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35 साल बाद भी सड़क का इंतजार बरगी बांध विस्थापितों ने खुद उठाए फावड़े

जबलपुर : लगभग 55 किलोमीटर दूर शाहपुरा क्षेत्र की दुर्गा नगर बस्ती में रहने वाले बरगी बांध परियोजना के विस्थापित परिवार अब खुद सड़क सुधारने में जुट गए हैं। करीब 35 साल बाद भी आवागमन की समस्या से जूझ रहे लोगों ने फावड़े और बाल्टियां लेकर दो किलोमीटर लंबे कीचड़ भरे रास्ते की मरम्मत शुरू की है। उनका प्रयास बारिश के मौसम में इस्तेमाल योग्य अस्थायी रास्ता तैयार करना है। इसके लिए ग्रामीण अपने साधनों से बजरी और पत्थर इकट्ठा कर रहे हैं।
चिरपोड़ी के दुर्गा नगर से करेली तक सड़क सुधारने के इस प्रयास में बड़ी संख्या में स्थानीय लोग शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, 100 से अधिक महिलाएं, लगभग 50 पुरुष और 25 से ज्यादा बच्चे स्वेच्छा से योगदान दे रहे हैं। बस्ती के लोग मिलकर रास्ते को चलने लायक बनाने की कोशिश कर रहे हैं। यह किसी घोषित सरकारी सड़क निर्माण योजना के तहत हो रहा काम नहीं है। ग्रामीण अपनी जरूरत पूरी करने के लिए उपलब्ध संसाधनों से अस्थायी मरम्मत कर रहे हैं।
दुर्गा नगर में बसे परिवारों का संबंध बरगी बांध परियोजना के कारण हुए विस्थापन से है। जबलपुर, मंडला और सिवनी जिलों से विस्थापित परिवारों को यहां बसाया गया था। बस्ती में 90 से ज्यादा परिवार और लगभग 1,200 लोग रहने की जानकारी दी गई है। मूल स्थान छोड़ने के बाद यहां जीवन शुरू करने वाले परिवारों के सामने अब भी बुनियादी सुविधाओं का सवाल बना हुआ है। सड़क की स्थिति इसी समस्या का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण बनकर सामने आई है।
ग्रामीणों के अनुसार, बारिश के दिनों में रास्ते पर कीचड़ होने से आवागमन कठिन हो जाता है। दो किलोमीटर का यह संपर्क मार्ग बस्ती के लोगों के लिए महत्वपूर्ण है। इसे सुधारने का तत्काल उद्देश्य रोजमर्रा की आवाजाही में कुछ राहत पाना है। बजरी और पत्थर डालकर ग्रामीण रास्ते की स्थिति बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, अस्थायी मरम्मत से कितनी राहत मिलेगी और रास्ता कितने समय तक उपयोग योग्य रहेगा, यह बारिश तथा स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
इस सामूहिक प्रयास में महिलाओं की संख्या विशेष ध्यान खींचती है। सौ से अधिक महिलाएं सड़क सुधारने के काम में शामिल बताई गई हैं। पुरुषों और बच्चों की भागीदारी के साथ यह बस्ती स्तर का प्रयास बन गया है। लोगों का स्वयं सामग्री जुटाना बताता है कि सड़क की जरूरत उनके दैनिक जीवन से जुड़ी है। हालांकि, बच्चों की भागीदारी की जानकारी से उनके काम की प्रकृति या अवधि का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। उपलब्ध विवरण में इसका अलग ब्योरा नहीं है।
बस्ती के प्रशासनिक दर्जे को लेकर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि वन विभाग और स्थानीय प्रशासन इसे छोटी बस्ती बताते हैं और अभी तक पूरे गांव का दर्जा नहीं मिला है। यह संबंधित विभागों के रुख के बारे में ग्रामीणों का कथन है। इसकी पुष्टि करने वाला कोई आधिकारिक आदेश या विस्तृत विभागीय प्रतिक्रिया उपलब्ध विवरण में नहीं है। फिर भी यह शिकायत पुनर्वास के बाद सुविधाओं और प्रशासनिक पहचान के बीच संबंध का मुद्दा सामने लाती है।
ग्रामीणों की समस्या केवल सड़क तक सीमित नहीं है। खराब संपर्क मार्ग का असर शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच पर पड़ने की बात भी सामने आई है। किसी बस्ती का आसपास के स्थानों से सुगम संपर्क बच्चों और परिवारों की जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण होता है। बारिश में रास्ता कठिन होने पर सामान्य आवाजाही भी चुनौती बन जाती है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी में किसी विशिष्ट मरीज, उपचार में देरी या सड़क के कारण हुई दुर्घटना का विवरण नहीं दिया गया है।
शिक्षा से संबंधित एक गंभीर तथ्य दुर्गा नगर के प्राथमिक स्कूल की इमारत का है। जानकारी के अनुसार, भवन जर्जर होने के कारण लगभग पांच साल पहले गिरा दिया गया था। स्कूल भवन का हटाया जाना बच्चों के लिए उपयुक्त शैक्षणिक परिसर की जरूरत सामने लाता है। हालांकि, वर्तमान में कक्षाएं कहां संचालित होती हैं, कितने विद्यार्थी पढ़ते हैं या वैकल्पिक व्यवस्था क्या है, इसका विवरण नहीं है। इसलिए भवन गिराए जाने को स्कूल पूरी तरह बंद होने के समान नहीं बताया जा सकता।
बरगी बांध विस्थापितों का यह घटनाक्रम पुनर्वास के बाद लंबे समय तक बनी रहने वाली जरूरतों की ओर ध्यान खींचता है। परिवारों को नए स्थान पर बसाने के साथ संपर्क मार्ग और सेवाओं की उपलब्धता भी उनके जीवन को प्रभावित करती है। दुर्गा नगर में लोगों का स्वयं रास्ता सुधारना तत्काल आवश्यकता का संकेत है। स्थायी सड़क के लिए अलग योजना, संसाधन और तकनीकी व्यवस्था की जरूरत होगी। अभी ऐसी किसी स्वीकृत परियोजना या निर्माण समयसीमा की जानकारी सामने नहीं आई है।
फिलहाल ग्रामीणों ने अपने स्तर पर काम शुरू कर दिया है। उनका प्रयास बारिश के बीच आवाजाही आसान करने का है, जबकि स्थायी संपर्क मार्ग की जरूरत बनी हुई है। करीब 35 वर्षों बाद सामने आया यह सामूहिक श्रम बस्ती की समस्या को उजागर करता है। आगे संबंधित विभागों का पक्ष और सुविधाओं के लिए प्रस्तावित व्यवस्था स्पष्ट होने पर स्थिति की पूरी तस्वीर सामने आएगी। ग्रामीणों का वर्तमान काम अस्थायी रास्ते को बेहतर बनाने पर केंद्रित है।





