मध्य प्रदेश

Bhopal: नंदकुमार ने स्वदेशी अनुसंधान की वकालत की

Admindelhi1
14 Feb 2026 1:30 PM IST
Bhopal: नंदकुमार ने स्वदेशी अनुसंधान की वकालत की
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भोपाल: प्रख्यात चिंतक और विचारक जे. नंदकुमार ने कहा कि भारतीय मूल्यों पर आधारित विकास ही वास्तविक विकसित भारत बनाएगा। इसके लिए आवश्यक है कि हम स्वदेशी दृष्टिकोण से अनुसंधान को प्रोत्साहित करें।

नंदकुमार भोपाल में मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के विज्ञान भवन में दत्तोपंत ठेंगड़ी शोध संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय शोधार्थी समागम- 2026 के दूसरे दिन शुक्रवार को ‘भारतीय अस्मिता, वैश्वीकरण एवं सांस्कृतिक जड़े’ विषय पर सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि धर्म कोई सांप्रदायिक विचार नहीं, बल्कि जीवन का मूल तत्व है। भारत की अस्मिता सबसे प्राचीन है और संस्कृति इसे संवारती है। वर्तमान में टेक्नोलॉजी की भूमिका बहुत अधिक हो गई है। आज टेक्नोलॉजी तय करती है कि हमें किसे चुनना है, इसमें एल्गोरिदम की भूमिका महत्वपूर्ण है। किसके पक्ष में निर्णय होगा, यह एल्गोरिथम तय कर रहा है।

जे. नंदकुमार ने कहा कि देश को राजनीतिक आज़ादी तो मिल गई, पर क्या हम बौद्धिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर पाए? आज हमारे बीच सी. वी. रमन, रवीन्द्रनाथ टैगोर और सुब्रह्मण्यन, चंद्रशेखर जैसे विश्व स्तरीय प्रतिभाशाली व्यक्तित्व कम दिखाई देते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि तथाकथित ‘वैज्ञानिक सोच’ के नाम पर हमने अपनी जड़ों और मौलिकता को ही पीछे छोड़ दिया? यह राष्ट्र के भविष्य से जुड़ा गंभीर प्रश्न हैं।

भारत ऋषि प्रधान देश रहा है: डॉ चांदनीवालावेद मर्मज्ञ और भारतीय वांग्मय के प्रख्यात विद्वान डॉ मुरलीधर चांदनीवाला ने कहा कि वेद भारतीय ज्ञान और चिंतन की मूल आधारशिला हैं। वेद सम्पूर्ण छंदशास्त्र है। वे सबसे प्राचीनतम डाक्यूमेंट्स है। ऋग्वेद में 10 मंडल है। वेदों में सब विषयों का ज्ञान है। ऋग्वेद की 10600 ऋचाओं में ओम का उल्लेख नहीं है। हमारा देश ऋषि प्रधान रहा है।

डॉ. चांदनीवाला शुक्रवार को राष्ट्रीय शोधार्थी समागम- 2026 में ‘वेद: भारतीय बोध का अधिष्ठान’ विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि यजुर्वेद के 22वें अध्याय के 22वें मंत्र में 10–12 पंक्तियों का विस्तृत छंद है। प्राचीन काल में इसे राष्ट्रगान के समान गाया जाता था। आज भी धार्मिक यज्ञों, समारोहों में इसका गायन किया जाता है। इस मंत्र में ऋषि राष्ट्र की उन्नति और युवाओं के वीर, बुद्धिमान तथा सभ्य होने की कामना की गई हैं। उन्होंने कहा कि उस समय के ऋषि ऐसे राष्ट्र की कल्पना करते थे जहाँ युवा हृदय और मस्तिष्क दोनों से सशक्त हों तथा समाज में आदर्श आचरण प्रस्तुत करें।

डॉ. चांदनीवाला ने भारतीय ज्ञान की दो प्रमुख प्रणालियों- आगम और निगम को बताया। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद को सबसे प्राचीन उपलब्ध आलेख माना जाता है, किंतु उससे पूर्व भी वेदों के उल्लेख छंदशास्त्र के रूप में प्राप्त होते हैं। उन्होंने विभिन्न वैदिक छंदों का उल्लेख करते हुए गायत्री मंत्र के भेदों पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार प्रत्येक मंत्र का अपना एक विशिष्ट राग और स्वर होता है। ऋग्वेद के प्रथम मंडल की रचना मधुछंदा ने की थी, जो विश्वामित्र के पुत्र थे और स्वयं युवा थे। उन्होंने इस उदाहरण के माध्यम से युवाओं को शोध और अध्ययन के प्रति प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोग वेदों को केवल धार्मिक अधिष्ठान मानते हैं, किंतु उन्हें जानने और समझने का प्रयास नहीं करते।

वेद किसी एक कालखंड की रचना नहीं: प्रो मिश्रा‘भारतीय चिंतन एवं ज्ञान के दार्शनिक आधार (धर्म, ऋत एवं लोकसंग्रह)’ विषय पर भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव और प्रो सच्चिदानंद मिश्रा ने कहा कि भारतीय परंपरा में वेद समस्त ज्ञान का आधार माने जाते हैं और वे किसी एक कालखंड की रचना नहीं, बल्कि विभिन्न ऋषियों द्वारा अलग-अलग समय में संकलित ज्ञान का परिणाम हैं।

उन्होंने बताया कि भारतीय चिंतन में तर्क, परंपरा और ज्ञान का संतुलित समन्वय देखने को मिलता है। पश्चिमी विचारधारा के प्रभाव के बाद भारतीय और पश्चिमी दृष्टिकोण को जोड़ने का प्रयास भी हुआ। धर्म और विज्ञान दोनों को तर्क की सीमाओं के भीतर समझा जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय संस्कृति को संवाद, विचार-विमर्श और आलोचना-प्रत्यालोचना की सतत प्रक्रिया से विकसित परंपरा बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म के साथ ही विभिन्न ऋण जैसे मातृ ऋण, पितृ ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण-लेकर आता है, जिन्हें चुकाना उसका कर्तव्य है, हालांकि मातृ ऋण को पूर्ण रूप से चुकाना संभव नहीं है। व्याख्यान के अंत में उन्होंने सनातन, जैन और बौद्ध परंपराओं को परस्पर संबद्ध बताते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति की निरंतरता ही उसकी शक्ति है।

आयुर्वेद केवल उपचार नहीं, जीवन का संतुलन है : पद्मश्री डॉ. जे.के. बजाजइस सत्र की अध्यक्षता करते हुए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के पूर्व अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. जेके बजाज ने कहा कि आयुर्वेद सृष्टि के साथ प्रकट हुआ वेदों का शाश्वत ज्ञान है, जो समय के अनुसार समाज का मार्गदर्शन करता रहा है। आयुर्वेद की अवधारणा बहुत प्राचीन और सनातन मानी जाती है। कहा जाता है कि जब सृष्टि का निर्माण हुआ, तभी वेदों का ज्ञान भी प्रकट हुआ और उसी ज्ञान से आयुर्वेद की उत्पत्ति हुई। वेद शाश्वत हैं, अर्थात् उनका ज्ञान हमेशा से विद्यमान है। समय के साथ-साथ जब मानव जीवन में बदलाव आते गए, तब ऋषि-मुनियों ने लोगों की आवश्यकता के अनुसार इस ज्ञान को समझाया और आगे बढ़ाया। ऋषि सामान्य लोगों से अधिक दूरदर्शी होते थे, इसलिए वे समय की समस्याओं और बीमारियों को समझकर समाधान बताते थे। जब किसी काल में रोग बढ़ने लगे, तब ऋषि भारद्वाज ने आयुर्वेद के ज्ञान को व्यवस्थित रूप से ऋषियों को बताया। इसी से अष्टांग आयुर्वेद का विकास हुआ, जिसमें चिकित्सा को आठ भागों में बांटकर रोगों का उपचार समझाया गया। हालांकि आयुर्वेद का मूल ज्ञान संपूर्ण और सनातन है, लेकिन अष्टांग आयुर्वेद उस समय की जरूरतों के अनुसार विशेष रूप से उपयोग में लाया गया। इस प्रकार आयुर्वेद केवल चिकित्सा पद्धति ही नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित और स्वस्थ रखने का मार्ग भी है।

भारत का राष्ट्रीय चरित्र आध्यात्मिक: स्वामी नरसिम्हानंदचतुर्थ सत्र में ‘भारतीय शोध अवधारणा, दृष्टि, संरचना एवं प्रयोजन:सामाजिक समस्याओं का शोधन एवं योजनाओं में रूपांतरण’ विषय पर रामकृष्ण मिशन, कोझिकोड के स्वामी नरसिम्हानंद ने शोध की भारतीय अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि “रिसर्च” का अर्थ मात्र पुनः खोज नहीं, बल्कि ज्ञान की शुद्धि, गहराई और आत्म-अन्वेषण है। उन्होंने कहा कि शोध बाहरी तथ्यों का संकलन भर नहीं, बल्कि स्वयं को जानने की प्रक्रिया है। साहित्यिक चोरी की प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा कि अनेक स्थानों से शोध को चुराने की मानसिकता बदलनी होगी। उन्होंने भारत के राष्ट्रीय चरित्र को आध्यात्मिक बताते हुए स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख किया और कहा कि भारत में किसी भी क्षेत्र की सफलता का आधार आध्यात्मिकता ही है। “हम ऋषियों की संतान हैं” इस स्मरण के साथ उन्होंने शोधार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का आह्वान किया। ऋग्वेद की ऋचा “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा श्रेष्ठ विचारों का स्वागत करती है, किंतु अंधानुकरण नहीं। उनके अनुसार भारतीय ज्ञान परंपरा पर शोध करने के लिए आस्था, अनुशासन और साधना आवश्यक है।

शोध गंभीर साधना का विषय: प्रो. मिश्रप्रो. गिरीश्वर मिश्र ने अपने व्याख्यान में कहा कि यद्यपि वर्तमान समय को ‘ज्ञान युग’ कहा जाता है, किंतु भारत में ज्ञान संरक्षण की परंपरा अत्यंत प्राचीन और सुदृढ़ रही है। वेदों के मौखिक संरक्षण की परंपरा इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने शोधार्थियों से आग्रह किया कि वे किसी भी विषय को बहु दृष्टियों से देखें तथा आवश्यकता पड़ने पर स्थापित मान्यताओं का खंडन करने का साहस भी रखें। शोध में सब्जेक्टिव और ऑब्जेक्टिव दोनों पक्षों के संतुलन पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि शोध की उपयोगिता समाज के व्यापक हित से जुड़ी होनी चाहिए। केवल औपचारिकता के लिए किया गया शोध ज्ञान का संवर्धन नहीं कर सकता। उन्होंने एकाग्रता को नई शोध पद्धति का मूल मंत्र बताते हुए भगवद्गीता के अध्ययन और मनन का सुझाव दिया। उन्होंने कहा की शोध की पात्रता केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि गंभीर साधना का विषय है। कम शब्दों में शोधार्थियों को नया मंत्र देते हुए उन्होंने कहा कि नई शोध पद्धति में एकाग्रता अत्यंत आवश्यक है। ज्ञान की प्रक्रिया एकाग्रता से ही संभव है और शोध की मूल प्रवृत्ति ज्ञान को समझना और आगे बढ़ाना है।

इस सत्र की अध्यक्षता वीर भारत न्यास के न्यासी श्रीराम तिवारी ने की। उन्होंने कहा कि आज भारत में एक प्रकार का “नकली शोध का युद्ध” चल रहा है। पहले शोध साधना के रूप में किया जाता था, किंतु आज उसे सीमित चरणों में बाँटकर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शोध का उद्देश्य सामाजिक समस्याओं का शोधन कर उन्हें ठोस योजनाओं में रूपांतरित करना होना चाहिए।

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