मध्य प्रदेश

नदियों में दूध बहाने पर NGT का रोक से इनकार, धार्मिक आस्था का दिया हवाला

Saba Naaz
22 July 2026 10:06 PM IST
नदियों में दूध बहाने पर NGT का रोक से इनकार, धार्मिक आस्था का दिया हवाला
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भोपाल। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की भोपाल स्थित केंद्रीय पीठ ने नर्मदा नदी में धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान दूध अर्पित करने पर प्रतिबंध लगाने से इनकार कर दिया है। न्यायाधिकरण ने कहा कि वर्तमान में ऐसा कोई कानून मौजूद नहीं है, जिसके तहत नदी में दूध चढ़ाने की धार्मिक परंपरा पर रोक लगाई जा सके। हालांकि, NGT ने यह भी स्पष्ट किया कि आस्था के नाम पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता और बड़े आयोजनों के दौरान पर्यावरणीय निगरानी जरूरी है।

यह मामला सीहोर जिले के सातदेव क्षेत्र में आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम से जुड़ा है। बताया गया कि नौ अप्रैल को यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद टैंकरों से लाया गया करीब 11 हजार लीटर दूध नर्मदा नदी में अर्पित किया गया था। इस घटना को लेकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका जताते हुए सिद्धार्थ सिंह राजपूत ने NGT में याचिका दाखिल की थी।

याचिका में मांग की गई थी कि नदियों में बड़ी मात्रा में दूध प्रवाहित करने जैसी गतिविधियों पर रोक लगाई जाए, क्योंकि इससे जल प्रदूषण बढ़ सकता है। मामले की जांच के लिए मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPPCB) की अगुवाई में एक समिति गठित की गई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट NGT के सामने पेश की।

रिपोर्ट में बताया गया कि नर्मदा नदी में लगातार जल प्रवाह, अधिक जल मात्रा और प्राकृतिक आत्मशुद्धिकरण क्षमता होने के कारण उपलब्ध वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर इस घटना से नदी के पानी की गुणवत्ता पर कोई बड़ा प्रतिकूल प्रभाव साबित नहीं हुआ है। हालांकि समिति ने यह भी माना कि किसी भी जल स्रोत में बड़ी मात्रा में दूध सीधे प्रवाहित करना पर्यावरणीय दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

NGT ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा कोई कानूनी प्रावधान पेश नहीं कर सके, जिसके आधार पर धार्मिक अनुष्ठानों में दूध अर्पित करने पर प्रतिबंध लगाया जा सके। न्यायाधिकरण ने कहा कि धार्मिक परंपराओं और आस्था से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए स्पष्ट कानूनी आधार होना जरूरी है।

ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि नदी किनारे धार्मिक आयोजनों के लिए बनाई गई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) केवल प्रशासनिक अनुमति और पर्यावरण प्रबंधन से संबंधित है। इसमें दूध अर्पित करने जैसी धार्मिक गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगाने का कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए केवल पर्यावरणीय आशंका के आधार पर धार्मिक परंपरा को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।

हालांकि, NGT ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपनी चिंता भी जाहिर की। न्यायाधिकरण ने कहा कि अगर किसी नदी में जल प्रवाह कम हो या पानी लंबे समय तक ठहरा हुआ हो, तो बड़ी मात्रा में दूध डालने से जल प्रदूषण की संभावना बढ़ सकती है। इसलिए बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान प्रशासन और संबंधित विभागों को विशेष सतर्कता बरतनी चाहिए।

NGT ने मामले का निपटारा करते हुए मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिया कि भविष्य में नर्मदा नदी के किनारे होने वाले बड़े धार्मिक आयोजनों के दौरान पर्यावरणीय निगरानी व्यवस्था मजबूत की जाए। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि धार्मिक आयोजन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना संपन्न हों।

इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि NGT ने धार्मिक आस्था से जुड़ी परंपराओं पर सीधी रोक लगाने से इनकार किया है, लेकिन साथ ही पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी भी तय की है। न्यायाधिकरण का कहना है कि आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना जरूरी है, ताकि धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी हो और नदियों की स्वच्छता भी बनी रहे।

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