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ADPO भर्ती में 25 हजार की लेट फीस पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, उम्मीदवार की याचिका खारिज

इंदौर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट पब्लिक प्रोसिक्यूशन ऑफिसर (ADPO) भर्ती में देरी से आवेदन करने पर मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) द्वारा निर्धारित 25 हजार रुपये की लेट फीस को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन नहीं करने का कोई ठोस और स्पष्ट कारण नहीं बता पाया। ऐसे में उसे निर्धारित नियमों से अलग राहत देने का आधार नहीं बनता।
जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की एकलपीठ ने 22 सितंबर को मोहम्मद रिजवान की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। रिजवान ने MPPSC की ओर से ADPO भर्ती के लिए देर से आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों पर लगाई गई 25 हजार रुपये की लेट फीस को अत्यधिक बताते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
मामला MPPSC की ओर से 10 मार्च को जारी ADPO भर्ती विज्ञापन से जुड़ा है। आयोग ने भर्ती प्रक्रिया में आवेदन करने के लिए अलग-अलग समय सीमा निर्धारित की थी। सामान्य रूप से आवेदन जमा करने की अंतिम तारीख 8 मई तय की गई थी। इसके बाद भी अभ्यर्थियों को अतिरिक्त शुल्क के साथ आवेदन का अवसर दिया गया था।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 9 मई से 15 मई के बीच आवेदन करने वाले उम्मीदवारों को 3 हजार रुपये की लेट फीस देनी थी। वहीं 16 मई से 23 सितंबर के बीच आवेदन करने वालों के लिए लेट फीस बढ़ाकर 25 हजार रुपये निर्धारित की गई थी। यानी सामान्य समय सीमा खत्म होने के बाद भी आयोग ने अभ्यर्थियों के लिए आवेदन का विकल्प खुला रखा था, लेकिन इसके लिए चरणबद्ध तरीके से अतिरिक्त शुल्क तय किया गया था।
मोहम्मद रिजवान निर्धारित अंतिम तारीख तक आवेदन नहीं कर पाए थे। इसके बाद जब उन्होंने आवेदन करना चाहा तो उन्हें 25 हजार रुपये की लेट फीस वाले प्रावधान का सामना करना पड़ा। उन्होंने इस राशि को अत्यधिक बताते हुए हाईकोर्ट में चुनौती दी और राहत की मांग की।
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के सामने कहा गया कि कुछ अनिवार्य व्यक्तिगत कारणों और उनके नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के चलते वह निर्धारित समय सीमा के भीतर आवेदन नहीं कर पाए। उन्होंने 25 हजार रुपये की लेट फीस को बहुत अधिक बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।
हाईकोर्ट ने हालांकि पाया कि याचिकाकर्ता ने देरी के पीछे कोई ठोस तथ्य या विशिष्ट परिस्थिति प्रस्तुत नहीं की। अदालत के अनुसार केवल यह कहना कि ‘अनिवार्य व्यक्तिगत कारणों’ या ‘नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों’ के कारण आवेदन नहीं किया जा सका, पर्याप्त नहीं है। अभ्यर्थी को यह स्पष्ट करना चाहिए था कि ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं जिनकी वजह से वह लंबे समय तक आवेदन नहीं कर पाया।
अदालत ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि भर्ती विज्ञापन मार्च में जारी किया गया था और आवेदन की सामान्य अंतिम तारीख 8 मई थी। इसके बाद 9 से 15 मई तक 3 हजार रुपये अतिरिक्त शुल्क देकर आवेदन करने का अवसर उपलब्ध था। यानी अभ्यर्थियों को सामान्य समय सीमा समाप्त होने के बाद भी कम लेट फीस के साथ आवेदन करने के लिए अतिरिक्त अवधि दी गई थी।
इसके बावजूद याचिकाकर्ता ने इस अवधि में आवेदन क्यों नहीं किया, इसका भी कोई ठोस कारण अदालत के सामने नहीं रखा गया। इसके बाद 16 मई से 23 सितंबर तक आवेदन करने के लिए 25 हजार रुपये की लेट फीस निर्धारित थी। अदालत ने इन परिस्थितियों को देखते हुए याचिकाकर्ता को विशेष राहत देने से इनकार कर दिया।
भर्ती परीक्षाओं में आवेदन की अंतिम तारीख और अन्य शर्तें विज्ञापन में पहले से निर्धारित होती हैं। अभ्यर्थियों से अपेक्षा की जाती है कि वे तय समय के भीतर आवेदन और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करें। कई भर्ती संस्थाएं अंतिम तारीख के बाद भी उम्मीदवारों को अतिरिक्त शुल्क के साथ आवेदन करने का मौका देती हैं, लेकिन इसके लिए अलग-अलग अवधि के अनुसार शुल्क निर्धारित किया जा सकता है।
इस मामले में भी MPPSC ने सामान्य आवेदन अवधि समाप्त होने के बाद दो स्तर पर अतिरिक्त अवसर दिया था। पहले चरण में सात दिनों तक 3 हजार रुपये की लेट फीस रखी गई, जबकि उसके बाद कई महीनों तक आवेदन करने के लिए 25 हजार रुपये का अतिरिक्त शुल्क निर्धारित किया गया था।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क इसी 25 हजार रुपये की राशि को लेकर था। उनका कहना था कि इतनी अधिक लेट फीस उचित नहीं है। हालांकि अदालत ने मामले की परिस्थितियों में इस तर्क को राहत देने के लिए पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने विशेष रूप से आवेदन में देरी के कारणों की अस्पष्टता पर ध्यान दिया।
अदालत का रुख इस बात पर केंद्रित रहा कि भर्ती प्रक्रिया में पहले से घोषित समय सीमा और शर्तों का पालन जरूरी है। यदि किसी उम्मीदवार को व्यक्तिगत परिस्थितियों के कारण राहत चाहिए तो उसके लिए उन परिस्थितियों का स्पष्ट और पर्याप्त विवरण प्रस्तुत करना आवश्यक होगा। केवल सामान्य शब्दों में कारण बताना न्यायिक हस्तक्षेप का आधार नहीं बन सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता के पास सामान्य अंतिम तारीख के बाद 3 हजार रुपये की लेट फीस देकर आवेदन करने का अवसर मौजूद था। इसके बावजूद उस अवधि का उपयोग नहीं किए जाने के संबंध में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
इसके बाद जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की अदालत ने मोहम्मद रिजवान की याचिका खारिज कर दी। परिणामस्वरूप याचिकाकर्ता को MPPSC की निर्धारित व्यवस्था से अलग राहत नहीं मिली।
यह आदेश उन उम्मीदवारों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो भर्ती प्रक्रिया में आवेदन की समय सीमा समाप्त होने के बाद अतिरिक्त अवसर या शुल्क में राहत की मांग करते हैं। अदालत के आदेश से यह स्पष्ट होता है कि ऐसे मामलों में केवल शुल्क अधिक होने का तर्क पर्याप्त नहीं हो सकता, बल्कि देरी के पीछे की परिस्थितियों को ठोस तरीके से अदालत के सामने रखना भी आवश्यक है।
फिलहाल MPPSC की ADPO भर्ती के लिए विज्ञापन में निर्धारित लेट फीस व्यवस्था के खिलाफ इस याचिका में हाईकोर्ट ने हस्तक्षेप नहीं किया है। अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा समय पर आवेदन नहीं करने के स्पष्ट कारणों के अभाव को महत्वपूर्ण मानते हुए याचिका खारिज कर दी।





