मध्य प्रदेश

MP हाई कोर्ट: रिश्ते की स्थिति से नहीं छीना जा सकता भरण-पोषण हक

Saba Naaz
10 July 2026 7:43 PM IST
MP हाई कोर्ट: रिश्ते की स्थिति से नहीं छीना जा सकता भरण-पोषण हक
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जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि किसी महिला के भरण-पोषण के अधिकार को केवल विवाह की तकनीकी वैधता के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि कोई महिला लंबे समय तक किसी पुरुष के साथ पत्नी की तरह रही हो और उनके संबंध से संतान का जन्म हुआ हो, तो उसके दावे पर मानवीय और सामाजिक दृष्टिकोण से विचार किया जाना चाहिए।

जस्टिस द्वारकाधीश बंसल की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ उमरिया फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें महिला के भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने मामले में नए सिरे से सुनवाई करने के निर्देश दिए हैं।

पत्नी की परिभाषा केवल कानूनी विवाह तक सीमित नहीं

हाई कोर्ट ने कहा कि ‘पत्नी’ शब्द की व्याख्या केवल विवाह की तकनीकी वैधता तक सीमित नहीं की जा सकती। यदि कोई महिला और पुरुष लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हैं और उनके बीच पारिवारिक संबंध स्थापित हुए हैं, तो ऐसे मामलों में महिला के अधिकारों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि संबंध से जन्मी संतान की मौजूदगी इस बात का महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे भरण-पोषण के मामले में ध्यान में रखा जाना चाहिए।

फैमिली कोर्ट ने खारिज कर दिया था दावा

यह मामला रामकली कुशवाहा से जुड़ा है। उन्होंने उमरिया फैमिली कोर्ट के 25 जून 2019 के आदेश को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर की थी।

फैमिली कोर्ट ने महिला को विधिक पत्नी मानने से इनकार करते हुए उसके भरण-पोषण के दावे को खारिज कर दिया था। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों की नाबालिग बेटी के लिए प्रतिमाह दो हजार रुपये भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।

महिला ने हाई कोर्ट में तर्क दिया कि वह लंबे समय तक संबंधित पुरुष के साथ पत्नी की तरह रही और दोनों की एक संतान भी है। ऐसे में केवल विवाह की वैधानिक स्थिति के आधार पर उसे भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2025 के एक निर्णय का भी हवाला दिया। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण से जुड़े मामलों में कानून की व्याख्या करते समय सामाजिक वास्तविकताओं और महिलाओं की स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्मी संतानों के अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए।

नए सिरे से होगी सुनवाई

हाई कोर्ट ने उमरिया फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए निर्देश दिया कि महिला के भरण-पोषण संबंधी आवेदन पर दोबारा सुनवाई की जाए। अदालत ने कहा कि मामले में सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाए।

इस फैसले को महिलाओं के भरण-पोषण अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह आदेश उन मामलों में मार्गदर्शक साबित हो सकता है, जहां संबंधों की कानूनी स्थिति को लेकर विवाद होता है।

महिला और बच्चों के अधिकारों पर जोर

अदालत के इस फैसले से यह संदेश गया है कि भरण-पोषण के मामलों में केवल दस्तावेजी विवाह ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता। लंबे समय तक चले संबंध, पारिवारिक जिम्मेदारियां और संतान का हित भी महत्वपूर्ण माने जाएंगे।

हाई कोर्ट की इस टिप्पणी से ऐसे मामलों में महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को लेकर न्यायिक दृष्टिकोण और स्पष्ट हुआ है।

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