मध्य प्रदेश

फार्मा कंपनियों ने उठाई आवाज, जटिल नियमों से निर्यात प्रभावित

Kavita2
4 Nov 2026 10:49 AM IST
फार्मा कंपनियों ने उठाई आवाज, जटिल नियमों से निर्यात प्रभावित
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इंदौर। भारतीय दवा उद्योग को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने और फार्मास्युटिकल निर्यात को बढ़ावा देने के लिए उद्योग जगत ने सरकारी नियमों में सुधार की मांग उठाई है। दवा निर्यातकों का कहना है कि जटिल नियामक प्रक्रियाएं, अत्यधिक दस्तावेजीकरण और अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) प्राप्त करने में लगने वाला समय विदेशी व्यापार के विस्तार में बड़ी बाधा बन रहा है। निर्यातकों ने केंद्र और राज्य स्तर के संबंधित अधिकारियों से प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा जरूरी अनुमतियों के निपटारे में तेजी लाने की मांग की है।

ये मुद्दे इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में आयोजित फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) के ‘चिंतन शिविर 2026’ में उठाए गए। इस महत्वपूर्ण आयोजन में मध्य प्रदेश, दिल्ली और गुजरात से 100 से अधिक प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम में फार्मास्युटिकल उद्योग से जुड़े उद्यमियों के साथ केंद्रीय और राज्य औषधि नियामक संस्थाओं, नारकोटिक्स नियंत्रण से संबंधित विभागों और निर्यात नियामक निकायों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

बैठक के दौरान दवा निर्माताओं और निर्यातकों ने अपनी समस्याएं संबंधित अधिकारियों के सामने रखीं। उनका कहना था कि भारतीय दवाओं की गुणवत्ता, प्रतिस्पर्धी कीमतों और बेहतर सेवाओं के कारण विदेशों में लगातार मांग बनी हुई है। इसके बावजूद कई कंपनियों को निर्यात संबंधी मंजूरी प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इससे अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को समय पर दवाओं की आपूर्ति करने में परेशानी होती है।

उद्योग प्रतिनिधियों ने बताया कि दवाओं के निर्यात से जुड़ी विभिन्न प्रक्रियाओं में कई तरह के दस्तावेज जमा करने पड़ते हैं। कुछ मामलों में अलग-अलग विभागों से अनुमति प्राप्त करना आवश्यक होता है। इससे निर्यात की प्रक्रिया लंबी हो जाती है। निर्यातकों का कहना है कि इन प्रक्रियाओं को अधिक स्पष्ट और समयबद्ध बनाया जाए तो कंपनियां विदेशी बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकती हैं।

बैठक में विशेष रूप से एनओसी प्राप्त करने की प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया गया। दवा निर्यातकों के अनुसार, अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी होने में देरी से निर्यात खेपों की समय पर आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में खरीदार निर्धारित समय-सीमा के भीतर माल प्राप्त करना चाहते हैं। यदि दस्तावेजी प्रक्रियाओं के कारण देरी होती है तो भारतीय कंपनियों को व्यापारिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।

प्रतिनिधियों ने अधिकारियों के सामने यह चिंता भी जताई कि समय-समय पर सामने आने वाली नई नियामक आवश्यकताओं को पूरा करना छोटे और मध्यम स्तर की दवा कंपनियों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है। बड़ी कंपनियों के पास अनुपालन संबंधी प्रक्रियाओं को संभालने के लिए अलग टीमें होती हैं, लेकिन सीमित संसाधनों वाले उद्यमों को अतिरिक्त समय और खर्च उठाना पड़ता है।

उद्योग जगत ने इस बात पर जोर दिया कि निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नियामक व्यवस्था प्रभावी होने के साथ व्यावहारिक भी होनी चाहिए। दवाओं की गुणवत्ता और सुरक्षा से समझौता किए बिना अनावश्यक प्रक्रियाओं को कम करना जरूरी बताया गया। प्रतिनिधियों का मानना है कि स्पष्ट दिशानिर्देश और समयबद्ध मंजूरी की व्यवस्था से निर्यातकों को बड़ी राहत मिल सकती है।

कार्यक्रम में विदेशी बाजारों तक पहुंच बढ़ाने के उपायों पर भी चर्चा की गई। भारतीय दवा उद्योग लंबे समय से कई देशों में किफायती दवाओं की आपूर्ति करता रहा है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़ी बाधाओं को कम करना उद्योग के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फार्मेक्सिल ने अपने आयोजन संबंधी विवरण में स्पष्ट किया था कि चिंतन शिविर का उद्देश्य दवा निर्यातकों और नीति निर्माताओं के बीच सीधा संवाद स्थापित करना है। इसके अंतर्गत बाजार तक पहुंच, नियामक व्यवस्थाओं में तालमेल, व्यापारिक बाधाओं, मुक्त व्यापार समझौतों और निर्यात संवर्धन से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया जाना था।

बैठक में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ), औषधि नियामक संस्थाओं और नारकोटिक्स नियंत्रण से जुड़े प्रावधानों के महत्व पर भी ध्यान केंद्रित किया गया। फार्मास्युटिकल उत्पादों के निर्यात में विभिन्न प्रकार की दवाओं और नियंत्रित पदार्थों के लिए अलग-अलग नियम लागू हो सकते हैं। इन नियमों का पालन करना कंपनियों के लिए आवश्यक है, लेकिन उद्योग जगत चाहता है कि संबंधित प्रक्रियाएं अधिक सुविधाजनक बनाई जाएं।

कार्यक्रम में विदेश व्यापार से संबंधित नीतियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। दवा निर्यातकों के लिए अन्य देशों के नियमों, गुणवत्ता मानकों और व्यापारिक शर्तों को पूरा करना आवश्यक होता है। इसलिए उद्योग और नियामक संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय से निर्यात संबंधी समस्याओं के समाधान में मदद मिल सकती है।

उद्योग प्रतिनिधियों के अनुसार, भारत में दवा निर्माण की व्यापक क्षमता मौजूद है। देश में अनेक कंपनियां घरेलू जरूरतों के साथ विदेशी बाजारों के लिए भी दवाओं का उत्पादन करती हैं। वैश्विक मांग का लाभ उठाने के लिए इन कंपनियों को समय पर अनुमति, स्पष्ट नीतियां और सुव्यवस्थित निर्यात प्रक्रियाएं उपलब्ध होना आवश्यक है।

मध्य प्रदेश, दिल्ली और गुजरात के प्रतिनिधियों की भागीदारी ने इस बैठक को विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों की समस्याओं को सामने रखने का अवसर दिया। अलग-अलग राज्यों में कार्यरत कंपनियों के अनुभवों से निर्यात संबंधी चुनौतियों की व्यापक तस्वीर सामने आई।

फार्मास्युटिकल उद्योग से जुड़े लोगों का मानना है कि यदि दस्तावेजीकरण की प्रक्रिया को सरल बनाया जाए और एनओसी जारी करने में अनावश्यक देरी कम हो, तो निर्यात कारोबार को लाभ मिल सकता है। इससे विशेष रूप से उन कंपनियों को मदद मिलेगी जो नए विदेशी बाजारों में प्रवेश करने की योजना बना रही हैं।

फिलहाल उद्योग जगत की प्रमुख मांग यही है कि निर्यात संबंधी नियामक प्रक्रियाओं में सुधार किया जाए। ‘चिंतन शिविर 2026’ में उठाए गए मुद्दों ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय दवाओं की वैश्विक मांग के साथ व्यापार की प्रक्रियाओं को सुगम बनाना भी आवश्यक है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित विभाग उद्योग की मांगों पर आगे क्या कदम उठाते हैं।

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