केरल

ओणम की रौनक, बुनकरों की परेशानी

Kavita2
2 Aug 2026 10:27 AM IST
ओणम की रौनक, बुनकरों की परेशानी
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तिरुवनंतपुरम। केरल में ओणम का त्योहार केवल उत्सव, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह राज्य के पारंपरिक हथकरघा उद्योग से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ओणम के मौके पर पहने जाने वाले पारंपरिक परिधानों में हथकरघा कपड़ों की विशेष भूमिका रही है। हालांकि, बदलते समय के साथ इस पारंपरिक उद्योग के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। कभी हजारों परिवारों की आजीविका का आधार रहा हथकरघा क्षेत्र अब सीमित कारीगरों और घटती मांग के बीच संघर्ष कर रहा है।

केरल के प्रसिद्ध हथकरघा केंद्रों में शामिल बलरामपुरम में आज भी कुछ परिवार इस परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं। तिरुवनंतपुरम के बाहरी इलाके में स्थित यह क्षेत्र अपने उत्कृष्ट हथकरघा वस्त्रों के लिए लंबे समय से जाना जाता रहा है। यहां बनने वाली पारंपरिक साड़ियां और अन्य कपड़े ओणम जैसे त्योहारों के दौरान विशेष मांग में रहते हैं। लेकिन अब इस कला को आगे बढ़ाने वाले कारीगरों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

स्थानीय बुनकरों का कहना है कि पहले हथकरघा बुनाई एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक गतिविधि थी। बड़ी संख्या में परिवार इस काम से जुड़े थे और पीढ़ी दर पीढ़ी यह कला आगे बढ़ती रही। लेकिन समय के साथ मशीन से बने सस्ते कपड़ों की बढ़ती उपलब्धता, उत्पादन लागत में वृद्धि और मेहनत के मुकाबले कम आय ने कई लोगों को इस पेशे से दूर कर दिया।

बलरामपुरम के 65 वर्षीय गोपी और 62 वर्षीय सुलोचना जैसे बुनकर आज भी करघे पर बैठकर पारंपरिक कपड़े तैयार करते हैं। उनके लिए ओणम केवल त्योहार नहीं, बल्कि उस दौर की याद भी है जब हथकरघा उद्योग अपने बेहतर समय में था। वे बताते हैं कि पहले त्योहारों के मौसम में काम की मांग काफी बढ़ जाती थी और बुनकर परिवारों के घरों में लगातार करघों की आवाज सुनाई देती थी।

बुनकरों के अनुसार, असली हथकरघा कपड़ों की खासियत उनकी बारीकी और मजबूती होती है। कपड़े की गुणवत्ता इस बात पर भी निर्भर करती है कि बुनकर करघे पर कितनी मेहनत और ताकत लगा सकता है। उम्र बढ़ने के साथ शारीरिक मेहनत करना कठिन होता जा रहा है, जिससे उत्पादन की गति और मात्रा दोनों प्रभावित होती हैं।

आज इस क्षेत्र में काम करने वाले अधिकतर कारीगर बुजुर्ग हैं। खासकर महिलाएं इस पारंपरिक कला को संभाले हुए हैं। नई पीढ़ी के युवाओं की रुचि इस काम में कम होती जा रही है, क्योंकि उन्हें इसमें मेहनत अधिक और आमदनी सीमित दिखाई देती है। कई युवा बेहतर रोजगार की तलाश में दूसरे क्षेत्रों की ओर चले गए हैं।

हथकरघा उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि इस कला को बचाना है तो सरकार, समाज और बाजार सभी को मिलकर प्रयास करना होगा। बुनकरों को बेहतर कीमत, आधुनिक बाजार तक पहुंच और नई पीढ़ी को प्रशिक्षण देने की जरूरत है। इससे न केवल पारंपरिक कला को बचाया जा सकेगा, बल्कि हजारों परिवारों को रोजगार भी मिल सकता है।

ओणम के समय पारंपरिक कपड़ों की मांग बढ़ती है, लेकिन बुनकरों का कहना है कि केवल त्योहारों के दौरान मिलने वाली बिक्री से पूरे साल की आर्थिक जरूरतें पूरी करना मुश्किल है। बाजार में मशीन से बने सस्ते विकल्पों के कारण हथकरघा उत्पादों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि हथकरघा केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि केरल की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। बलरामपुरम जैसे केंद्रों में बनने वाले कपड़ों में स्थानीय परंपरा, कारीगरों की मेहनत और पीढ़ियों का अनुभव शामिल होता है। यदि इस विरासत को संरक्षित नहीं किया गया तो आने वाले समय में कई पारंपरिक कलाएं विलुप्त होने के खतरे में आ सकती हैं।

गोपी और सुलोचना जैसे बुनकरों के लिए ओणम खुशी के साथ-साथ चिंता भी लेकर आता है। त्योहार उन्हें अपने पुराने दिनों की याद दिलाता है, जब हथकरघा उद्योग मजबूत था और बुनकरों को अपने काम पर गर्व होता था। लेकिन वर्तमान हालात उन्हें भविष्य को लेकर सोचने पर मजबूर करते हैं।

फिर भी, इन कारीगरों का अपने काम के प्रति लगाव कम नहीं हुआ है। वे आज भी करघे पर बैठकर धागों को जोड़ते हैं और पारंपरिक कपड़ों को आकार देते हैं। उनके हाथों की मेहनत में केरल की संस्कृति और इतिहास की झलक दिखाई देती है।

ओणम के अवसर पर जब लोग पारंपरिक परिधान पहनकर त्योहार मनाते हैं, तब इन बुनकरों की मेहनत भी उस उत्सव का हिस्सा बनती है। जरूरत इस बात की है कि इस कला को केवल त्योहारों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक स्थायी और सम्मानजनक आजीविका के रूप में मजबूत किया जाए।

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