर्फ दो ही सदस्यों का होना असंवैधानिक है अगर बहुमत वाली सरकार में किसी वजह से मंत्रिमंडल के विस्तार में देरी होती है तो क्या संविधान उस मंत्रिमंडल को संबंधित राज्य से जुड़े फैसले लेने की इजाजत नहीं देता है? क्या महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के लिए यह तर्क काफी है कि मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं हुआ है और विधायकों की अयोग्यता को लेकर भेजे गए नोटिस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है? इन मुद्दों पर संविधान क्या कहता है?

संविधान की धारा 164 1-A, क्यों गलत बताए जा रहे शिंदे सरकार के फैसले

शिवसेना (उद्धव ग्रुप) का तर्क है कि संविधान की धारा 164 1-A के तहत मंत्रिमंडल में कम से कम 12 सदस्यों का होना जरूरी है. इससे कम संख्या वाले मंत्रिमंडल को संविधान मान्यता नहीं देता है. इसलिए पिछले दो हफ्ते से शिंदे-फडणवीस के दो मंत्रियों वाले मंत्रिमंडल के सभी फैसले असंवैधानिक हैं.

दरअसल शिवसेना की ओर से 164 1-A को सही तरह से समझा नहीं गया है या समझ कर भी जानबूझ कर गलतफहमी पैदा करने की कोशिश की गई है. संविधान की इस धारा के तहत किसी भी राज्य में मंत्रियों की कुल संख्या या तो विधानसभा के सदस्य संख्या की 15 फीसदी या 12 होनी जरूरी है. संविधान में 'काउंसिल ऑफ मिनिस्टर' शब्द का उल्लेख हुआ है. संविधान की कही बातों को संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में देखना जरूरी होता है. ऐसा नहीं हो सकता कि जब तक मंत्रिमंडल का विस्तार ना हो, तब तक मंत्रिमंडल के दो सदस्य फैसले नहीं ले सकते. जब तक मंत्रिमंडल का विस्तार हो जाए, तब तक ये फैसले अनियमित तो माने जाएंगे लेकिन असंवैधानिक नहीं माने जा सकते. जरूरत बस इस बात की है कि मंत्रिमंडल विस्तार के बाद इन फैसलों पर रजामंदी लेकर इन्हें नियमित किया जाए.

मंत्रिमंडल विस्तार में देरी पर सवाल करने का अधिकार, लेकिन इसके लिए मजबूर नहीं है राज्यपाल

यह जरूर कहा जा सकता है कि राज्यपाल ऐसे फैसलों पर सवाल कर सकता है. या वो चाहे तो मंत्रिमंडल विस्तार जल्दी करने के निर्देश दे सकता है. राज्यपाल सरकार का ध्यान इस बात पर दिला सकता है कि एक समय सीमा में रहते हुए मंत्रिमंडल का विस्तार जरूरी है. लेकिन राज्यपाल ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं है. राज्यपाल यह अपने विशेषाधिकार और विवेकाधिकार से यह तय करेगा कि उसे हस्तक्षेप करना चाहिए या नहीं. यहां हो सकता है सुप्रीम कोर्ट जब शिवसेना के 16 विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के नोटिस पर फैसले देने के लिए दल बदल विधेयक कानून की व्याख्या से जुड़े कन्फ्यूजन को दूर करने की कोशिश करे तो राज्यपाल के अधिकारों को लेकर भी जो जटिलताएं हैं, उन्हें भी सुलझाए.

सुप्रीम कोर्ट 2008 में कर चुका है हिमाचल प्रदेश के केस में 164-1A की व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में हिमाचल प्रदेश राज्य के मामले में धारा 164-1A से जुड़े मामले में मुख्यमंत्री और सिर्फ 9 मंत्रियों के होते हुए भी उसे धारा 164-1A का उल्लंघन नहीं माना था और तब उस मंत्रिमंडल की वैधता पर सवाल नहीं उठाया था.

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