मध्य प्रदेश

डिलीवरी के वक्त रक्तस्राव पर रहेगी सटीक नजर

Ratna Netam
15 Sept 2026 6:13 PM IST
डिलीवरी के वक्त रक्तस्राव पर रहेगी सटीक नजर
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भोपाल। मध्य प्रदेश में प्रसव के दौरान होने वाली मातृ मृत्यु को कम करने के लिए स्वास्थ्य विभाग एक नई व्यवस्था लागू करने की तैयारी में है। अब अस्पतालों के लेबर रूम में प्रसव के बाद महिला के शरीर से हुए रक्तस्राव का केवल आंखों से देखकर अनुमान नहीं लगाया जाएगा, बल्कि उसकी वास्तविक मात्रा मापी जाएगी। इसके लिए प्रदेश के प्रसव कक्षों में विशेष **ऑब्स्टेट्रिक ड्रेप** यानी रक्तस्राव मापने वाले बैग उपलब्ध कराए जाएंगे।
नई व्यवस्था का सबसे बड़ा उद्देश्य प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव यानी **पोस्टपार्टम हेमरेज (PPH)** की जल्द पहचान करना है। प्रसव के बाद ज्यादा रक्त बहना दुनियाभर में मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। अगर डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को समय रहते पता चल जाए कि महिला का रक्तस्राव तेजी से बढ़ रहा है तो उपचार शुरू करने, जरूरी दवाएं देने और आवश्यकता पड़ने पर रक्त चढ़ाने की तैयारी जल्दी की जा सकती है।
मध्य प्रदेश में 1500 से अधिक लेबर रूम हैं। स्वास्थ्य विभाग इन सभी प्रसव कक्षों में चरणबद्ध तरीके से विशेष ड्रेप उपलब्ध कराने की तैयारी कर रहा है। इनकी खरीदी मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉरपोरेशन के माध्यम से किए जाने की योजना है।
क्या है ऑब्स्टेट्रिक ड्रेप?
ऑब्स्टेट्रिक ड्रेप एक विशेष प्रकार का उपकरण है, जिसे प्रसव के दौरान और उसके बाद निकलने वाले रक्त को इकट्ठा करने और उसकी मात्रा मापने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
सामान्य तौर पर प्रसव के बाद डॉक्टर या स्वास्थ्यकर्मी रक्तस्राव की मात्रा का अनुमान लगाते हैं। लेकिन आंखों से देखकर लगाया गया अनुमान वास्तविक मात्रा से अलग हो सकता है।
विशेष ड्रेप महिला के नीचे लगाया जाता है। इसमें निकलने वाला रक्त एक निर्धारित हिस्से में इकट्ठा होता है और उस पर मौजूद माप के जरिए स्वास्थ्यकर्मी रक्त की मात्रा का बेहतर आकलन कर सकते हैं।
इससे यह जानने में मदद मिलती है कि रक्तस्राव सामान्य सीमा में है या स्थिति गंभीर होती जा रही है।
क्यों जरूरी पड़ी नई व्यवस्था?
प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव बहुत तेजी से गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है।
कई बार शुरुआत में महिला सामान्य दिखाई देती है, लेकिन लगातार रक्त बहने से उसकी स्थिति अचानक बिगड़ सकती है। अगर वास्तविक रक्तस्राव का पता लगाने में देरी हुई तो उपचार भी देर से शुरू हो सकता है।
इसी समस्या को देखते हुए रक्तस्राव को मात्रात्मक रूप से मापने पर जोर बढ़ रहा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी प्रसव के बाद रक्तस्राव के केवल दृश्य अनुमान की सीमाओं की ओर ध्यान दिलाया है। नई अंतरराष्ट्रीय सिफारिशों में रक्त संग्रह ड्रेप जैसे उपकरणों की मदद से PPH की जल्दी पहचान पर जोर दिया गया है।
क्या है पोस्टपार्टम हेमरेज?
बच्चे के जन्म के बाद होने वाले अत्यधिक रक्तस्राव को पोस्टपार्टम हेमरेज कहा जाता है।
यह स्थिति प्रसव के तुरंत बाद या कुछ समय बाद विकसित हो सकती है। समय पर पहचान और इलाज न मिलने पर महिला का ब्लड प्रेशर तेजी से गिर सकता है और शॉक जैसी गंभीर स्थिति पैदा हो सकती है।
इसी कारण लेबर रूम में प्रसव के बाद महिला की लगातार निगरानी जरूरी होती है।
रक्तस्राव की वास्तविक मात्रा पता होने से डॉक्टर स्थिति की गंभीरता का आकलन ज्यादा तेजी से कर सकते हैं।
1500 से ज्यादा लेबर रूम में पहुंचेगा ड्रेप
मध्य प्रदेश में 1500 से अधिक प्रसव कक्ष संचालित हैं। स्वास्थ्य विभाग की योजना इन सभी जगहों तक ऑब्स्टेट्रिक ड्रेप पहुंचाने की है।
इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया जाएगा।
ड्रेप की खरीद मध्य प्रदेश पब्लिक हेल्थ सर्विसेज कॉरपोरेशन के माध्यम से किए जाने की तैयारी है।
व्यवस्था लागू होने के बाद सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में प्रसव के दौरान रक्तस्राव की निगरानी का तरीका ज्यादा व्यवस्थित हो सकता है।
हालांकि उपकरण उपलब्ध कराने के साथ स्टाफ को इसके सही इस्तेमाल और माप के आधार पर समय पर कार्रवाई के लिए प्रशिक्षित करना भी महत्वपूर्ण होगा।
खून की मात्रा पता चलते ही शुरू हो सकेगा इलाज
नई व्यवस्था का व्यावहारिक फायदा यह है कि स्वास्थ्यकर्मियों के सामने रक्तस्राव की मात्रा ज्यादा स्पष्ट होगी।
अगर रक्तस्राव तेजी से बढ़ रहा है तो डॉक्टर तत्काल PPH प्रबंधन शुरू कर सकते हैं।
स्थिति के अनुसार दवाएं, IV फ्लूइड और दूसरे उपचार दिए जा सकते हैं। आवश्यकता होने पर ब्लड बैंक को भी जल्दी अलर्ट किया जा सकता है।
गंभीर स्थिति में विशेषज्ञ डॉक्टर और उच्च स्वास्थ्य केंद्र के लिए रेफरल की जरूरत भी पड़ सकती है।
ऐसे मामलों में हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है।
एनीमिया के कारण खतरा और बढ़ जाता है
मध्य प्रदेश में महिलाओं में एनीमिया भी बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है।
NFHS-5 के आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 15 से 49 साल की करीब **54.7 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से प्रभावित** थीं।
एनीमिया में शरीर में पर्याप्त स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं या हीमोग्लोबिन नहीं होता। ऐसी स्थिति में प्रसव के दौरान अधिक रक्तस्राव होने पर महिला के लिए खतरा ज्यादा गंभीर हो सकता है।
इसी वजह से गर्भावस्था के दौरान एनीमिया की पहचान और उसका उपचार भी मातृ स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है।
आयरन और फोलिक एसिड की पर्याप्त उपलब्धता, नियमित जांच और संस्थागत प्रसव जैसी व्यवस्थाएं मातृ मृत्यु कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
मध्य प्रदेश में MMR 159
मध्य प्रदेश में मातृ मृत्यु अनुपात लंबे समय से स्वास्थ्य विभाग के सामने बड़ी चुनौती रहा है।
2020-22 के उपलब्ध आंकड़ों में प्रदेश का मातृ मृत्यु अनुपात **प्रति एक लाख जीवित जन्म पर 159** दर्ज किया गया था।
यानी हर एक लाख जीवित जन्म के अनुपात में गर्भावस्था या प्रसव से जुड़ी परिस्थितियों में 159 मातृ मृत्यु दर्ज होने का अनुमान था।
हालांकि पिछले वर्षों की तुलना में स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन यह आंकड़ा अभी भी चिंता का विषय है।
इसी कारण प्रसव के दौरान होने वाली उन जटिलताओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है जिन्हें समय पर पहचान और बेहतर उपचार के जरिए रोका जा सकता है।
PPH की जल्दी पहचान सबसे जरूरी
प्रसव के बाद होने वाले रक्तस्राव की सबसे बड़ी चुनौती उसकी समय पर पहचान है।
अगर डॉक्टर या नर्स केवल आंखों से देखकर खून की मात्रा का अनुमान लगा रहे हैं तो वास्तविक रक्तस्राव कम आंका जा सकता है।
विशेष ड्रेप इस समस्या को कम करने में मदद कर सकता है।
रक्त ड्रेप में जमा होगा और उसकी मात्रा मापी जा सकेगी। इससे स्वास्थ्यकर्मियों के पास निर्णय लेने के लिए ज्यादा स्पष्ट जानकारी उपलब्ध होगी।
यह व्यवस्था विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है जिनमें पहले से एनीमिया या दूसरी स्वास्थ्य समस्याएं मौजूद हैं।
WHO भी रक्त मापने पर दे रहा जोर
प्रसवोत्तर रक्तस्राव से होने वाली मातृ मौतों को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रणनीति बदली जा रही है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 2026 में PPH को लेकर नई पहल और सिफारिशों पर जानकारी देते हुए बताया था कि बच्चे के जन्म के बाद रक्त की मात्रा का केवल आंखों से अनुमान लगाना काफी गलत हो सकता है।
WHO के मुताबिक रक्त संग्रह ड्रेप के जरिए रक्तस्राव की वस्तुनिष्ठ निगरानी और समय पर उपचार से गंभीर PPH की पहचान बेहतर हो सकती है।
इस लिहाज से मध्य प्रदेश में प्रस्तावित व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय स्तर पर PPH की जल्दी पहचान पर दिए जा रहे जोर के अनुरूप दिखाई देती है।
अस्पताल में प्रसव इसलिए महत्वपूर्ण
नई व्यवस्था का फायदा मुख्य रूप से संस्थागत प्रसव में मिलेगा।
अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्र में प्रसव होने पर प्रशिक्षित डॉक्टर और नर्स उपलब्ध होते हैं। आपात स्थिति में दवा, ऑक्सीजन, IV फ्लूइड, ब्लड ट्रांसफ्यूजन और जरूरत के अनुसार सर्जिकल उपचार की व्यवस्था की जा सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में करीब 89.8 प्रतिशत प्रसव संस्थागत होते हैं।
इसका दूसरा पहलू यह है कि करीब 10 प्रतिशत प्रसव अभी भी स्वास्थ्य संस्थानों के बाहर होते हैं।
घर पर प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव होने पर स्थिति ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है क्योंकि रक्तस्राव की पहचान और अस्पताल तक पहुंचने में समय लग सकता है।
केवल ड्रेप से खत्म नहीं होगी चुनौती
विशेष ऑब्स्टेट्रिक ड्रेप महत्वपूर्ण उपकरण है, लेकिन केवल इसे उपलब्ध करा देने से मातृ मृत्यु की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
इसके साथ पर्याप्त प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी, दवाओं की उपलब्धता, ब्लड बैंक, एम्बुलेंस और समय पर रेफरल व्यवस्था भी जरूरी है।
अगर किसी छोटे स्वास्थ्य केंद्र में PPH की पहचान हो जाती है लेकिन महिला को रक्त की जरूरत है और वहां ब्लड उपलब्ध नहीं है तो उसे समय पर उच्च स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाना जरूरी होगा।
इसलिए मातृ मृत्यु रोकने के लिए पूरी स्वास्थ्य प्रणाली का मजबूत होना जरूरी है।
गर्भावस्था में नियमित जांच भी बेहद जरूरी
मातृ मृत्यु रोकने की शुरुआत केवल लेबर रूम से नहीं होती।
गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच से एनीमिया, हाई ब्लड प्रेशर, संक्रमण और दूसरी जटिलताओं का पहले पता लगाया जा सकता है।
अगर महिला गंभीर एनीमिया से पीड़ित है तो प्रसव से पहले ही उसकी स्थिति सुधारने की कोशिश की जा सकती है।
इसी तरह हाई रिस्क प्रेग्नेंसी की पहचान होने पर प्रसव ऐसे अस्पताल में कराया जा सकता है जहां विशेषज्ञ और आपात सुविधाएं मौजूद हों।
इससे प्रसव के दौरान अचानक पैदा होने वाली गंभीर स्थिति से निपटना आसान होता है।
स्वास्थ्यकर्मियों की ट्रेनिंग होगी महत्वपूर्ण
नई तकनीक का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब लेबर रूम में मौजूद स्वास्थ्यकर्मी इसका सही इस्तेमाल कर सकें।
उन्हें यह समझना जरूरी होगा कि ड्रेप कैसे लगाया जाए, रक्त की मात्रा कैसे पढ़ी जाए और किस स्थिति में तुरंत उपचार शुरू किया जाए।
इसके साथ PPH के लिए निर्धारित क्लिनिकल प्रोटोकॉल का पालन भी महत्वपूर्ण होगा।
अस्पतालों में नियमित प्रशिक्षण और आपात स्थिति की मॉक ड्रिल जैसी व्यवस्थाएं प्रतिक्रिया समय को बेहतर बनाने में मदद कर सकती हैं।
हर बूंद का हिसाब बचा सकता है जान
मध्य प्रदेश स्वास्थ्य विभाग की यह पहल देखने में छोटी तकनीकी व्यवस्था लग सकती है, लेकिन मातृ स्वास्थ्य के लिहाज से इसका महत्व बड़ा है।
प्रसव के बाद रक्तस्राव तेजी से बढ़ सकता है और शुरुआती समय में उसका सही आकलन जान बचाने में निर्णायक साबित हो सकता है।
अब लेबर रूम में रक्तस्राव का सिर्फ अनुमान लगाने के बजाय उसे विशेष ड्रेप में एकत्र कर वास्तविक मात्रा मापने की तैयारी है।
प्रदेश के **1500 से अधिक लेबर रूम** में चरणबद्ध तरीके से इसे उपलब्ध कराने की योजना है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य साफ है—PPH की जल्द पहचान, तुरंत उपचार और प्रसव के दौरान होने वाली रोकी जा सकने वाली मातृ मौतों में कमी।
हालांकि इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि ड्रेप कितनी जल्दी सभी स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुंचते हैं, स्टाफ को कितना प्रभावी प्रशिक्षण मिलता है और गंभीर मरीजों के लिए दवा, रक्त तथा रेफरल की व्यवस्था कितनी मजबूत रहती है।
अगर इन सभी व्यवस्थाओं को एक साथ प्रभावी बनाया जाता है तो प्रसव के दौरान **'खून की हर बूंद का हिसाब' माताओं की जान बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
इस योजना की जानकारी 15 सितंबर 2026 की रिपोर्ट में सामने आई है। WHO भी कहता है कि प्रसव के बाद रक्तस्राव का केवल दृश्य अनुमान काफी गलत हो सकता है और रक्त-संग्रह ड्रेप जैसी वस्तुनिष्ठ माप व्यवस्था PPH की समय पर पहचान में मदद करती है।
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