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SC : रजिस्ट्रार जनरल को अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार नहीं

New Delhi नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी भी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के पास न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ स्वयं से अनुशासनात्मक कार्यवाही (डिसिप्लिनरी प्रोसिडिंग) शुरू करने का कोई अधिकार नहीं है, चाहे मामला संवैधानिक ढांचे के तहत हो या सेवा नियमों के अंतर्गत।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 235 के तहत जिला न्यायालयों और अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण का अधिकार केवल हाई कोर्ट के पास होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “हाई कोर्ट” का अर्थ चीफ जस्टिस और उनके साथी न्यायाधीशों की संस्था से है, न कि किसी प्रशासनिक अधिकारी से।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल केवल चीफ जस्टिस या न्यायाधीशों की समिति द्वारा दिए गए निर्देशों या अधिकृत आदेशों के अनुसार ही कार्य कर सकते हैं। वे स्वतंत्र रूप से किसी भी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक प्रक्रिया शुरू नहीं कर सकते।
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने 18 मई 2026 को उत्तराखंड हाई कोर्ट की न्यायिक अधिकारी दीपाली शर्मा की बहाली को चुनौती देने वाली एक अपील को खारिज करते हुए दी। इस मामले में अनुशासनात्मक प्रक्रिया और बहाली से जुड़े प्रशासनिक अधिकारों पर सवाल उठाया गया था।
अदालत ने अपने निर्णय में न्यायिक प्रणाली की स्वतंत्रता और संरचनात्मक संतुलन पर जोर दिया और कहा कि अधीनस्थ न्यायपालिका पर नियंत्रण की शक्ति पूरी तरह से संवैधानिक प्रावधानों के तहत हाई कोर्ट को ही प्राप्त है। किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को इस अधिकार का प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को न्यायपालिका के भीतर अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक नियंत्रण की सीमाओं को स्पष्ट करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में न्यायिक अधिकारियों से जुड़े अनुशासनात्मक मामलों में प्रक्रिया की स्पष्टता सुनिश्चित करेगा।
इस निर्णय के बाद यह भी स्पष्ट हो गया है कि न्यायिक प्रशासन में किसी भी प्रकार की कार्रवाई केवल संवैधानिक ढांचे और निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार ही की जा सकती है, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता बनी रहे।





