मध्य प्रदेश

MP में 44.35 करोड़ की फर्नीचर खरीदी पर सवाल, टेंडर में गड़बड़ी के आरोप

Kavita2
18 Oct 2026 10:47 AM IST
MP में 44.35 करोड़ की फर्नीचर खरीदी पर सवाल, टेंडर में गड़बड़ी के आरोप
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भोपाल। मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों के लिए फर्नीचर खरीदने की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। राज्य शिक्षा केंद्र (RSK) द्वारा तीन निजी कंपनियों को लगभग 44.35 करोड़ रुपये के फर्नीचर का सीधे ऑर्डर दिए जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि इस खरीद में निर्धारित निविदा प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जबकि मध्य प्रदेश लघु उद्योग निगम (MPLUN) अधिकृत खरीद एजेंसी के रूप में मौजूद था। सरकारी माध्यमिक विद्यालयों के लिए लगभग 200 करोड़ रुपये के फर्नीचर की खरीद की गई थी। इसमें करीब 150 करोड़ रुपये की खरीद एमपीएलयूएन के माध्यम से हुई, जबकि शेष खरीद राज्य शिक्षा केंद्र ने सीधे की। दस्तावेजों में डेस्क-बेंच की संख्या को लेकर विसंगतियां भी सामने आई हैं। मामला सामने आने के बाद खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता और वित्तीय नियमों के पालन पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

200 करोड़ की फर्नीचर खरीदी में 44.35 करोड़ के ऑर्डर पर विवाद

जानकारी के अनुसार, मध्य प्रदेश के सरकारी माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों के बैठने की व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए करीब 200 करोड़ रुपये के फर्नीचर की खरीद की गई थी।

इस खरीद का बड़ा हिस्सा मध्य प्रदेश लघु उद्योग निगम के माध्यम से पूरा किया गया। लगभग 150 करोड़ रुपये की खरीद अधिकृत एजेंसी के जरिए की गई, लेकिन शेष खरीद राज्य शिक्षा केंद्र ने सीधे निजी कंपनियों को आदेश देकर की।

इनमें 44.35 करोड़ रुपये के ऑर्डर विशेष रूप से सवालों के घेरे में हैं। आरोप है कि राज्य शिक्षा केंद्र ने एमपीएलयूएन के मौजूदा टेंडर का उपयोग करते हुए तीन कंपनियों को सीधे आपूर्ति आदेश जारी कर दिए।

अब यह सवाल उठ रहा है कि जब खरीद के लिए अधिकृत एजेंसी मौजूद थी, तो राज्य शिक्षा केंद्र ने अलग से खरीद आदेश जारी करने के लिए किस प्रक्रिया और अनुमति का उपयोग किया।

तीन कंपनियों को मिला 51,744 डेस्क-बेंच का ऑर्डर

उपलब्ध खरीद दस्तावेजों के अनुसार, राज्य शिक्षा केंद्र ने तीन कंपनियों को कुल 51,744 डेस्क-बेंच सेट की आपूर्ति का आदेश दिया था।

इन कंपनियों में श्री वैष्णव इंडस्ट्रीज, इंप्रेशन फर्नीचर इंडस्ट्रीज प्राइवेट लिमिटेड और मेथोडस्क सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं।

आदेशों के अनुसार कंपनियों को निम्नलिखित मात्रा में फर्नीचर की आपूर्ति करनी थी।

कंपनी डेस्क-बेंच सेट मूल कीमत

श्री वैष्णव इंडस्ट्रीज 20,698 ₹15.03 करोड़

इंप्रेशन फर्नीचर इंडस्ट्रीज 15,523 ₹11.28 करोड़

मेथोडस्क सिस्टम्स 15,523 ₹11.28 करोड़

कुल 51,744 ₹37.59 करोड़

इन सभी ऑर्डर का कुल मूल्य 18 प्रतिशत जीएसटी जोड़ने के बाद लगभग 44.35 करोड़ रुपये हो गया।

एक डेस्क-बेंच सेट की कीमत 7,265 रुपये

राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा जारी आदेशों में प्रति डेस्क-बेंच सेट की मूल कीमत 7,265 रुपये निर्धारित की गई थी।

इस पर 18 प्रतिशत जीएसटी जोड़ने के बाद एक सेट की कीमत लगभग 8,573 रुपये हो गई।

कुल 51,744 सेट की मूल कीमत 37 करोड़ 59 लाख 20 हजार 160 रुपये थी। जीएसटी जोड़ने के बाद कुल ऑर्डर मूल्य 44 करोड़ 35 लाख 85 हजार 788 रुपये 80 पैसे हो गया।

खरीद के लिए राज्य स्तरीय क्रय समिति ने 8 अगस्त 2024 को आयोजित बैठक में निर्णय लिया था। इसके अगले दिन 9 अगस्त को तीनों कंपनियों को ऑनलाइन ऑर्डर जारी किए गए।

महज दो मिनट में जारी हुए तीन कंपनियों के ऑर्डर

खरीद दस्तावेजों में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है।

तीनों कंपनियों के ऑर्डर 9 अगस्त 2024 को दोपहर 1 बजकर 19 मिनट से 1 बजकर 21 मिनट के बीच एमपीएलयूएन पोर्टल के माध्यम से जारी किए गए थे।

इस दौरान मेथोडस्क सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपना मूल ऑनलाइन ऑर्डर स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद राज्य शिक्षा केंद्र ने पुराना ऑर्डर निरस्त कर 10 अगस्त 2024 को उसी कंपनी को दोबारा आदेश जारी कर दिया।

नए आदेश में डेस्क-बेंच की संख्या 15,523 और निर्धारित कीमत पहले जैसी ही रखी गई।

इस घटनाक्रम से ऑर्डर जारी करने और उन्हें स्वीकार करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे हैं।

खरीद दस्तावेजों में डेस्क-बेंच की संख्या अलग-अलग

इस फर्नीचर खरीद में दस्तावेजों के बीच विसंगतियां भी सामने आई हैं।

संयुक्त खरीद विवरण के अनुसार, श्री वैष्णव इंडस्ट्रीज को 20,698 डेस्क-बेंच सेट का आदेश दिया गया था। लेकिन कंपनी को जारी व्यक्तिगत पत्र में 20,898 सेट का उल्लेख किया गया।

इसी तरह इंप्रेशन फर्नीचर इंडस्ट्रीज को संयुक्त विवरण में 15,523 सेट आवंटित किए गए, जबकि कंपनी के व्यक्तिगत पत्र में 15,623 सेट दर्ज हैं।

इस प्रकार एक कंपनी के दस्तावेज में 200 और दूसरी कंपनी के दस्तावेज में 100 सेट का अंतर दिखाई देता है।

ये विसंगतियां खरीद रिकॉर्ड की सटीकता पर सवाल उठाती हैं। हालांकि, दस्तावेजों में अंतर होने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि अधिक भुगतान किया गया या अतिरिक्त फर्नीचर की आपूर्ति हुई।

इसके लिए वास्तविक आपूर्ति, स्वीकृति और भुगतान रिकॉर्ड का मिलान आवश्यक होगा।

वित्त नियंत्रक ने रोकी भुगतान की फाइल

मामले में भुगतान प्रक्रिया को लेकर भी विवाद सामने आया है।

रिपोर्ट के अनुसार, राज्य शिक्षा केंद्र के वित्त नियंत्रक संतोष सोनकिया ने संबंधित भुगतान की फाइल रोक रखी है।

बताया जा रहा है कि राज्य शिक्षा केंद्र के निदेशक की ओर से बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद भुगतान की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ाई गई।

फाइल लंबित रहने के कारण कंपनियों को भुगतान में देरी होने की बात सामने आई है।

हालांकि, वित्त नियंत्रक ने भुगतान किन विशिष्ट कारणों से रोका है, इसका विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं है।

सरकारी खरीद नियमों के पालन पर सवाल

मध्य प्रदेश भंडार क्रय एवं सेवा उपार्जन नियमों के तहत सरकारी विभागों को निर्धारित खरीद प्रक्रिया का पालन करना होता है।

खरीद की राशि और प्रकृति के आधार पर निविदा प्रक्रिया, प्रतिस्पर्धा तथा अन्य वैधानिक शर्तें लागू होती हैं।

इस मामले में प्रमुख सवाल यह है कि एमपीएलयूएन के मौजूदा टेंडर के अंतर्गत राज्य शिक्षा केंद्र को सीधे निजी कंपनियों को खरीद आदेश जारी करने की अनुमति थी या नहीं।

इसका अंतिम निर्धारण संबंधित टेंडर की शर्तों, सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति और लागू खरीद नियमों की जांच से ही हो सकता है।

अधिकारियों ने छुट्टियों के बाद जानकारी देने की बात कही

फर्नीचर खरीद से जुड़े सवालों पर राज्य शिक्षा केंद्र के निदेशक हरजिंदर सिंह से संपर्क किए जाने पर उन्होंने अतिरिक्त निदेशक अरुण सिंह द्वारा जानकारी उपलब्ध कराने की बात कही।

वहीं अतिरिक्त निदेशक अरुण सिंह ने बताया कि वे छुट्टियों के बाद टेंडर से संबंधित दस्तावेजों की जानकारी प्राप्त कर विस्तृत विवरण दे सकेंगे।

फिलहाल संबंधित तीनों कंपनियों का विस्तृत पक्ष सामने नहीं आया है। किसी जांच एजेंसी द्वारा भ्रष्टाचार या आर्थिक अनियमितता सिद्ध किए जाने की भी पुष्टि नहीं हुई है।

निष्पक्ष जांच से स्पष्ट होगी खरीद प्रक्रिया

सरकारी विद्यालयों के लिए फर्नीचर खरीद का उद्देश्य विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षणिक सुविधाएं उपलब्ध कराना है। ऐसे में सार्वजनिक धन से होने वाली खरीद में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन का पालन महत्वपूर्ण है।

44.35 करोड़ रुपये के ऑर्डर, दस्तावेजों में संख्या का अंतर और भुगतान फाइल लंबित रहने जैसी परिस्थितियों ने खरीद प्रक्रिया पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

अब यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि खरीद आदेश लागू नियमों के अनुरूप जारी किए गए थे या नहीं और सभी कंपनियों को वास्तविक आपूर्ति के आधार पर ही भुगतान किया जा रहा है या नहीं।

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