मध्य प्रदेश

धर्म का उद्देश्य इंसान को बेहतर बनाना, लेकिन आध्यात्मिकता कम होती जा रही: कार्तिकेय वाजपेयी

Kavita2
10 Sept 2026 10:53 AM IST
धर्म का उद्देश्य इंसान को बेहतर बनाना, लेकिन आध्यात्मिकता कम होती जा रही: कार्तिकेय वाजपेयी
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भोपाल। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के दामाद और लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने कहा कि दुनिया के सभी धर्मों का मूल उद्देश्य मनुष्य को आध्यात्मिक बनाना और उसके भीतर बेहतर मानवीय एवं ईश्वरीय गुणों का विकास करना है। हालांकि वर्तमान समय में समाज में आध्यात्मिकता का अभाव दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों को बाहरी दुनिया की भागदौड़ के बीच अपने भीतर की आवाज सुनने और खुद से दोबारा जुड़ने की आवश्यकता है।

बुधवार को शहर में मीडिया से बातचीत के दौरान कार्तिकेय वाजपेयी अपनी पहली किताब ‘द अनबिकमिंग’ (The Unbecoming) को लेकर चर्चा कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म की स्थापना के पीछे मूल विचार लोगों को बेहतर इंसान बनाने का था। अलग-अलग धर्मों की परंपराएं और मान्यताएं भले ही अलग हों, लेकिन उनका केंद्रीय उद्देश्य मनुष्य को भीतर से विकसित करना और उसे आध्यात्मिक जीवन की ओर ले जाना रहा है।

धर्म और आध्यात्मिकता के बीच संबंध

वाजपेयी ने कहा कि धर्म को केवल रीति-रिवाजों, परंपराओं या बाहरी आचरण तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति के भीतर करुणा, सत्य, आत्मअनुशासन और मानवीय मूल्यों को विकसित करना है। जब मनुष्य अपने भीतर इन गुणों को विकसित करता है, तभी वह वास्तव में आध्यात्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ता है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में धार्मिक गतिविधियां तो दिखाई देती हैं, लेकिन उनमें निहित आध्यात्मिक उद्देश्य कई बार पीछे छूट जाता है। उनके अनुसार आज लोगों के पास संसाधन और सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग अपने भीतर की शांति और संतुलन से दूर होते जा रहे हैं।

वाजपेयी ने इस संदर्भ में कहा कि “लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आध्यात्मिकता केवल किसी विशेष धार्मिक पहचान से जुड़ी चीज नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के अपने भीतर की यात्रा है।

अपने भीतर की आवाज सुनने की जरूरत

लेखक ने कहा कि आज के दौर में लोगों को अपने अंदर की आवाज से फिर जुड़ने की जरूरत है। आधुनिक जीवन में व्यक्ति लगातार बाहरी अपेक्षाओं, प्रतिस्पर्धा और व्यस्तताओं से घिरा हुआ है। ऐसे में वह कई बार अपने वास्तविक विचारों और भावनाओं से दूर हो जाता है।

उनके मुताबिक व्यक्ति को अपने भीतर झांकने और खुद को समझने के लिए समय देना चाहिए। आत्मचिंतन और स्वयं को समझने की प्रक्रिया व्यक्ति को अपनी कमजोरियों और क्षमताओं को पहचानने में मदद करती है। यही प्रक्रिया उसे अधिक संतुलित और बेहतर इंसान बनने की दिशा में ले जा सकती है।

‘द अनबिकमिंग’ में आत्मखोज का प्रयास

कार्तिकेय वाजपेयी अपने पहले नॉवेल ‘द अनबिकमिंग’ के जरिए इन्हीं सवालों और आत्मखोज की प्रक्रिया को साहित्यिक रूप में सामने लाने का प्रयास कर रहे हैं। पुस्तक का प्रकाशन पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया ने किया है।

किताब की खासियत यह है कि इसमें 14वें दलाई लामा और स्वामी सर्वप्रियानंद की प्रस्तावनाएं शामिल हैं। दोनों की प्रस्तावनाओं ने पुस्तक को आध्यात्मिक और दार्शनिक विमर्श से भी जोड़ दिया है।

वाजपेयी के मुताबिक पुस्तक के माध्यम से व्यक्ति के भीतर चलने वाली उस यात्रा को समझने का प्रयास किया गया है, जिसमें वह अपनी पहचान, विचारों और जीवन के उद्देश्य को लेकर सवाल करता है। उनके अनुसार मनुष्य का विकास केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। उसके भीतर होने वाला परिवर्तन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बाहरी सफलता से आगे की तलाश

मीडिया से बातचीत के दौरान वाजपेयी ने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिक समाज में सफलता को अक्सर आर्थिक उपलब्धियों, सामाजिक प्रतिष्ठा और भौतिक सुविधाओं के आधार पर देखा जाता है। हालांकि व्यक्ति के जीवन में इन चीजों की अपनी भूमिका है, लेकिन इनके बावजूद यदि आंतरिक संतोष और शांति नहीं है तो जीवन अधूरा रह सकता है।

उन्होंने कहा कि आध्यात्मिकता का मतलब दुनिया से अलग हो जाना नहीं है। बल्कि यह अपने जीवन, व्यवहार और दूसरों के प्रति दृष्टिकोण को बेहतर बनाने की प्रक्रिया है। व्यक्ति अपने रोजमर्रा के जीवन में रहते हुए भी आत्मचिंतन, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों को अपना सकता है।

युवाओं के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश

वाजपेयी की बातों में युवाओं के लिए भी यह संदेश दिखाई देता है कि आधुनिक जीवन की प्रतिस्पर्धा के बीच आत्मचिंतन को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। करियर और व्यक्तिगत उपलब्धियों के साथ व्यक्ति को यह भी समझने की जरूरत है कि वह वास्तव में जीवन से क्या चाहता है और उसके लिए कौन से मूल्य महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति अपने भीतर की आवाज को सुनना शुरू करता है तो उसके लिए जीवन के कई सवालों को समझना आसान हो जाता है। आत्मज्ञान की यह प्रक्रिया किसी एक धर्म, समुदाय या विचारधारा तक सीमित नहीं है।

धार्मिक पहचान से परे आध्यात्मिक दृष्टिकोण

कार्तिकेय वाजपेयी ने सभी धर्मों के साझा उद्देश्य की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में भले ही पूजा-पद्धति और मान्यताओं में अंतर हो, लेकिन मनुष्य को बेहतर बनाने का संदेश उनमें महत्वपूर्ण रूप से मौजूद है।

उनके अनुसार जरूरत इस बात की है कि धर्म के बाहरी स्वरूप के साथ-साथ उसके मूल संदेश को भी समझा जाए। यदि व्यक्ति अपने भीतर करुणा, सत्य, संयम और आत्मजागरूकता जैसे गुण विकसित करता है तो यही आध्यात्मिकता की वास्तविक दिशा हो सकती है।

‘द अनबिकमिंग’ के माध्यम से वाजपेयी ने इसी आंतरिक यात्रा और आत्मखोज के विषय को पाठकों के सामने रखने का प्रयास किया है। बुधवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने धर्म, आध्यात्मिकता और व्यक्ति के भीतर की आवाज से जुड़ी इन्हीं अवधारणाओं पर विस्तार से अपने विचार साझा किए।

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