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MP : नामांकन और शिक्षक-छात्र अनुपात के बावजूद उच्च कक्षाओं में बढ़ी ड्रॉपआउट दर

Madhya Pradesh मध्य प्रदेश : मध्य प्रदेश में स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए सरकार लगातार विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही है। मुफ्त पाठ्यपुस्तकें, यूनिफॉर्म, साइकिल, लैपटॉप, स्कॉलरशिप और ‘स्कूल चलें हम’ जैसे अभियान के जरिए बच्चों को विद्यालयों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बावजूद शिक्षा व्यवस्था के सामने एक बड़ी चुनौती उभरकर सामने आई है। UDISE+ 2025-26 की ताजा रिपोर्ट के अनुसार राज्य में प्राथमिक स्तर पर नामांकन और शिक्षक-छात्र अनुपात संतोषजनक होने के बावजूद उच्च कक्षाओं में पहुंचते-पहुंचते बड़ी संख्या में विद्यार्थी पढ़ाई छोड़ रहे हैं।
रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में शिक्षा तक पहुंच तो बेहतर हुई है, लेकिन छात्रों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक बनाए रखना अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल विद्यालय में प्रवेश दिलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि छात्रों को अंतिम कक्षा तक शिक्षा से जोड़े रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
1.52 करोड़ छात्र और करीब 1.20 लाख स्कूल
UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में लगभग 1.52 करोड़ विद्यार्थी विभिन्न सरकारी और निजी विद्यालयों में अध्ययनरत हैं। राज्य में कुल 1,19,694 विद्यालय संचालित हो रहे हैं। यह संख्या दर्शाती है कि प्रदेश में स्कूली शिक्षा का नेटवर्क व्यापक है और बड़ी आबादी तक शिक्षा की पहुंच बनी हुई है।
शिक्षक-छात्र अनुपात राष्ट्रीय मानक से बेहतर
रिपोर्ट का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि राज्य में औसतन 21 विद्यार्थियों पर एक शिक्षक उपलब्ध है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुसार आदर्श शिक्षक-छात्र अनुपात 30:1 माना गया है। इस दृष्टि से मध्य प्रदेश का प्रदर्शन राष्ट्रीय मानक से बेहतर है।
कम शिक्षक-छात्र अनुपात का अर्थ है कि प्रत्येक शिक्षक विद्यार्थियों पर अधिक प्रभावी ढंग से ध्यान दे सकता है। इससे गुणवत्तापूर्ण शिक्षण की संभावना बढ़ती है और छात्रों को व्यक्तिगत मार्गदर्शन भी मिल सकता है।
फिर भी बढ़ रही है ड्रॉपआउट की समस्या
बेहतर शिक्षक उपलब्धता और सरकारी योजनाओं के बावजूद रिपोर्ट में सबसे अधिक चिंता का विषय उच्च कक्षाओं में बढ़ती ड्रॉपआउट दर को बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्तर पर स्कूलों में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों में से लगभग आधे छात्र-छात्राएं उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते पढ़ाई छोड़ देते हैं।
यह स्थिति बताती है कि विद्यालयों में प्रवेश बढ़ाने के प्रयास सफल रहे हैं, लेकिन विद्यार्थियों को लगातार शिक्षा से जोड़े रखना अभी भी चुनौती बना हुआ है।
सरकार की कई योजनाएं हैं लागू
राज्य सरकार वर्षों से विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं चला रही है। इनमें ‘स्कूल चलें हम’ अभियान, निशुल्क पाठ्यपुस्तकों का वितरण, यूनिफॉर्म, साइकिल, लैपटॉप, स्कूटर और विभिन्न छात्रवृत्ति योजनाएं शामिल हैं।
इन योजनाओं का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ना और स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति को कम करना है। हालांकि रिपोर्ट संकेत देती है कि केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है और ड्रॉपआउट के पीछे अन्य सामाजिक एवं पारिवारिक कारण भी हो सकते हैं।
ड्रॉपआउट के संभावित कारण
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों के स्कूल छोड़ने के कई कारण हो सकते हैं। इनमें आर्थिक दबाव, परिवार की जिम्मेदारियां, ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों की दूरी, किशोरावस्था में पढ़ाई छोड़कर रोजगार की ओर रुझान, बाल विवाह जैसी सामाजिक समस्याएं तथा उच्च कक्षाओं में पढ़ाई का बढ़ता शैक्षणिक दबाव शामिल हो सकते हैं।
विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में कई विद्यार्थियों को उच्च कक्षाओं के लिए दूसरे गांव या कस्बे में जाना पड़ता है, जिससे भी पढ़ाई बीच में छोड़ने की संभावना बढ़ जाती है।
गुणवत्ता पर भी देना होगा ध्यान
विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल नामांकन बढ़ाने की बजाय शिक्षा की गुणवत्ता, करियर मार्गदर्शन, परामर्श सेवाओं और विद्यालयों में बेहतर सीखने के वातावरण पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और भविष्य के बेहतर अवसर दिखाई देंगे, तो उनके स्कूल छोड़ने की संभावना कम होगी।
नीति निर्माण में मिलेगी मदद
UDISE+ रिपोर्ट देशभर की स्कूली शिक्षा से जुड़े आंकड़ों का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है। इसके माध्यम से सरकारें शिक्षा संबंधी योजनाओं की समीक्षा करती हैं और नई नीतियां तैयार करती हैं। मध्य प्रदेश के लिए यह रिपोर्ट संकेत देती है कि प्राथमिक स्तर पर उपलब्धियां हासिल होने के बावजूद माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा में छात्रों को बनाए रखने के लिए अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता है।
आगे की चुनौती
शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि यदि ड्रॉपआउट दर को नियंत्रित नहीं किया गया तो इसका असर राज्य की उच्च शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों पर भी पड़ सकता है। इसलिए आने वाले समय में सरकार को उन कारणों की पहचान करनी होगी जिनकी वजह से विद्यार्थी बीच में पढ़ाई छोड़ रहे हैं।
कुल मिलाकर UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की दो तस्वीरें सामने लाती है। एक ओर राज्य में बेहतर नामांकन, व्यापक विद्यालय नेटवर्क और राष्ट्रीय मानकों से बेहतर शिक्षक-छात्र अनुपात जैसी सकारात्मक उपलब्धियां हैं, वहीं दूसरी ओर उच्च कक्षाओं में बढ़ती ड्रॉपआउट दर शिक्षा व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समस्या पर समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए, तो राज्य स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में और बेहतर प्रदर्शन कर सकता





