- Home
- /
- राज्य
- /
- मध्य प्रदेश
- /
- मध्य प्रदेश में 27%...
मध्य प्रदेश
मध्य प्रदेश में 27% OBC आरक्षण रद्द हाई कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला
Ratna Netam
9 Oct 2026 9:30 PM IST

x
जबलपुर। मध्य प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण को लेकर लंबे समय से जारी कानूनी विवाद में शुक्रवार को हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। अदालत ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने के राज्य सरकार के फैसले को उचित नहीं माना। अदालत ने कहा कि आरक्षण की सामान्य 50 प्रतिशत सीमा से आगे जाने के लिए विशेष परिस्थितियों का होना आवश्यक है, लेकिन प्रस्तुत मामले में ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं पाया गया।हाई कोर्ट ने मार्च 2019 में लागू मध्य प्रदेश अध्यादेश संख्या 2/2019 और उसके बाद बने संशोधन अधिनियम, 2019 के प्रावधानों की समीक्षा की। इन प्रावधानों के माध्यम से राज्य सरकार ने सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की व्यवस्था की थी।अदालत ने अपने फैसले में उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरियों में ओबीसी प्रतिनिधित्व से संबंधित उपलब्ध आंकड़ों पर भी विचार किया। न्यायालय के अनुसार, प्रस्तुत आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि संविधान के अनुच्छेद 16(4) के संदर्भ में अन्य पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व पर्याप्त है।
27 प्रतिशत आरक्षण बढ़ाने के फैसले पर सवाल
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर विवाद वर्ष 2019 में आरक्षण प्रतिशत बढ़ाए जाने के बाद शुरू हुआ था।राज्य सरकार ने अध्यादेश के माध्यम से ओबीसी के लिए आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का प्रावधान किया था।इसके बाद इस फैसले की संवैधानिक वैधता को लेकर न्यायिक प्रक्रिया शुरू हुई।शुक्रवार को सुनाए गए विस्तृत फैसले में हाई कोर्ट ने इसी बढ़ोतरी के औचित्य और संवैधानिक आधार की समीक्षा की।अदालत ने इस बात पर विचार किया कि क्या राज्य सरकार ने आरक्षण की सामान्य सीमा से आगे जाने के लिए पर्याप्त और विशेष परिस्थितियां स्थापित की थीं।उपलब्ध फैसले के विवरण के अनुसार, न्यायालय ने ऐसा आधार पर्याप्त नहीं पाया।
50 प्रतिशत आरक्षण सीमा का उल्लेख
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को महत्वपूर्ण माना।भारतीय आरक्षण व्यवस्था से जुड़े न्यायिक सिद्धांतों में सामान्यतः कुल आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का उल्लेख किया जाता है।इस सीमा से आगे जाने के प्रश्न पर विशेष परिस्थितियों और संवैधानिक औचित्य की जांच महत्वपूर्ण होती है।मध्य प्रदेश सरकार के वर्ष 2019 के फैसले की समीक्षा करते हुए अदालत ने इसी पहलू पर ध्यान दिया।न्यायालय ने कहा कि ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए ऐसे विशेष कारण सामने नहीं आए, जिनसे निर्धारित सीमा को पार करना उचित ठहराया जा सके।हालांकि, आरक्षण संबंधी विभिन्न संवैधानिक प्रावधानों और श्रेणियों पर अलग-अलग न्यायिक सिद्धांत लागू हो सकते हैं। इसलिए इस फैसले को सभी प्रकार के आरक्षण पर एक समान नियम के रूप में नहीं समझना चाहिए।
जस्टिस आनंद पाठक और विनय सराफ की खंडपीठ ने सुनाया फैसला
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने 9 अक्टूबर 2026 को यह फैसला सुनाया।अदालत ने वर्ष 2019 के संशोधन को असंवैधानिक मानते हुए रद्द कर दिया। इसके साथ ही राज्य में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत रखने का निर्णय दिया गया।इस मामले से संबंधित याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई 5 अगस्त 2026 को पूरी हुई थी। इसके बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अदालत ने OBC के प्रतिनिधित्व पर क्या कहा?
हाई कोर्ट ने उच्च शिक्षा और सरकारी सेवाओं में ओबीसी वर्ग के प्रतिनिधित्व से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया।अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद 16(4) के संदर्भ में ओबीसी वर्ग का पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिखाई देता है।न्यायालय ने स्पष्ट किया कि विवाद ओबीसी समुदाय को आरक्षण देने का नहीं, बल्कि पहले से उपलब्ध 14 प्रतिशत आरक्षण को बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का है।अदालत के अनुसार, आरक्षण में इस बढ़ोतरी को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त संवैधानिक आधार प्रस्तुत नहीं किया गया।
तीन महीने में 13 प्रतिशत रोके गए पदों पर नियुक्ति के निर्देश
हाई कोर्ट ने सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं में लंबे समय से रोके गए 13 प्रतिशत पदों को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं।आरक्षण विवाद के कारण राज्य में 87:13 प्रतिशत के फार्मूले के तहत भर्तियां की जा रही थीं। इसके अंतर्गत 87 प्रतिशत पदों पर भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाती थी, जबकि विवादित 13 प्रतिशत पदों को रोककर रखा गया थाअब अदालत ने इन रोके गए पदों को अनारक्षित वर्ग की चयन सूची के अनुसार भरने का निर्देश दिया है।मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन मंडल और अन्य संबंधित भर्ती एजेंसियों को तीन महीने के भीतर आवश्यक प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
2019 में कमलनाथ सरकार ने बढ़ाया था आरक्षण
मध्य प्रदेश में तत्कालीन कमलनाथ सरकार ने वर्ष 2019 में ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने का निर्णय लिया था।इसके लिए 8 मार्च 2019 को अध्यादेश जारी किया गया। इसके बाद संशोधन कानून के माध्यम से आरक्षण में बढ़ोतरी का प्रावधान किया गया।हालांकि, इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई और 19 मार्च 2019 को हाई कोर्ट ने बढ़े हुए आरक्षण को लागू करने पर अंतरिम रोक लगाई थी।बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और संबंधित याचिकाओं पर कानूनी प्रक्रिया जारी रही।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ और जयश्री लक्ष्मणराव पाटिल मामलों में निर्धारित सिद्धांतों का उल्लेख कियाइन फैसलों में आरक्षण की संवैधानिक सीमाओं और असाधारण परिस्थितियों के महत्व पर विचार किया गया था।मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पाया कि राज्य में ओबीसी आरक्षण बढ़ाने के लिए ऐसी असाधारण परिस्थितियां स्थापित नहीं की गईं, जिनके आधार पर सामान्य 50 प्रतिशत सीमा से आगे जाना उचित माना जाए।
सरकारी भर्तियों पर पड़ेगा फैसले का असर
हाई कोर्ट के फैसले का सीधा संबंध राज्य की सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं से है।विशेष रूप से उन अभ्यर्थियों के लिए यह आदेश महत्वपूर्ण है, जिनकी नियुक्तियां आरक्षण विवाद के कारण लंबे समय से रुकी हुई थीं।अदालत ने संबंधित भर्ती एजेंसियों को निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई करने का निर्देश दिया है।हालांकि, अलग-अलग भर्ती परीक्षाओं में आदेश को लागू करने की प्रक्रिया संबंधित एजेंसियों की आधिकारिक सूचनाओं और अदालत के विस्तृत निर्देशों के अनुसार तय होगी।
सात साल पुराने विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर वर्ष 2019 से कानूनी विवाद जारी था। इस दौरान आरक्षण प्रतिशत और सरकारी नियुक्तियों से संबंधित अनेक याचिकाएं दाखिल हुईं।शुक्रवार को हाई कोर्ट ने 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण का प्रावधान करने वाले संशोधन कानून को रद्द कर दिया।अदालत के फैसले के अनुसार, मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत रहेगा।** साथ ही विवाद के कारण रोके गए 13 प्रतिशत पदों पर तीन महीने में नियुक्ति प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं। इस निर्णय से राज्य की आरक्षण नीति और सरकारी भर्ती प्रक्रियाओं की स्थिति स्पष्ट हुई है।
Next Story





