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महाराष्ट्र के 265 तालुके सूखाग्रस्त घोषित, सामान्य से 18.8 फीसदी कम बारिश

Kavita2
29 Sept 2026 5:51 PM IST
महाराष्ट्र के 265 तालुके सूखाग्रस्त घोषित, सामान्य से 18.8 फीसदी कम बारिश
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मुंबई। महाराष्ट्र में इस वर्ष बारिश की कमी ने खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। राज्य सरकार ने कुल 358 तालुकों में से 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1 जून से 18 सितंबर के बीच राज्य में सामान्य से 18.8 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। मराठवाड़ा सहित कई क्षेत्रों में वर्षा की कमी और अधिक गंभीर बताई जा रही है।

राज्य में 1 जून से 18 सितंबर तक 755.9 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि इसी अवधि में सामान्य वर्षा 932.3 मिलीमीटर होती है। यानी अपेक्षित बारिश की तुलना में करीब 176.4 मिलीमीटर कम वर्षा दर्ज की गई। लंबे समय तक पर्याप्त बारिश नहीं होने से कई जिलों में खरीफ फसलों की स्थिति प्रभावित हुई है।

बारिश की कमी का असर सबसे पहले खेतों में दिखा है। कई क्षेत्रों में बुआई के बाद पर्याप्त पानी नहीं मिलने से फसलों की बढ़वार पर असर पड़ा। कुछ इलाकों में किसानों को दोबारा बुआई करनी पड़ी, जबकि कई जगह खेतों में नमी की कमी के कारण उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ गई है।

सूखे की स्थिति केवल खेती तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने लगा है। कृषि पर निर्भर परिवारों की आय प्रभावित होने की आशंका है और खेतिहर मजदूरों के लिए काम के अवसर भी कम हो सकते हैं।

महाराष्ट्र में बड़ी आबादी सीधे या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। ऐसे में 265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाना राज्य के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है। सरकार को अब राहत और सहायता उपायों पर अधिक जोर देना पड़ सकता है।

मराठवाड़ा लंबे समय से वर्षा की अनिश्चितता से प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। इस बार भी वहां कई हिस्सों में बारिश की कमी ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पानी की उपलब्धता कम होने से खरीफ फसलों के साथ पशुपालन पर भी असर पड़ सकता है।

कई क्षेत्रों में जलाशयों, तालाबों और छोटे बांधों में पानी की उपलब्धता सामान्य स्तर से कम रहने की आशंका है। इससे आने वाले महीनों में पेयजल और सिंचाई दोनों को लेकर दबाव बढ़ सकता है।

बारिश की कमी का असर सोयाबीन, कपास, दालों, मक्का और अन्य खरीफ फसलों पर पड़ सकता है। जिन किसानों की खेती मुख्य रूप से मानसूनी बारिश पर निर्भर है, उनके लिए स्थिति अधिक कठिन है।

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार कम बारिश होने से मिट्टी में नमी कम हो जाती है। इससे फसल की बढ़वार, फूल आने और दाना बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

राज्य सरकार ने सूखे की स्थिति का आकलन करने के बाद 265 तालुकों को प्रभावित श्रेणी में रखा है। अब इन क्षेत्रों में राहत से जुड़े उपायों को प्राथमिकता दिए जाने की संभावना है।

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों को फसल नुकसान का आकलन, सिंचाई सुविधा, पानी की उपलब्धता और अन्य सहायता की जरूरत पड़ सकती है। प्रशासन को स्थानीय स्तर पर हालात की निगरानी करनी होगी।

कम बारिश के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में पशुओं के लिए चारा उपलब्धता भी चुनौती बन सकती है। खेतों में उत्पादन घटने की स्थिति में चारे की उपलब्धता और कीमत दोनों प्रभावित हो सकती हैं।

इसका असर दूध उत्पादन और पशुपालन से जुड़े परिवारों की आय पर भी पड़ सकता है। महाराष्ट्र के कई हिस्सों में खेती के साथ पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है।

वर्षा की कमी से भूजल स्तर पर भी असर पड़ सकता है। यदि आने वाले समय में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो कुओं और बोरवेल में पानी का स्तर और नीचे जा सकता है।

सूखे की स्थिति वाले इलाकों में किसानों की सबसे बड़ी चिंता फसल बचाने की है। जिनके पास सिंचाई के निजी साधन हैं, वे कुछ हद तक स्थिति संभाल सकते हैं, लेकिन पूरी तरह बारिश पर निर्भर किसानों के लिए विकल्प सीमित हैं।

कम उत्पादन की स्थिति में किसानों की आय घट सकती है और कृषि ऋण चुकाने में भी परेशानी हो सकती है। इससे ग्रामीण बाजारों में खरीदारी और व्यापार पर भी असर पड़ सकता है।

खेती से होने वाली आय ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कई स्तरों पर घूमती है। फसल अच्छी होने पर बाजार, परिवहन, खाद-बीज कारोबार और छोटे व्यवसायों को फायदा मिलता है। लेकिन सूखे की स्थिति में इन गतिविधियों पर भी दबाव बढ़ जाता है।

राज्य सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ किसानों को राहत देना जरूरी है और दूसरी तरफ पानी की उपलब्धता बनाए रखना भी महत्वपूर्ण होगा।

सूखाग्रस्त क्षेत्रों में स्थानीय प्रशासन को जलस्रोतों की स्थिति पर नजर रखने की जरूरत होगी। यदि पानी की कमी बढ़ती है तो पेयजल आपूर्ति के लिए अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ सकती है।

ग्रामीण इलाकों में रोजगार की स्थिति भी प्रभावित हो सकती है। कृषि कार्य कम होने पर खेतिहर मजदूरों को वैकल्पिक रोजगार की जरूरत पड़ सकती है।

इस बार की कम बारिश ने एक बार फिर महाराष्ट्र में मानसून पर निर्भर खेती की कमजोरी को सामने ला दिया है। सिंचाई सुविधा वाले क्षेत्रों में स्थिति कुछ बेहतर हो सकती है, लेकिन वर्षा आधारित कृषि वाले हिस्सों में संकट अधिक गंभीर है।

मराठवाड़ा, विदर्भ और अन्य प्रभावित क्षेत्रों में किसान अब आगे के मौसम पर नजर लगाए हुए हैं। यदि आने वाले दिनों में कुछ बारिश होती है तो देर से बोई गई या खड़ी फसलों को कुछ राहत मिल सकती है।

हालांकि जून से सितंबर के बीच अब तक दर्ज कमी ने फसल चक्र को पहले ही प्रभावित कर दिया है। कई क्षेत्रों में उत्पादन सामान्य से कम रहने की आशंका बढ़ गई है।

राज्य सरकार की ओर से सूखाग्रस्त घोषित किए गए तालुकों में आगे राहत उपायों की रूपरेखा स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर तय की जा सकती है।

फिलहाल सरकारी आंकड़ों से साफ है कि महाराष्ट्र में मानसून इस वर्ष अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा। 1 जून से 18 सितंबर तक सामान्य 932.3 मिलीमीटर के मुकाबले केवल 755.9 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।

यानी राज्य ने सामान्य वर्षा की तुलना में 18.8 प्रतिशत की कमी झेली है। यही कमी अब खेती, जल संसाधन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दबाव के रूप में दिखाई दे रही है।

265 तालुकों को सूखाग्रस्त घोषित किया जाना इस संकट की गंभीरता को दिखाता है। आने वाले हफ्तों में सरकार के राहत कदम और मौसम की स्थिति इस बात को तय करेंगे कि किसानों पर पड़ने वाला असर कितना गंभीर रहता है।

फिलहाल महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में सबसे बड़ी चिंता फसल, पानी और आय को लेकर है। बारिश की कमी से पैदा हुई यह स्थिति आने वाले महीनों में भी राज्य सरकार और किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनी रह सकती है।

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