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Jabalpur जबलपुर: लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में जेठालाल का किरदार निभाकर देशभर में मशहूर हुए अभिनेता दिलीप जोशी जबलपुर पहुंचे, जहां उन्होंने BAPS स्वामीनारायण संगठन के सत्संग कार्यक्रम में शिरकत की। इस अवसर पर उन्होंने अपने आध्यात्मिक अनुभव साझा करते हुए कहा कि BAPS संगठन से जुड़ना उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ रहा है। दिलीप जोशी ने कहा, “यहां मैं इस सत्संग के कारण ही आया हूं। मेरा BAPS स्वामीनारायण संगठन से जुड़ाव करीब 2008 से है, ठीक उस समय जब हमारा टीवी शो शुरू हुआ था। अब लगभग 17-18 साल हो चुके हैं और इस दौरान इस संगठन से मुझे जीवन के कई अनमोल संस्कार मिले हैं।”
उन्होंने कहा कि अभिनय की व्यस्तता के बीच आध्यात्मिकता से जुड़ाव ने उन्हें शांति, अनुशासन और सकारात्मक दृष्टिकोण सिखाया। “टीवी और फिल्म इंडस्ट्री में जहां तनाव और प्रतिस्पर्धा बहुत है, वहीं BAPS परिवार ने मुझे यह सिखाया कि कैसे हर परिस्थिति में संतुलन और विनम्रता बनाए रखी जाए,” उन्होंने कहा। दिलीप जोशी ने बताया कि वे जब भी समय निकाल पाते हैं, संगठन के कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। उन्होंने कहा कि स्वामीनारायण संतों और सेवकों की जीवनशैली से उन्हें प्रेरणा मिलती है। “यह संगठन केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवा, शिक्षा, और मानवीय मूल्यों को आगे बढ़ाने का कार्य करता है,” उन्होंने कहा।
कार्यक्रम के दौरान दिलीप जोशी ने सद्भावना, एकता और सेवा के महत्व पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे केवल करियर पर ही नहीं, बल्कि जीवन में आध्यात्मिक मूल्यों को भी महत्व दें। “सफलता केवल पैसे या प्रसिद्धि से नहीं मिलती, बल्कि आंतरिक संतोष से मिलती है — और वह आंतरिक संतोष मुझे इस संगठन से मिला है,” उन्होंने कहा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु, संतगण और शहर के नागरिक मौजूद रहे। BAPS संगठन के प्रमुख संतों ने दिलीप जोशी का स्वागत करते हुए उनके योगदान और विनम्रता की सराहना की।
स्वामीनारायण संगठन का यह सत्संग कार्यक्रम जबलपुर में आयोजित किया गया था, जिसमें सेवा, भक्ति और राष्ट्र निर्माण जैसे विषयों पर प्रवचन दिए गए। श्रद्धालुओं ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम की शुरुआत की और भजन-कीर्तन के साथ माहौल को भक्तिमय बना दिया। दिलीप जोशी ने अंत में कहा कि “आज के युग में जब जीवन भागदौड़ से भरा है, ऐसे में आध्यात्मिक संस्थाओं की भूमिका बेहद जरूरी हो जाती है। ये संस्थाएं हमें जीवन का सच्चा अर्थ समझाती हैं।”
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