मध्य प्रदेश

प्राणनाथ मंदिर में महारास और भक्ति का उत्सव, जानिए नौ दिवसीय आयोजन का महत्व

nidhi
22 Oct 2026 9:32 AM IST
प्राणनाथ मंदिर में महारास और भक्ति का उत्सव, जानिए नौ दिवसीय आयोजन का महत्व
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पन्ना के शरद पूर्णिमा महोत्सव की कथा
पन्ना: मध्य प्रदेश का पन्ना शहर हीरों के साथ अपनी धार्मिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां स्थित महामति श्री प्राणनाथ जी मंदिर प्रणामी संप्रदाय का महत्वपूर्ण तीर्थ है। शरद पूर्णिमा पर इस मंदिर में विशेष महोत्सव आयोजित होता है, जिसमें देश-विदेश से श्रद्धालु शामिल होते हैं। जिला प्रशासन के विवरण में इसे नौ दिवसीय अंतरराष्ट्रीय शरद पूर्णिमा महोत्सव बताया गया है। इसकी परंपरा महामति प्राणनाथ जी के महारास और महाराजा छत्रसाल से जुड़े प्रसंगों से संबंध रखती है।
इस आयोजन को समझने के लिए पूरे महोत्सव और उसके मुख्य महारास समारोह का अंतर जानना जरूरी है। नौ दिवसीय उत्सव की शुरुआत विजयादशमी से जुड़ी रस्म के साथ होती है, जबकि शरद पूर्णिमा की रात इसका प्रमुख धार्मिक समारोह होता है। इसके बाद भी उत्सव की गतिविधियां जारी रहती हैं। इसी कारण यहां शरद पूर्णिमा का आयोजन केवल एक रात तक सीमित नहीं रहता।
अखंड महारास से जुड़ी है मान्यता
स्थानीय धार्मिक परंपरा के अनुसार, महामति प्राणनाथ जी बंगला जी मंदिर में अपने लगभग पाँच हजार अनुयायियों, जिन्हें ‘सुंदरसाथ’ कहा जाता है, के साथ ठहरे थे। शरद पूर्णिमा की चांदनी में श्रीकृष्ण की महारास लीला पर चर्चा चल रही थी। सुंदरसाथ ने उनसे अखंड महारास का अनुभव कराने का निवेदन किया। मान्यता है कि इसके बाद शुरू हुआ महारास पाँच दिनों तक चला। इसी प्रसंग की स्मृति में प्रतिवर्ष उत्सव मनाने की परंपरा बताई जाती है। यह विवरण आस्था और स्थानीय धार्मिक मान्यता से जुड़ा है।
श्रद्धालुओं के लिए इस कथा का केंद्र सामूहिक भक्ति और अपने आराध्य के प्रति समर्पण है। महारास का स्मरण उत्सव को विशेष आध्यात्मिक अर्थ देता है। मंदिर की परंपरा में यह अवसर अनुयायियों को एक स्थान पर एकत्र होने और अपनी धार्मिक विरासत से जुड़ने का माध्यम भी बनता है।
विजयादशमी पर तलवार उठाने की परंपरा
महोत्सव का आरंभ श्री खेजड़ा मंदिर में वीरा और तलवार उठाने से होता है। परंपरा के अनुसार, संवत 1740 की विजयादशमी पर प्राणनाथ जी ने बुंदेलखंड की रक्षा के लिए महाराजा छत्रसाल को तलवार और विजय का आशीर्वाद दिया था। पूर्णिमा की रात श्रीजी की सवारी बंगला जी से ब्रह्म चबूतरे पर लाई जाती है। सवारी पाँच दिनों तक वहां विराजती है और धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
इस प्रकार आयोजन में भक्ति के साथ बुंदेलखंड की ऐतिहासिक स्मृति का भी स्थान है। विजयादशमी की रस्म और पूर्णिमा के महारास का अपना अलग महत्व है। दोनों परंपराएं मिलकर महोत्सव को उसका विशिष्ट स्वरूप देती हैं।
मंदिर की बनावट भी है आकर्षण
प्राणनाथ जी मंदिर की स्थापत्य शैली भी इसकी पहचान है। जिला प्रशासन के परिचय के अनुसार, मंदिर का निर्माण 1692 में हुआ था। इसके गुंबदों और कमल आकृतियों में हिंदू तथा मुस्लिम स्थापत्य शैलियों का प्रभाव दिखाई देता है। परिसर में श्री गुम्मट जी, श्री बंगला जी, श्री सद्गुरु मंदिर, श्री बैजूराज जी मंदिर, श्री चौपड़ा मंदिर और श्री खेजड़ा मंदिर शामिल हैं।
श्री गुम्मट जी इस तीर्थ का प्रमुख आकर्षण है। इसकी गोलाकार संरचना पर संगमरमर के नौ गुंबद हैं। इनमें आठ दिशाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले गुंबदों के बीच केंद्रीय गुंबद स्थित है। चांदी से बना कमानी दरवाजा भी उल्लेखनीय है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, प्राणनाथ जी इस स्थान पर लगभग 11 वर्ष रहे थे।
मध्य प्रदेश पर्यटन भी इस मंदिर को शरद पूर्णिमा पर प्रणामी श्रद्धालुओं के प्रमुख आगमन स्थल के रूप में प्रस्तुत करता है। Madhya Pradesh Tourism यहां आने वाले लोगों के लिए मंदिर दर्शन, परंपराओं को समझना और सामूहिक उत्सव में भाग लेना एक-दूसरे से जुड़े अनुभव हैं। नौ दिनों का महोत्सव इन्हीं धार्मिक स्मृतियों और अनुष्ठानों का विस्तृत आयोजन है। हालांकि, किसी विशेष वर्ष की यात्रा के लिए कार्यक्रम की तिथियां और समय मंदिर प्रबंधन की ताजा सूचना से ही सुनिश्चित करने चाहिए।
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