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कलेक्टर और CEO ने पेश की मिसाल, आदिवासी हॉस्टल के बच्चों को खुद पहनाए जूते-मोजे

गौरा कन्हारी। प्रशासनिक अधिकारी अक्सर अपनी जिम्मेदारियों और सख्त फैसलों के लिए चर्चा में रहते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के गौरा कन्हारी में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने संवेदनशील प्रशासन की मिसाल पेश की। कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया और जिला पंचायत CEO दिव्यांशु चौधरी ने आदिवासी हॉस्टल के बच्चों के बीच पहुंचकर न सिर्फ उनकी समस्याएं सुनीं, बल्कि खुद उनके जूते और मोजे पहनाने में मदद की।
अधिकारियों का यह दौरा गौरा कन्हारी स्थित आदिवासी लड़कों के हॉस्टल में अचानक निरीक्षण के दौरान हुआ। इस दौरान उन्होंने बच्चों से बातचीत की, उनकी पढ़ाई, रहन-सहन और रोजमर्रा की जरूरतों के बारे में जानकारी ली। निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने बच्चों के साथ अपनापन दिखाते हुए उनके साथ समय बिताया।
बच्चों से की बातचीत और जाना हाल-चाल
कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया और जिला पंचायत CEO दिव्यांशु चौधरी ने हॉस्टल पहुंचकर कक्षा 1 से 8 तक के छात्रों से मुलाकात की। उन्होंने बच्चों से उनकी पढ़ाई, भोजन, रहने की व्यवस्था और अन्य सुविधाओं के बारे में जानकारी ली।
अधिकारियों ने बच्चों से सहज बातचीत करते हुए यह जानने की कोशिश की कि उन्हें हॉस्टल में किसी तरह की परेशानी तो नहीं हो रही है। उन्होंने छात्रों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित किया और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए मेहनत करने की सलाह दी।
निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने हॉस्टल की व्यवस्थाओं का भी जायजा लिया। उन्होंने बच्चों के लिए उपलब्ध सुविधाओं, साफ-सफाई और अन्य व्यवस्थाओं की जानकारी ली और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक दिशा-निर्देश दिए।
भावुक कर देने वाला पल आया सामने
निरीक्षण के दौरान एक ऐसा पल आया जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने एक बच्चे के पास बैठकर उसे खुद मोजे पहनाए और उसके जूतों के फीते बांधे।
इसी तरह जिला पंचायत CEO दिव्यांशु चौधरी ने भी एक अन्य छात्र की मदद करते हुए उसे जूते और मोजे पहनाए। अधिकारियों का यह व्यवहार देखकर वहां मौजूद लोग भावुक हो गए।
आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारियों को सरकारी कामकाज और निरीक्षण के दौरान देखा जाता है, लेकिन बच्चों के प्रति उनका यह आत्मीय व्यवहार लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया।
‘सोल्स फॉर सोल्स’ पहल का हिस्सा
यह पूरा कार्यक्रम प्रशासन की ‘सोल्स फॉर सोल्स’ (Soles for Souls) पहल के तहत किया गया। इस पहल का उद्देश्य स्कूलों, हॉस्टलों और आश्रमों में पढ़ने वाले बच्चों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है।
इस अभियान के तहत बच्चों को जूते, मोजे और अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर और दूरदराज क्षेत्रों से आने वाले विद्यार्थियों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।
प्रशासन का मानना है कि बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और वे बेहतर माहौल में अपनी पढ़ाई कर पाते हैं।
बच्चों के प्रति संवेदनशीलता का संदेश
कलेक्टर और CEO के इस कदम को प्रशासनिक संवेदनशीलता के उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों ने अपने व्यवहार से यह संदेश दिया कि सरकारी जिम्मेदारी केवल योजनाओं को लागू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि जरूरतमंद लोगों के साथ जुड़कर उनकी समस्याओं को समझना भी जरूरी है।
आदिवासी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकताओं में शामिल है। ऐसे प्रयास बच्चों के मन में प्रशासन के प्रति विश्वास भी बढ़ाते हैं।
लोगों ने की सराहना
कलेक्टर और CEO के इस मानवीय पहल की स्थानीय लोगों और कर्मचारियों ने सराहना की। लोगों का कहना है कि जब अधिकारी सीधे बच्चों के बीच जाकर उनकी जरूरतों को समझते हैं तो योजनाओं का बेहतर असर देखने को मिलता है।
हॉस्टल के बच्चों के लिए भी यह अनुभव यादगार रहा। अधिकारियों के इस अपनत्व से बच्चों में उत्साह देखने को मिला।
गौरा कन्हारी हॉस्टल का यह दौरा केवल एक निरीक्षण नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासन और आम लोगों के बीच संवेदनशील संबंधों को मजबूत करने वाला उदाहरण बन गया। ‘सोल्स फॉर सोल्स’ जैसी पहल के माध्यम से जरूरतमंद बच्चों तक सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।





