- Home
- /
- राज्य
- /
- महाराष्ट्र
- /
- भारतीय ज्ञान को दुनिया...

मुंबई। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को मुंबई की प्रतिष्ठित एशियाटिक सोसाइटी का दौरा किया और वहां आयोजित ‘गणेश ज्ञानार्थी’ प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। इस अवसर पर संस्थान की नवनिर्वाचित समिति के सदस्यों को संबोधित करते हुए उन्होंने भारतीय इतिहास, संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को देश के अपने दृष्टिकोण से समझने तथा दुनिया के सामने प्रस्तुत करने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि उपनिवेशवाद से मुक्ति का अर्थ इतिहास को मिटाना या अतीत को नकारना नहीं है, बल्कि भारतीय नजरिए से सही इतिहास को सामने लाना है।
अमित शाह ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की ज्ञान परंपराएं अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही हैं। इन्हें औपनिवेशिक सोच और उन ढांचों से मुक्त करने की जरूरत है, जिनके माध्यम से लंबे समय तक ज्ञान और बौद्धिकता को राजनीतिक प्रभुत्व से जोड़कर देखा गया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान के संरक्षण के साथ उसका व्यापक प्रचार-प्रसार भी आवश्यक है, ताकि देश और दुनिया के लोग उसके वास्तविक महत्व से परिचित हो सकें।
गृह मंत्री ने एशियाटिक सोसाइटी की नई समिति को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि समिति को भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल उद्देश्यों को समझते हुए संस्थान के पास उपलब्ध ज्ञान को सीमित दायरे से बाहर निकालना चाहिए। पुस्तकालयों, दस्तावेजों और संग्रहों में सुरक्षित ज्ञान केवल इमारतों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे आधुनिक माध्यमों के जरिए देश और दुनिया के लोगों तक पहुंचाया जाना चाहिए।
अमित शाह ने कहा कि किसी भी देश की पहचान उसकी संस्कृति, इतिहास, भाषा और ज्ञान परंपरा से बनती है। यदि किसी समाज को अपने इतिहास की सही समझ नहीं होगी तो वह अपने वर्तमान और भविष्य को भी पूरी तरह नहीं समझ सकेगा। इसलिए ऐतिहासिक तथ्यों का अध्ययन भारतीय संदर्भ में किया जाना जरूरी है। उन्होंने इतिहास को राजनीतिक आग्रहों से अलग रखते हुए शोध और प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करने की आवश्यकता बताई।
उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक काल में ज्ञान की कई भारतीय परंपराओं को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। विभिन्न क्षेत्रों में भारत के योगदान को सीमित दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया गया या उसकी व्याख्या बाहरी नजरिए से की गई। अब समय आ गया है कि भारतीय विद्वान, शोधकर्ता और संस्थान अपनी विरासत का अध्ययन करें तथा उसे प्रमाणिक तरीके से सामने लाएं। यह प्रक्रिया किसी कालखंड को मिटाने की नहीं, बल्कि इतिहास को व्यापक और संतुलित रूप में समझने की होनी चाहिए।
गृह मंत्री ने एशियाटिक सोसाइटी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ऐसी संस्थाओं के पास ऐतिहासिक दस्तावेजों, दुर्लभ पुस्तकों और ज्ञान सामग्री का बड़ा संग्रह होता है। इस धरोहर का संरक्षण करना आवश्यक है, लेकिन संरक्षण के साथ उसे जनता की पहुंच में लाना भी उतना ही जरूरी है। आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों का उपयोग करके इस ज्ञान को विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और आम नागरिकों तक पहुंचाया जा सकता है।
‘गणेश ज्ञानार्थी’ प्रदर्शनी के उद्घाटन को सांस्कृतिक और बौद्धिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भगवान गणेश को भारतीय परंपरा में ज्ञान, बुद्धि और विवेक का प्रतीक माना जाता है। प्रदर्शनी के माध्यम से गणेश से जुड़ी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों और ज्ञान परंपरा को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। अमित शाह ने प्रदर्शनी का अवलोकन करते हुए आयोजन से जुड़े लोगों के प्रयासों की जानकारी ली।
उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ना संस्थानों की बड़ी जिम्मेदारी है। आज के युवाओं को अपनी संस्कृति और इतिहास की तथ्यपरक जानकारी उपलब्ध कराई जानी चाहिए। जब युवा अपनी बौद्धिक विरासत को समझेंगे तो उनमें देश के प्रति आत्मविश्वास और गौरव की भावना मजबूत होगी। इसके लिए पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है।
अमित शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दृष्टिकोण से इतिहास प्रस्तुत करने का अर्थ किसी दूसरे विचार या संस्कृति को अस्वीकार करना नहीं है। इसका उद्देश्य उन तथ्यों, परंपराओं और उपलब्धियों को उचित स्थान दिलाना है, जिन्हें लंबे समय तक पर्याप्त पहचान नहीं मिली। इतिहास के अध्ययन में सभी पक्षों को शामिल करना और सत्य को प्रमाणों के आधार पर सामने लाना आवश्यक है।
उन्होंने संस्थान की नई समिति से ज्ञान सामग्री के विस्तार, शोध को प्रोत्साहन देने और भारतीय विरासत को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि एशियाटिक सोसाइटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों को अपने संग्रह और शोध कार्यों को आधुनिक तकनीक से जोड़ना चाहिए। डिजिटल अभिलेख तैयार करने और विभिन्न भाषाओं में सामग्री उपलब्ध कराने से इसका लाभ अधिक लोगों को मिल सकेगा।
कार्यक्रम के दौरान अमित शाह ने भारतीय इतिहास के पुनर्पाठ और ज्ञान परंपराओं के पुनरुत्थान को बौद्धिक स्वतंत्रता से जोड़ा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ वैचारिक और बौद्धिक स्वतंत्रता भी आवश्यक है। जब देश अपने इतिहास और संस्कृति को अपने दृष्टिकोण से देखता है, तभी वह अपनी सभ्यतागत पहचान को मजबूत कर सकता है।
एशियाटिक सोसाइटी की नवनिर्वाचित समिति के साथ आयोजित सभा में संस्था के भविष्य के कार्यों और भारतीय ज्ञान को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की संभावनाओं पर भी चर्चा हुई। गृह मंत्री ने उम्मीद जताई कि समिति संस्थान में मौजूद महत्वपूर्ण ज्ञान को सीमित परिसर से निकालकर समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाएगी। इसके लिए शोध, संवाद, प्रदर्शनी और डिजिटल माध्यमों का प्रभावी उपयोग किया जा सकता है।
‘गणेश ज्ञानार्थी’ प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए अमित शाह ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने और वैश्विक मंच पर उसे उचित मान्यता दिलाने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि देश के इतिहास को सही संदर्भ और भारतीय नजरिए से प्रस्तुत करने का काम विद्वानों तथा सांस्कृतिक संस्थानों की सक्रिय भागीदारी से ही संभव होगा।





