मध्य प्रदेश

दूषित पानी कांड में प्रशासनिक लापरवाही उजागर

Kavita2
30 Aug 2026 9:27 AM IST
दूषित पानी कांड में प्रशासनिक लापरवाही उजागर
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इंदौर। मध्य प्रदेश के इंदौर स्थित भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी के कारण हुई त्रासदी को लेकर बड़ी जानकारी सामने आई है। जांच कमेटी ने पानी के दूषित होने की घटना के लिए नगर निगम के छह अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। रिपोर्ट में प्रशासनिक लापरवाही और नर्मदा जल की पुरानी पाइपलाइन को समय पर नहीं बदले जाने को हादसे की प्रमुख वजह बताया गया है।

यह निष्कर्ष जस्टिस सुशील गुप्ता कमेटी की 150 पन्नों की रिपोर्ट का हिस्सा है। इस कमेटी का गठन मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्देश पर किया गया था। हालांकि हाई कोर्ट ने रिपोर्ट को गोपनीय रखने का आदेश दिया था, लेकिन शनिवार को रिपोर्ट की कुछ प्रमुख बातें सामने आईं।

दूषित पानी से हुई मौतों पर रिपोर्ट में खुलासा

जांच कमेटी ने भागीरथपुरा क्षेत्र में दर्ज हुई 36 मौतों की समीक्षा की। रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से 24 मौतों का संबंध दूषित पानी पीने से जोड़ा गया है।

वहीं, बाकी 12 मामलों में कमेटी ने स्पष्ट रूप से यह तय नहीं किया कि मौतें केवल दूषित पानी के कारण हुईं या फिर अन्य स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों की वजह से। इन मामलों में अन्य कारणों की संभावना को भी ध्यान में रखा गया है।

रिपोर्ट में बताया गया कि दूषित पानी की समस्या ने क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला और कई लोग बीमार हुए।

पुरानी पाइपलाइन बदलने में देरी बनी बड़ी वजह

जांच कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में प्रशासनिक स्तर पर हुई कई कमियों का उल्लेख किया है। इसमें सबसे अहम कारण नर्मदा जल की पुरानी पाइपलाइन को समय पर नहीं बदला जाना बताया गया है।

कमेटी के अनुसार, लंबे समय से खराब स्थिति में मौजूद पाइपलाइन से पानी की गुणवत्ता प्रभावित होने का खतरा बना हुआ था। इसके बावजूद समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए।

रिपोर्ट में कहा गया कि अगर पाइपलाइन बदलने और निगरानी व्यवस्था को लेकर समय पर कार्रवाई की जाती तो इस तरह की स्थिति को रोका जा सकता था।

नगर निगम अधिकारियों की भूमिका पर सवाल

जांच में नगर निगम के छह अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठाए गए हैं। कमेटी ने माना कि अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे जल आपूर्ति व्यवस्था की नियमित जांच करते और किसी भी संभावित खतरे को पहले ही पहचानते।

रिपोर्ट के अनुसार, जल वितरण व्यवस्था की निगरानी और शिकायतों के समाधान में लापरवाही बरती गई।

हालांकि रिपोर्ट सामने आने के बाद अब आगे की कार्रवाई को लेकर प्रशासनिक स्तर पर फैसला लिया जाना बाकी है।

हाई कोर्ट के निर्देश पर हुई थी जांच

भागीरथपुरा जल संकट के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने जांच के निर्देश दिए थे। इसके बाद जस्टिस सुशील गुप्ता की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई।

कमेटी ने घटना से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जांच की। इसमें जल आपूर्ति व्यवस्था, पाइपलाइन की स्थिति, प्रशासनिक कार्रवाई और प्रभावित परिवारों से जुड़ी जानकारी को शामिल किया गया।

कई स्तरों पर जांच के बाद तैयार की गई रिपोर्ट में अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई है।

स्थानीय लोगों में बढ़ी थी परेशानी

भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी की समस्या सामने आने के बाद बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए थे। लोगों ने पेट दर्द, उल्टी, दस्त और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत की थी।

स्थिति गंभीर होने के बाद स्वास्थ्य विभाग की टीमें सक्रिय हुईं और प्रभावित इलाकों में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराई गईं।

घटना के बाद पानी की गुणवत्ता जांचने और प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाने के कदम उठाए गए थे।

भविष्य के लिए उठाने होंगे ठोस कदम

जांच रिपोर्ट में सामने आए तथ्यों के बाद जल आपूर्ति व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि शहरों में पुरानी पाइपलाइन, जल स्रोतों की निगरानी और समय-समय पर जांच बेहद जरूरी है। किसी भी तरह की लापरवाही लोगों के स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा बन सकती है।

भागीरथपुरा की घटना ने शहरी जल प्रबंधन व्यवस्था पर कई सवाल खड़े किए हैं। अब प्रशासन के सामने चुनौती है कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

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