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मध्य प्रदेश के 30 जिलों में सामान्य से कम बारिश, पानी और फसलों को लेकर बढ़ी चिंता

भोपाल। मध्य प्रदेश में इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की बारिश में बड़ा क्षेत्रीय अंतर देखने को मिला है। प्रदेश के कुछ हिस्सों में पर्याप्त बारिश हुई, जबकि बड़ी संख्या में जिले सामान्य बारिश के आंकड़े तक नहीं पहुंच सके। राज्य के 55 जिलों में से 30 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। इस स्थिति के कारण प्रदेश के लगभग आधे हिस्से में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसका असर खेती के साथ आने वाले महीनों में पेयजल और उद्योगों के लिए पानी की आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
मॉनसून सीजन के दौरान 30 सितंबर तक मध्य प्रदेश में औसतन 35.6 इंच यानी करीब 904 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई। सामान्य तौर पर इस अवधि में राज्य में औसतन 37.3 इंच बारिश होती है। इस हिसाब से प्रदेश को सामान्य बारिश का करीब 95.4 प्रतिशत पानी मिला और कुल स्तर पर बारिश की कमी करीब 4 प्रतिशत रही।
प्रदेश स्तर पर केवल 4 प्रतिशत की कमी पहली नजर में बहुत ज्यादा नहीं दिखाई देती, लेकिन जिलावार आंकड़े स्थिति की अलग तस्वीर पेश करते हैं। बारिश का वितरण समान नहीं रहने के कारण कई जिलों में सामान्य से काफी कम पानी बरसा है। यही वजह है कि राज्य का औसत सामान्य के आसपास रहने के बावजूद बड़ी संख्या में जिले पानी की कमी का सामना कर रहे हैं।
सबसे अधिक चिंता उन 11 जिलों को लेकर है, जहां अपेक्षित बारिश का 80 प्रतिशत भी पानी नहीं बरसा। इन जिलों में मॉनसून की कमी का असर जल स्रोतों और कृषि गतिविधियों पर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। वहीं अलीराजपुर में स्थिति और गंभीर रही, जहां सामान्य की तुलना में आधी से भी कम बारिश दर्ज की गई।
बारिश में इस असमानता का सबसे पहला असर खेती पर दिखाई दे सकता है। मध्य प्रदेश में बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है और मॉनसून की बारिश खरीफ फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। जिन इलाकों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई, वहां खेतों में नमी की कमी और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता किसानों की परेशानी बढ़ा सकती है।
बारिश कम होने से केवल मौजूदा फसलों की स्थिति ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि आने वाले कृषि सीजन पर भी इसका असर पड़ सकता है। मॉनसून के दौरान हुई बारिश से तालाब, बांध, कुएं और अन्य जल स्रोत भरते हैं। इन्हीं जल स्रोतों का पानी बाद में सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अगर किसी क्षेत्र में बारिश काफी कम हुई है तो वहां आने वाले महीनों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
पेयजल की स्थिति को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवार स्थानीय जल स्रोतों, कुओं और भूजल पर निर्भर रहते हैं। कम बारिश वाले क्षेत्रों में पर्याप्त जल पुनर्भरण नहीं होने की स्थिति में गर्मियों तक पानी की समस्या गंभीर हो सकती है। ऐसे में प्रशासन को कम बारिश वाले जिलों में जल उपलब्धता की स्थिति पर लगातार नजर रखने की जरूरत पड़ सकती है।
शहरी क्षेत्रों के लिए भी बारिश का आंकड़ा महत्वपूर्ण है। शहरों में पेयजल आपूर्ति के लिए जलाशयों और अन्य स्रोतों में पर्याप्त पानी होना जरूरी है। मॉनसून के दौरान जलाशयों में जमा पानी का इस्तेमाल आने वाले कई महीनों तक किया जाता है। ऐसे में जिन क्षेत्रों में सामान्य से काफी कम बारिश हुई है, वहां पानी के उपयोग और उपलब्ध भंडार पर विशेष ध्यान देना पड़ सकता है।
उद्योगों के लिए पानी की आपूर्ति भी इस स्थिति से जुड़ी हुई है। कई औद्योगिक इकाइयों को उत्पादन और दूसरी गतिविधियों के लिए बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। यदि जल स्रोतों में पर्याप्त भंडारण नहीं हुआ तो घरेलू जरूरतों, कृषि और औद्योगिक उपयोग के बीच पानी के बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता बढ़ सकती है।
राज्य के औसत आंकड़ों और जिलों की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर इस बार के मॉनसून की सबसे महत्वपूर्ण बात है। पूरे प्रदेश में सामान्य बारिश का 95.4 प्रतिशत पानी बरसने के बावजूद 30 जिलों में सामान्य से कम बारिश दर्ज होना बताता है कि पानी समान रूप से नहीं बरसा।
एक तरफ कुछ जिलों में अच्छी बारिश ने प्रदेश के कुल औसत को संभाल लिया, जबकि दूसरी तरफ कई जिलों में मॉनसून अपेक्षा के अनुरूप सक्रिय नहीं रहा। इसी असमान वितरण के कारण राज्य स्तर पर बारिश की कमी सिर्फ 4 प्रतिशत दिखाई दे रही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर कई क्षेत्रों में कमी कहीं ज्यादा है।
अलीराजपुर में सामान्य से आधी से भी कम बारिश होना विशेष चिंता का विषय है। ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय जल स्रोतों की स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। कम बारिश का असर तत्काल दिखाई देने के साथ अगले कुछ महीनों में भी सामने आ सकता है।
अब मॉनसून सीजन समाप्त होने के बाद सबसे ज्यादा ध्यान उपलब्ध पानी के संरक्षण और बेहतर प्रबंधन पर रहेगा। जिन जिलों में बारिश कम हुई है, वहां जलाशयों, तालाबों और भूजल की स्थिति के आधार पर आगे की रणनीति महत्वपूर्ण होगी।
किसानों के लिए भी सिंचाई की उपलब्धता अहम रहेगी। अगर बारिश के कारण मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं है या स्थानीय जल स्रोत पूरी तरह नहीं भरे हैं तो फसलों की सिंचाई के लिए अतिरिक्त व्यवस्था की जरूरत पड़ सकती है। विशेष रूप से उन 11 जिलों में स्थिति पर अधिक ध्यान रहेगा, जहां सामान्य बारिश का 80 प्रतिशत भी पानी नहीं मिला।
बारिश की कमी का प्रभाव केवल एक मौसम तक सीमित नहीं रहता। भूजल स्तर पर इसका असर बाद में सामने आ सकता है। अच्छी बारिश के दौरान जमीन के भीतर पानी का पुनर्भरण होता है, जबकि कमजोर मॉनसून वाले इलाकों में यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
प्रदेश में 30 सितंबर तक हुई 904 मिलीमीटर बारिश सामान्य औसत 37.3 इंच के मुकाबले करीब 4 प्रतिशत कम है। लेकिन इस आंकड़े के पीछे जिलों के बीच बारिश का बड़ा अंतर छिपा हुआ है। 55 में से 30 जिलों में सामान्य से कम और 11 जिलों में अपेक्षित बारिश का 80 प्रतिशत से भी कम पानी मिलना चिंता बढ़ा रहा है।
फिलहाल मध्य प्रदेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती कम बारिश वाले इलाकों में उपलब्ध पानी का बेहतर इस्तेमाल करने की है। फसलों के लिए सिंचाई, लोगों के लिए पेयजल और उद्योगों की जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा। मॉनसून की विदाई के बाद अब आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि असमान बारिश का प्रदेश के जल भंडार, खेती और पानी की उपलब्धता पर कितना असर पड़ता है।





