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IIM इंदौर स्टडी: सोशल मीडिया उपयोग से पढ़ाई पर असर का खुलासा

Madhya Pradesh मध्य प्रदेश : इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (IIM) इंदौर के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक नई स्टडी ने सोशल मीडिया के उपयोग और छात्रों के शैक्षणिक प्रदर्शन के बीच जटिल संबंध को उजागर किया है। यह अध्ययन इस आम धारणा को चुनौती देता है कि फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल छात्रों के लिए हानिकारक हैं।
यह शोध प्रतिष्ठित “जर्नल ऑफ ग्लोबल इंफॉर्मेशन मैनेजमेंट” में प्रकाशित हुआ है, जिसका नेतृत्व शोधकर्ता प्रशांत सलवान ने किया है। अध्ययन में भारत और रूस जैसे विकासशील देशों के विश्वविद्यालय छात्रों की ऑनलाइन मीडिया आदतों और उनके शैक्षणिक परिणामों का विश्लेषण किया गया है। इसमें यह देखा गया कि सोशल मीडिया का उपयोग उनके ग्रेड, संचार शैली और विश्वविद्यालय जीवन में उनकी भागीदारी को कैसे प्रभावित करता है।
इस शोध में दोनों देशों के 470 से अधिक विश्वविद्यालय छात्रों का सर्वे किया गया। निष्कर्षों के अनुसार, अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग का छात्रों की पढ़ाई पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही यह पाया गया कि ज्यादा ऑनलाइन एक्टिविटी के कारण आमने-सामने बातचीत में भी कमी आती है, जिससे सामाजिक और शैक्षणिक जुड़ाव प्रभावित होता है।
स्टडी में “टाइम डिस्प्लेसमेंट थ्योरी” का उपयोग किया गया है, जिसके अनुसार किसी एक गतिविधि पर खर्च किया गया समय दूसरी गतिविधियों के समय को कम कर देता है। इस सिद्धांत के आधार पर शोध ने यह पुष्टि की कि अत्यधिक ऑनलाइन एंगेजमेंट पढ़ाई और व्यक्तिगत बातचीत दोनों में बाधा उत्पन्न कर सकता है।
हालांकि, शोध में यह भी स्पष्ट किया गया है कि स्थिति पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। स्टडी में दो महत्वपूर्ण कारकों की पहचान की गई है, जो सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव को कम कर सकते हैं। इनमें छात्रों की मल्टीटास्किंग क्षमता और उनके विश्वविद्यालय अनुभव में रुचि का स्तर शामिल है। जिन छात्रों में मल्टीटास्किंग की बेहतर क्षमता होती है और जो अपने कैंपस जीवन में अधिक सक्रिय रहते हैं, वे सोशल मीडिया के प्रभाव को बेहतर तरीके से संतुलित कर पाते हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि सोशल मीडिया को पूरी तरह नकारात्मक रूप में देखना सही नहीं है, बल्कि इसके उपयोग के तरीके और समय प्रबंधन पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है। सही संतुलन के साथ सोशल मीडिया छात्रों के लिए सूचना, नेटवर्किंग और सीखने का एक उपयोगी माध्यम भी बन सकता है।
यह अध्ययन शिक्षा जगत के लिए महत्वपूर्ण संकेत देता है कि डिजिटल युग में छात्रों के व्यवहार को समझने के लिए पारंपरिक दृष्टिकोण के साथ नए तकनीकी पहलुओं को भी शामिल करना जरूरी है।





