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इंदौर। इंदौर मैनेजमेंट एसोसिएशन ने शनिवार को शहर के एक होटल में कार्यस्थल पर सफलता के लिए जरूरी गुणों पर केंद्रित मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम आयोजित किया। कार्यक्रम का विषय “वर्कप्लेस पर सफलता के लिए आवश्यक गुण विकसित करने का आठ सूत्रीय मॉडल” था। इसमें विभिन्न संस्थानों और व्यावसायिक क्षेत्रों से जुड़े प्रतिभागियों को प्रोफेशनल व्यवहार, जिम्मेदारी, संवाद और लगातार सीखने के महत्व के बारे में बताया गया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट और इमोशनल इंटेलिजेंस विशेषज्ञ डॉ. संदीप अत्रे थे। उन्होंने कहा कि बदलते कॉरपोरेट और प्रोफेशनल वातावरण में केवल तकनीकी जानकारी या शैक्षणिक योग्यता के आधार पर लंबे समय तक सफलता हासिल नहीं की जा सकती। कर्मचारियों और प्रबंधकों को अपने व्यवहार, सोच, समय प्रबंधन और संवाद क्षमता पर भी लगातार काम करना पड़ता है।
यह मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम 12 सितंबर को दोपहर दो बजे से रैडिसन ब्लू होटल में आयोजित किया गया। आईएमए मध्य भारत के प्रमुख प्रबंधन संगठनों में शामिल है और यह पेशेवरों, उद्योग प्रतिनिधियों, विद्यार्थियों तथा प्रबंधन विशेषज्ञों को सीखने एवं संवाद का मंच उपलब्ध कराता है।
प्रोफेशनलिज्म का मतलब केवल अच्छा पहनावा नहीं
डॉ. अत्रे ने बताया कि प्रोफेशनलिज्म को अक्सर औपचारिक पहनावे, अंग्रेजी में अच्छी बातचीत या किसी बड़ी कंपनी में नौकरी करने तक सीमित समझ लिया जाता है। वास्तव में प्रोफेशनल होने का अर्थ अपने काम, सहकर्मियों, संगठन और समय के प्रति जिम्मेदार होना है। कर्मचारी अपने वादे कैसे निभाता है, समय सीमा का कितना सम्मान करता है और समस्या सामने आने पर किस प्रकार व्यवहार करता है, इससे उसकी पेशेवर पहचान बनती है।
उन्होंने कहा कि किसी कर्मचारी के पास पर्याप्त तकनीकी ज्ञान हो सकता है, लेकिन यदि वह समय पर काम पूरा नहीं करता, अपने साथियों से स्पष्ट संवाद नहीं करता या गलती की जिम्मेदारी लेने से बचता है तो उसकी विशेषज्ञता का पूरा लाभ संगठन को नहीं मिल पाता। इसी तरह कम अनुभव वाला व्यक्ति सही दृष्टिकोण और लगातार सीखने की आदत के कारण बेहतर प्रदर्शन कर सकता है।
सोच-समझकर करें प्रतिबद्धता
आठ सूत्रीय मॉडल का पहला सिद्धांत समझदारी से प्रतिबद्धता करना है। वक्ता ने कहा कि किसी काम के लिए तुरंत हां कह देना हमेशा प्रोफेशनल व्यवहार नहीं होता। पहले उपलब्ध समय, संसाधनों, क्षमता और जिम्मेदारियों का आकलन करना चाहिए। यदि कोई कर्मचारी बिना सोचे कई कामों की जिम्मेदारी लेता है और बाद में उन्हें पूरा नहीं कर पाता तो उसका भरोसा कमजोर होता है।
सही प्रतिबद्धता का अर्थ है कि व्यक्ति उतना ही वादा करे, जितना वह तय समय और अपेक्षित गुणवत्ता के साथ पूरा कर सकता है। आवश्यकता होने पर समय सीमा या संसाधनों को लेकर शुरुआत में ही स्पष्ट बातचीत करनी चाहिए।
अच्छी तैयारी से कम होती हैं गलतियां
दूसरा सिद्धांत किसी काम को शुरू करने से पहले पूरी तैयारी करना है। डॉ. अत्रे के अनुसार तैयारी केवल जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं होती। इसमें काम का उद्देश्य समझना, संभावित चुनौतियों का अनुमान लगाना और आवश्यक साधनों को पहले से तैयार रखना भी शामिल है।
मीटिंग में भाग लेने से पहले उसके एजेंडे को समझना, प्रस्तुति से पहले आंकड़ों की जांच करना और किसी परियोजना की शुरुआत से पहले भूमिकाएं स्पष्ट करना अच्छी तैयारी का हिस्सा है। तैयारी मजबूत होने से गलतियां कम होती हैं और कर्मचारियों का आत्मविश्वास बढ़ता है।
क्षमता के साथ काम पूरा करना
तीसरा सूत्र योग्यता और दक्षता के साथ काम पूरा करना है। केवल काम को किसी तरह समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं है। उसकी गुणवत्ता, सटीकता और उपयोगिता भी महत्वपूर्ण होती है। प्रोफेशनल व्यक्ति अपने कौशल को नियमित रूप से बेहतर करता है और नई तकनीक तथा कार्य प्रणालियों को सीखने के लिए तैयार रहता है।
यदि किसी काम के लिए आवश्यक ज्ञान उपलब्ध नहीं हो तो मदद लेने, प्रशिक्षण प्राप्त करने या वरिष्ठ से मार्गदर्शन मांगने में संकोच नहीं करना चाहिए। अपनी कमजोरी छिपाने के बजाय उसे सुधारने का प्रयास बेहतर पेशेवर व्यवहार माना जाता है।
तय समय पर काम सौंपना जरूरी
चौथा सिद्धांत समय पर काम पूरा करना है। समय सीमा केवल कैलेंडर पर लिखी एक तारीख नहीं, बल्कि पूरी टीम की योजना का हिस्सा होती है। एक व्यक्ति की देरी से दूसरे विभागों और ग्राहकों से जुड़े काम प्रभावित हो सकते हैं।
कार्यक्रम में बताया गया कि यदि किसी कारण से काम समय पर पूरा होना संभव नहीं दिख रहा है तो अंतिम समय तक चुप रहने के बजाय संबंधित व्यक्ति को पहले सूचना देनी चाहिए। इससे वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जा सकती है और संगठन को अचानक होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है।
साफ और समय पर संवाद
पांचवां सूत्र स्पष्ट संवाद से संबंधित है। कर्मचारियों को अपनी बात सरल, सम्मानजनक और तथ्यात्मक तरीके से रखनी चाहिए। अधूरी जानकारी, अस्पष्ट संदेश और अनुमान के आधार पर किया गया संवाद गलतफहमी पैदा कर सकता है।
कार्यस्थल पर केवल बोलना ही नहीं, दूसरों की बात ध्यान से सुनना भी संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ईमेल, रिपोर्ट, बैठक और व्यक्तिगत बातचीत में संदेश का उद्देश्य स्पष्ट रहना चाहिए। कठिन परिस्थिति में भी भाषा संयमित रखने से कामकाजी संबंध मजबूत होते हैं।
अपने व्यवहार और फैसलों की जिम्मेदारी
छठा सिद्धांत जिम्मेदारी से व्यवहार करना है। अपनी गलती का दोष दूसरे व्यक्ति, परिस्थिति या संसाधनों पर डालने से समस्या का समाधान नहीं होता। पेशेवर व्यक्ति गलती स्वीकार करता है, उसका कारण समझता है और उसे दोबारा होने से रोकने के उपाय करता है।
जिम्मेदार व्यवहार में संगठन की गोपनीय जानकारी सुरक्षित रखना, नियमों का पालन करना और सहकर्मियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना भी शामिल है।
काम को समग्र रूप से समझना
सातवां सिद्धांत समग्र दृष्टिकोण से काम करना है। प्रत्येक कर्मचारी को यह समझना चाहिए कि उसकी जिम्मेदारी संगठन के बड़े उद्देश्य से कैसे जुड़ी है। केवल अपने हिस्से का काम पूरा कर देना पर्याप्त नहीं होता। उसके परिणाम का ग्राहक, टीम और दूसरे विभागों पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इस पर भी विचार करना चाहिए।
आठवां और अंतिम सूत्र लगातार सुधार करना है। डॉ. अत्रे ने कहा कि सफल पेशेवर प्रतिक्रिया को आलोचना नहीं, बल्कि सीखने के अवसर के रूप में देखते हैं। नियमित आत्ममूल्यांकन, नए कौशल सीखने और पुरानी कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने से व्यक्ति बदलते कार्यस्थल में प्रासंगिक बना रहता है।
कार्यक्रम का प्रमुख संदेश यह रहा कि प्रोफेशनल सफलता किसी एक बड़ी उपलब्धि से नहीं, बल्कि रोजाना अपनाई गई छोटी और अनुशासित आदतों से बनती है। सही प्रतिबद्धता, तैयारी, योग्यता, समयबद्धता, स्पष्ट संवाद, जिम्मेदारी, समग्र दृष्टि और निरंतर सुधार किसी भी व्यक्ति को भरोसेमंद तथा प्रभावी पेशेवर बना सकते हैं।





