- Home
- /
- राज्य
- /
- मध्य प्रदेश
- /
- पितृ पक्ष में गूंज रहे...
पितृ पक्ष में गूंज रहे सांझी माता के गीत, अच्छे जीवनसाथी की कामना से पूजा कर रहीं युवतियां

इंदौर। आधुनिकता और तेजी से बदलती जीवनशैली के बीच मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में सदियों पुरानी सांझी माता की परंपरा आज भी जीवित है। पितृ पक्ष के दौरान इंदौर के जिंसी इलाके की शंकरगंज कॉलोनी में शाम ढलते ही अविवाहित लड़कियां एकत्र होकर सांझी माता की पूजा करती हैं। हाथों में पीतल की थालियां, पूजा की सामग्री और होठों पर पारंपरिक लोकगीत लिए युवतियां इस अनूठी परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। सांझी माता को संझा, संज्या और संध्या माता के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस पूजा से अविवाहित लड़कियों को अच्छा जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है। यह परंपरा धार्मिक आस्था के साथ महिलाओं की सामूहिक भागीदारी, लोककला और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखे हुए है।
शाम ढलते ही गूंजने लगते हैं लोकगीत
शंकरगंज कॉलोनी की गलियों में पितृ पक्ष के दिनों में शाम का नजारा अलग होता है। सूर्यास्त के समय आसपास की अविवाहित लड़कियां सांझी माता की पूजा के लिए एकत्र होती हैं।
इस दौरान युवतियां पारंपरिक गीत गाती हैं और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना करती हैं। पूजा के समय घरों की दीवारों पर बनाई गई सांझी माता की आकृतियों को फूलों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से सजाया जाता है।
यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि लड़कियों के लिए एक-दूसरे के साथ समय बिताने और पारंपरिक गीत सीखने का अवसर भी है।
मालवा क्षेत्र में यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है। कई परिवारों में बड़ी उम्र की महिलाएं नई पीढ़ी की लड़कियों को पूजा की विधि और लोकगीत सिखाती हैं।
गोबर से बनाई जाती हैं सांझी माता की आकृतियां
सांझी माता की पूजा में घर की दीवारों पर गोबर से विभिन्न आकृतियां बनाने की परंपरा है। इनमें चंद्रमा, सूर्य, तारे, फूल-पत्तियां, पेड़-पौधे और अन्य पारंपरिक प्रतीक शामिल होते हैं।
इन आकृतियों को प्राकृतिक रंगों और फूलों से सजाया जाता है। कई स्थानों पर प्रतिदिन नई आकृतियां बनाने की परंपरा भी है।
लड़कियां शाम के समय इन आकृतियों के सामने एकत्र होकर पूजा करती हैं और गीत गाती हैं।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने भी सांझी को उत्तर और मध्य भारत की एक महत्वपूर्ण लोक परंपरा के रूप में दर्ज किया है। इसके अनुसार, यह अनुष्ठान पितृ पक्ष में पूर्णिमा से अमावस्या के बीच किया जाता है।
अच्छे पति और सुखी जीवन की करती हैं कामना
सांझी माता की पूजा विशेष रूप से अविवाहित लड़कियों से जुड़ी हुई है। लोकमान्यता के अनुसार, इस पूजा से उन्हें योग्य जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है।
पूजा के दौरान गाए जाने वाले गीतों में विवाह, परिवार, ससुराल, रिश्तों और भविष्य की खुशियों का वर्णन होता है।
इन गीतों के माध्यम से युवतियां अपने सपनों और भावनाओं को भी व्यक्त करती हैं। यही कारण है कि सांझी के लोकगीतों को केवल धार्मिक गीत नहीं, बल्कि महिलाओं की भावनाओं और पारंपरिक सामाजिक जीवन की अभिव्यक्ति भी माना जाता है।
लोक संस्कृति के जानकारों के अनुसार, सांझी पूजा में लड़कियों की सामूहिक भागीदारी उन्हें पारंपरिक कला और सामाजिक व्यवहार से भी परिचित कराती है।
पितृ पक्ष के 16 दिनों तक चलता है आयोजन
सांझी माता की पूजा का संबंध पितृ पक्ष से है। इस दौरान हिंदू परिवार अपने पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध और तर्पण करते हैं।
इसी अवधि में मालवा क्षेत्र की अविवाहित लड़कियां सांझी माता की पूजा करती हैं। यह परंपरा लगभग 15 से 16 दिनों तक चलती है।
हर शाम लड़कियां एकत्र होकर गीत गाती हैं और पूजा करती हैं। इस दौरान सांझी की आकृतियों को नए रूप में सजाया जाता है।
लोकमान्यता है कि सांझी माता पितृ पक्ष के दौरान अपने मायके आती हैं। इसी विश्वास के आधार पर लड़कियां गीतों के माध्यम से उनका स्वागत करती हैं।
पितृ पक्ष समाप्त होने के साथ सांझी पूजा का भी समापन होता है। अलग-अलग क्षेत्रों में समापन की विधि में स्थानीय परंपराओं के अनुसार अंतर देखने को मिलता है।
मालवा के अलावा कई राज्यों में जीवित परंपरा
सांझी माता की पूजा केवल मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र तक सीमित नहीं है। राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी इस परंपरा के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।
कुछ स्थानों पर इसे सांझी कहा जाता है, जबकि मालवा और निमाड़ में संज्या या संझा नाम अधिक प्रचलित है।
विभिन्न क्षेत्रों में पूजा की विधि और गीतों में थोड़ा अंतर हो सकता है, लेकिन इसका मूल उद्देश्य सामूहिक आराधना और पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण है।
राजस्थान के कई हिस्सों में भी घरों की दीवारों पर गोबर और फूलों से सांझी की आकृतियां बनाने की परंपरा आज तक जारी है।
महिलाओं के आपसी जुड़ाव की अनूठी मिसाल
सांझी माता की पूजा महिलाओं के आपसी सहयोग और सामूहिक भागीदारी का भी प्रतीक है।
पुराने समय में इस आयोजन के माध्यम से गांव और मोहल्ले की लड़कियां एक-दूसरे के घर जाती थीं। वे मिलकर पूजा की तैयारी करतीं, आकृतियां बनातीं और लोकगीत गाती थीं।
इससे उनके बीच सामाजिक संबंध मजबूत होते थे। साथ ही बुजुर्ग महिलाओं से नई पीढ़ी तक पारंपरिक कला और गीतों का ज्ञान पहुंचता था।
आज भी इस परंपरा में महिलाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। कई परिवारों में मां और दादी अपनी बेटियों को सांझी माता से जुड़े गीत और कहानियां सुनाती हैं।
इस तरह यह परंपरा पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक जुड़ाव बनाए रखने का माध्यम बनी हुई है।
शहरीकरण के बीच संस्कृति को बचाने की कोशिश
तेजी से बढ़ते शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली के कारण कई पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं।
पहले घरों में मिट्टी की दीवारें और बड़े आंगन होते थे, जहां सांझी माता की आकृतियां आसानी से बनाई जाती थीं। अब शहरों में बदलते मकानों और सीमित जगहों के कारण ऐसी गतिविधियों के लिए स्थान कम होता जा रहा है।
इसके बावजूद इंदौर के जिंसी और शंकरगंज कॉलोनी जैसे क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी निभाई जा रही है।
युवतियों की भागीदारी बताती है कि आधुनिक जीवन के बीच भी पारंपरिक रीति-रिवाजों को बनाए रखने की इच्छा मौजूद है।
लोकगीतों में छिपा है सांस्कृतिक इतिहास
सांझी माता के गीत मालवा की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनमें ग्रामीण जीवन, पारिवारिक रिश्तों, विवाह और सामाजिक परंपराओं का उल्लेख मिलता है।
इन गीतों में स्थानीय भाषा और बोलियों का इस्तेमाल होता है। इसलिए ये क्षेत्रीय भाषाई विरासत को सुरक्षित रखने का भी माध्यम हैं।
सांझी परंपरा केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है। इसमें कला, संगीत, धार्मिक आस्था और सामाजिक संबंधों का अनूठा संगम दिखाई देता है।
शंकरगंज कॉलोनी में हर शाम होने वाला यह आयोजन इसी सांस्कृतिक विरासत की याद दिलाता है। युवतियां अपनी सामूहिक पूजा और लोकगीतों के माध्यम से उस परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं, जो कई पीढ़ियों से मालवा की पहचान बनी हुई है।





