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इंदौर : भारत विकास परिषद (BVP) की अहिल्यानगरी शाखा ने अपने 64वें स्थापना दिवस के अवसर पर पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हुए SGSITS (श्री गोविंदराम सेकसरिया प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान) परिसर में वृहद पौधारोपण अभियान चलाया। परिषद के राष्ट्रीय अभियान के तहत आयोजित इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सदस्यों और उनके परिवारों ने भाग लिया तथा पौधारोपण के साथ-साथ उनकी देखभाल का भी संकल्प लिया।
कार्यक्रम का आयोजन "एक पौधा, एक ज़िंदगी" थीम पर किया गया। अभियान का मुख्य उद्देश्य हाल के महीनों में अत्यधिक गर्मी और पानी की कमी के कारण प्रभावित हुए पौधों की जगह नए पौधे लगाकर संस्थान परिसर में विकसित मियावाकी वन को पुनर्जीवित करना था। इस पहल के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, हरित क्षेत्र के विस्तार और जैव विविधता को बढ़ावा देने का संदेश भी दिया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत पौधारोपण के साथ हुई, जिसमें परिषद के पदाधिकारियों, सदस्यों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और उनके परिवारों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। सभी प्रतिभागियों ने परिसर में विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए और उनके संरक्षण का संकल्प लिया। कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण के महत्व पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
भारत विकास परिषद के पदाधिकारियों ने बताया कि बढ़ते शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और लगातार घटते हरित क्षेत्र को देखते हुए ऐसे अभियानों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। उनका कहना था कि केवल पौधे लगाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी नियमित देखभाल और संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है ताकि वे बड़े होकर पर्यावरण को वास्तविक लाभ पहुंचा सकें।
परिषद के अध्यक्ष संजय मेहता ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि पर्यावरण संरक्षण आज केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज का दायित्व है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को अपने जीवन में कम से कम एक पौधा लगाकर उसकी देखभाल करने का संकल्प लेना चाहिए।
संजय मेहता ने कहा, "पौधारोपण तभी सार्थक होगा जब लगाए गए पौधों की नियमित देखभाल की जाए। केवल पौधे लगाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें पानी देना, सुरक्षा प्रदान करना और उनके विकास पर ध्यान देना भी हमारी जिम्मेदारी है।"
उन्होंने बताया कि हाल ही में भीषण गर्मी और जल संकट के कारण संस्थान परिसर में विकसित मियावाकी वन के कुछ पौधे प्रभावित हुए थे। इसी कारण परिषद ने स्थापना दिवस के अवसर पर नए पौधे लगाने का निर्णय लिया ताकि हरित क्षेत्र को फिर से विकसित किया जा सके।
कार्यक्रम में शामिल सदस्यों ने लगाए गए पौधों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी अपने स्तर पर लेने का संकल्प व्यक्त किया। कई प्रतिभागियों ने कहा कि वे समय-समय पर परिसर का दौरा कर पौधों की स्थिति की जानकारी लेंगे और उनकी देखभाल में सहयोग करेंगे।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि मियावाकी पद्धति से विकसित किए गए जंगल कम जगह में अधिक घनत्व वाले पौधों के कारण तेजी से विकसित होते हैं। इससे जैव विविधता बढ़ती है, तापमान नियंत्रित रखने में मदद मिलती है और वायु गुणवत्ता में भी सुधार होता है। शहरी क्षेत्रों में इस पद्धति को पर्यावरण संरक्षण की प्रभावी तकनीक माना जाता है।
कार्यक्रम के दौरान उपस्थित वक्ताओं ने जल संरक्षण, स्वच्छ पर्यावरण और वृक्षों के महत्व पर भी अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को पौधारोपण और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
भारत विकास परिषद लंबे समय से सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय गतिविधियों के माध्यम से जनजागरण का कार्य करती रही है। परिषद की ओर से समय-समय पर स्वास्थ्य शिविर, रक्तदान, शिक्षा सहायता और पर्यावरण संरक्षण जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। स्थापना दिवस पर आयोजित यह पौधारोपण अभियान भी इसी श्रृंखला का हिस्सा था।
कार्यक्रम के समापन पर सभी प्रतिभागियों ने पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली और भविष्य में भी ऐसे अभियानों में सक्रिय भागीदारी का संकल्प दोहराया। परिषद के पदाधिकारियों ने कहा कि आने वाले समय में भी शहर के विभिन्न क्षेत्रों में पौधारोपण, जल संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
भारत विकास परिषद का मानना है कि यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण की दिशा में छोटा-सा योगदान भी दे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ, हरित और सुरक्षित वातावरण तैयार किया जा सकता है। इसी संदेश के साथ परिषद ने अपने 64वें स्थापना दिवस को सेवा, संस्कार और पर्यावरण संरक्षण के संकल्प के रूप में मनाया।





