मध्य प्रदेश

Indore लॉ स्टूडेंट को हाई कोर्ट से राहत, फर्स्ट ईयर एग्जाम में बैठने की अनुमति

Kavita2
9 Jun 2026 9:51 AM IST
Indore लॉ स्टूडेंट को हाई कोर्ट से राहत, फर्स्ट ईयर एग्जाम में बैठने की अनुमति
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Madhya Pradesh मध्य प्रदेश : इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ को झटका देते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने बीए एलएलबी (ऑनर्स) की फर्स्ट ईयर स्टूडेंट ट्वारिता हरने को अंतरिम राहत देते हुए उसे 10 जून से शुरू होने वाली आगामी सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की अनुमति दे दी है। यह आदेश कॉलेज प्रशासन के उस निर्णय के खिलाफ आया है जिसमें छात्रा को परीक्षा फॉर्म भरने और परीक्षा में शामिल होने से रोका गया था।

यह मामला जस्टिस आलोक अवस्थी की कोर्ट में सोमवार को सुनवाई के लिए आया, जहां छात्रा द्वारा दाखिल की गई रिट पिटीशन पर विचार किया गया। पिटीशन में आरोप लगाया गया था कि कॉलेज प्रशासन ने मनमाने ढंग से उसे परीक्षा फॉर्म जमा करने से रोका, जिसके कारण वह अपने अकादमिक मूल्यांकन प्रक्रिया से वंचित रह गई।

छात्रा के अनुसार, कॉलेज के इस फैसले के चलते वह न केवल 2 जून को आयोजित कॉम्प्रिहेंसिव वाइवा वॉइस और प्रैक्टिकल परीक्षा में शामिल नहीं हो सकी, बल्कि 10 जून से शुरू होने वाले दूसरे सेमेस्टर के थ्योरी एग्जाम में भी बैठने से उसे रोक दिया गया। इस कारण उसके शैक्षणिक भविष्य पर गंभीर असर पड़ने की आशंका जताई गई थी।

मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने कॉलेज के निर्णय पर रोक लगाते हुए छात्रा को अस्थायी राहत प्रदान की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि छात्रा को आगामी परीक्षा में बैठने से वंचित नहीं किया जा सकता और उसे समान अवसर मिलना चाहिए।

इसके साथ ही कोर्ट ने इंदौर इंस्टीट्यूट ऑफ लॉ को निर्देश दिया कि वह छात्रा के लिए 10 दिनों के भीतर एक विशेष वाइवा परीक्षा आयोजित करे। यह निर्देश इस उद्देश्य से दिया गया है कि छात्रा का शैक्षणिक मूल्यांकन पूरा हो सके और उसे किसी प्रकार का शैक्षणिक नुकसान न हो।

कोर्ट ने यह भी माना कि प्रारंभिक स्तर पर छात्रा के आरोपों में गंभीरता दिखाई देती है और ऐसे मामलों में संस्थानों को पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखनी चाहिए।

पिटीशन में यह भी कहा गया था कि कॉलेज प्रशासन का निर्णय एकतरफा और मनमाना था, जिससे छात्रा को अपने अधिकारों से वंचित किया गया। अदालत ने फिलहाल इस आधार पर अंतरिम राहत देते हुए मामले की आगे विस्तृत सुनवाई की संभावना जताई है।

इस फैसले के बाद छात्रा पक्ष को बड़ी राहत मिली है, जबकि कॉलेज प्रशासन को कोर्ट के आदेश का पालन करना अनिवार्य होगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला शैक्षणिक संस्थानों में प्रक्रिया की पारदर्शिता और छात्रों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों को एक बार फिर सामने लाता है।

कुल मिलाकर, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का यह आदेश न केवल एक छात्रा को तत्काल राहत देता है, बल्कि शैक्षणिक संस्थानों को यह संदेश भी देता है कि किसी भी छात्र को बिना उचित प्रक्रिया के परीक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

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