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रतलाम | माना जाता है कि महाभारत काल में पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र में रुके थे। तब उन्होंने कंवलका माता की पूजा-अर्चना की थी। तभी से यह स्थान धार्मिक आस्था का केंद्र बना हुआ है। मंदिर की संरचना भी प्राचीन शैली में बनी हुई है, और यह शक्ति उपासना का प्रमुख स्थल माना जाता है।
उल्टा स्वास्तिक बनाने की परंपरा क्यों?
यहां आने वाले भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना के रूप में उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं। यह अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है। कहा जाता है कि जब किसी की इच्छा पूरी हो जाती है, तो वह दोबारा आकर सीधा स्वास्तिक बनाता है। यह परंपरा श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और विश्वास को दर्शाती है।
मंदिर में विशेष आयोजन
नवरात्रि और चैत्र माह में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है।
विशेष पूजा, हवन और माता की आरती के साथ भव्य अनुष्ठान होते हैं।
श्रद्धालु विशेष रूप से नारियल और चुनरी चढ़ाकर माता का आशीर्वाद लेते हैं।
मंदिर परिसर में हर मंगलवार और शुक्रवार को भंडारे का आयोजन किया जाता है।
कैसे पहुंचे कंवलका माता मंदिर?
सड़क मार्ग: रतलाम से इस मंदिर तक आसानी से पहुंचा जा सकता है।
रेल मार्ग: रतलाम रेलवे स्टेशन से यह मंदिर कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा इंदौर में स्थित है, जहां से रतलाम पहुंचने के बाद सड़क मार्ग से मंदिर जाया जा सकता है।
श्रद्धा और आस्था का प्रतीक
कंवलका माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि आस्था और परंपरा का संगम है। यहां हर साल हजारों भक्त अपनी मनोकामना लेकर आते हैं और उल्टा स्वास्तिक बनाकर माता से अपनी इच्छाएं पूर्ण होने की प्रार्थना करते हैं। इच्छाएं पूरी होने के बाद वे वापस आकर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं, जिससे उनकी आस्था और बढ़ जाती है।





